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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2413

स्थित अथवा नित्य स्वरूपमें अवस्थित होकर पूर्ण
सच्चिदानन्द भगवान्‌की नित्य सेवा ही दैवी गुणोंवाले
पुरुषोंकी अभिलषित वस्तु है। उनकी चेष्टा परिवर्तनशील
असत् स्थूलदेह और सूक्ष्मदेहके कार्योंमें नियुक्त ना
रहकर सदा अपरिवर्तनशील सत् आत्म-विषयमें ही
नियुक्त होती है। भगवद्-विस्मृतिके कारण ही यह
विरूप स्थूल और सूक्ष्म देह धारण करनी होती है।
गीतामें कहा गया है—इस स्थूल और सूक्ष्म देहके
कार्यमें लिप्त रहनेसे विरूप बुद्धि नष्ट न होकर और
भी बढ़ती जाती है। कर्मजड़ स्मार्त्तगणोंकी बुद्धि वेदोंके
मधु-पुष्पित वाक्योंमें लगकर कर्मके फलोंको भोगनेमें
ही नियुक्त है। इसलिये वे देहको छोड़कर और कुछ
विचार नहीं कर पाते हैं। आत्मविचारका प्रयास
दिखानेपर भी स्मार्त्तगण देह-विचार ही सामने लाते हैं।
पारमार्थिक राज्यमें भी उनका देह-विचार प्रबल हो
उठता है। इस प्रकारके विचारके वशीभूत होकर वे
विष्णुभक्तोंके जन्मको खोजते हुए उनकी जातिके
विचारको लेकर व्यस्त होते हैं। इन सब स्मार्त्त
विचारोंका चश्मा पहनकर भागवत-वस्तुके जन्म विचारको
करते हुए हम भी विष्णु-चरणामृतको प्राकृत जल
देखेंगे, शालिग्रामको शिला देखेंगे, गोबरको विष्ठा देखेंगे,
शङ्खको हड्डी देखेंगे और भगवान्‌की देहको भी हाड़-मांसकी
थैली समझेंगे। किन्तु भगवद्भक्तगण सभीमें अप्राकृत
दर्शन करते हैं, क्योंकि वे सेवोन्मुख हैं। भोगोन्मुख
दृष्टि जड़-दर्शन करवाती है और सेवोन्मुख नेत्रोंसे
चिन्मय दर्शन होता है। इसलिये कर्मजड़ स्मार्त्तगण
बाहरी जन्म-कर्मको लेकर व्यस्त रहते हैं। प्राकृत
जाति या वर्ण स्त्रीसङ्गसे ही उत्पन्न वस्तु मात्र है।
भगवद्भक्तोंकी कोई प्राकृत जाति नहीं होती, क्योंकि वे
प्राकृत गुणमय जगत्‌में अप्राकृत निर्गुण वस्तु हैं।
कर्मजड़ स्मार्त्तगण भोगोन्मुख मस्तिष्कमें यह सूक्ष्म
विचार धारण नहीं कर पाते हैं। श्रीनारायण गण्डकी
शिलामें प्रकटित होकर अर्चारूप धारण कर सकते हैं,
अथवा आठ प्रकारकी अर्चामूर्त्तिमें विराजित हो सकते
हैं। वैष्णव अति नीचकुलमें जन्म ले सकते हैं। इसके
लिये श्रीनारायण शिला या मिट्टी, काष्ठ, पत्थर या लोहे
या बालूके नहीं होते अथवा वैष्णव चमार, झाडूदार,
चण्डाल, वैश्य, क्षत्रिय या प्राकृत ब्राह्मण भी नहीं होते।
रैदास कभी भी चमार नहीं थे, झाडु ठाकुर भुँइमालि
नहीं थे, गुहक चण्डाल नहीं थे, उद्धारण ठाकुर सोनेके
व्यापारी (सुनार) नहीं थे, नरोत्तम ठाकुर कायस्थ नहीं
थे या श्रीनिवास आचार्य प्राकृत ब्राह्मण भी नहीं थे।
ये सभी वैकुण्ठ वस्तु हैं—एक-एक कुलको पवित्र
करनेके लिये धराधाममें अवतीर्ण हुए हैं। भक्त या
वैष्णव भगवान्‌के अभिन्न तनु है। वैष्णव अच्युत गौत्रीय
हैं। इसलिये महाप्रभुने हरिदास ठाकुरको कहा है (चैः
भाः मध्यखण्ड 10/36)—
“एइ मोर देह हैते तुमि मोर बड़।
तोमार ये जाति, सेइ जाति मोर दृढ़॥”
“मेरी अपनी देहसे तुम्हारी देह श्रेष्ठ है। तुम जिस
जातिके हो, वही मेरी भी जाति है।”
गुणविहीन जाति ब्राह्मणकी बात तो बहुत दूरकी,
शम-दम आदि गुणसम्पन्न सगुण ब्राह्मणसे भी भगवद्भक्त
कोटि-कोटि गुणा श्रेष्ठ होते हैं—यहाँ तक कि ब्रह्मज्ञ
ब्राह्मणसे भी भगवद्भक्तकी श्रेष्ठता शास्त्रीय वाक्य और
विचारके द्वारा देखी जा सकती है। जैसे, गरुड़पुराणमें
कहा गया है—
“ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः॥
सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते।
वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते॥”
[अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक
पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक
सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त-
शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों
वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”]
शम-दम आदि बारह गुणसम्पन्न ब्राह्मण भी यदि
कमलनाभ श्रीभगवान्‌की सेवा-विमुख हो, तब उससे