सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 274

[ ४/२१२-२१६
दासीके समान सेवा करनेवाली, बन्धुके समान प्रीति-आचरणशील और विवाहिता पत्नीके
समान भोग्या, गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं? [वे मेरी सर्वस्व हैं, यह अर्थ है] ॥ २१२ ॥
लघुभागवतामृत, उत्तरखण्डमें (३९) आदिपुराणवचन :-
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्र
जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥ २१३॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा माहात्म्य, मेरी सेवा, मेरे प्रति श्रद्धा, मेरे मनके भाव केवल गोपियाँ
ही जानतीं हैं। हे पार्थ! स्वरूपसे इन सबको और कोई नहीं जानता है॥ २१३॥
अनुभाष्य-हे पार्थ! गोपिकाः मन्माहात्म्यं (मम महिमानं) मत्सपर्यां (मम सेवां) मच्छ्रद्धां (मम स्पृहनीयं)
मन्मनोगतं (मम मनोऽभिप्रायं) तत्त्वतः (स्वरूपतः) जानन्ति, [अन्ये] भक्ताः न जानन्ति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥
गोपियोंमें श्रीराधिका ही सर्वश्रेष्ठा :-
सेइ गोपीगण-मध्ये उत्तमा राधिका।
रूपे, गुणे, सौभाग्ये, प्रेमे सर्वाधिका ॥ २१४॥
अनुवाद-उन गोपियोंमें राधिका ही सबसे श्रेष्ठा हैं। रूप, गुण, सौभाग्य और प्रेममें भी
वे सबसे अधिक हैं॥२१४॥
लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४५) पद्मपुराणवचन :-
यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा।
सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ २१५ ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥
अमृतप्रवाह भाष्य-राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका
प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥ २१५॥
अनुभाष्य-विष्णोः (कृष्णस्य) राधा यथा प्रिया, तस्याः (राधायाः) कुण्डं तथा प्रियम्। सर्वगोपीषु सा
(श्रीराधिका) एका एव विष्णोः अत्यन्तवल्लभाः (परा प्रियतमा)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥
लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४६) आदिपुराणवचन :-
त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या यत्र वृन्दावनं पुरी।
तत्रापि गोपिकाः पार्थ यत्र राधाभिधा मम ॥ २१६ ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१६॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पृथ्वीपर वृन्दावनधामके अवतीर्ण होनेपर पृथ्वी तीनों लोकोंमें धन्य हुई
है। उसमें भी गोपियाँ धन्य हैं, क्योंकि उनमें मेरी अत्यन्त प्रिय 'राधा' नामक गोपी विद्यमान
है॥ २१६॥
अनुभाष्य-हे पार्थ! त्रैलोक्ये (भूर्भुवःस्वर्लोकत्रयमध्ये) पृथिवी धन्या, यत्र (पृथिव्यां) वृन्दावनं [नाम] पुरी
[अस्ति]। तत्र (वृन्दावने) अपि गोपिकाः धन्याः, यत्र मम राधाभिधा [गोपीवर्त्तते]।
२३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 274, कुल 2549 में से · SarvaKosh