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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2412

[ 16/13–19 सोलहवाँ अध्याय 395
अनुवाद—श्रीकालिदास शूद्र जातिमें उत्पन्न वैष्णवोंके
घर भी कुछ भेंट लेकर जाते और उसी प्रकारसे
छिपकर उनका भी उच्छिष्ट खाते॥ 13 ॥
अनुभाष्य—'शूद्र-वैष्णव',—शौक्र-शूद्र कुलमें जन्में
वैष्णव ॥ 13 ॥
श्रीकालिदास और झडु-ठाकुरका वृत्तान्त :—
भुँइमालि-जाति, 'वैष्णव'—'झडु' ताँर नाम।
आम्रफल लञा तेंहो गेला ताँर स्थान ॥ 14 ॥
अनुवाद—भुँइमालि-जातिके झडु नामक एक वैष्णव
थे। श्रीकालिदास उनके घरपर आमके फल लेकर
गये ॥ 14 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भुँइमाली',—'हाँडी' तुल्य एक
विशेष जाति ॥ 14 ॥
अनुभाष्य—श्रीकालिदास और झडु ठाकुर, —इन
दोनोंका घर 'भेदो' अथवा 'भादुया' ग्राममें था। श्रील
दास गोस्वामीकी प्रकट-भूमि 'कृष्णपुर' ग्रामसे प्रायः तीन
मील दक्षिणमें और इ-आइ-आर लाइनपर बैण्डल-जंक्शनसे
प्रायः एक मील पश्चिममें अवस्थित है और
डाकघर—देवानन्दपुर है। झडु ठाकुरके द्वारा सेवित
श्रीमदनगोपाल-विग्रह इसी स्थानपर श्रीरामप्रसाद दास
नामक एक रामायेत ('रामानन्दी' सम्प्रदायके व्यक्ति) के
द्वारा पूजित हो रहे हैं। सुना जाता है, श्रीकालिदासके
सेवित विग्रह सरस्वती नदीके तटवर्ती शङ्खनगरमें अब
तक भी जिस किसी प्रकारसे सेवित होते हुए आ रहे
हैं। आजसे लगभग बीस वर्ष पूर्व त्रिवेणीके अधिवासी
मतिलाल चट्टोपाध्याय नामक एक व्यक्तिने उन्हें अपने
घरमें ले जाकर सेवा प्रारम्भ की है ॥ 14 ॥
आम्र भेट दिया ताँर चरण वन्दिला।
ताँर पत्नीरे तबे नमस्कार कैला ॥ 15 ॥
पत्नी-सहित तेंहो आछेन बसिया।
बहु सम्मान कैला कालिदासरे देखिया ॥ 16 ॥
अनुवाद—श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरको आम
भेंट देकर उनके चरणोंकी वन्दना की, तत्पश्चात्
श्रीकालिदासने श्रीझडु ठाकुरकी पत्नीको भी नमस्कार
किया। उस समय श्रीझडु ठाकुर अपनी पत्नीके साथ
बैठे हुए थे, उन्होंने श्रीकालिदासको देखकर उनका
बहुत सम्मान किया ॥ 15-16 ॥
इष्टगोष्ठी कतक्षण करि' ताँर सने।
झडुठाकुर कहे ताँरे मधुर वचने ॥ 17 ॥
झडु-ठाकुरके द्वारा दीनतावशतः वञ्चनाकी चेष्टा;
अमानी होना और मान प्रदान करना :—
“आमि नीचजाति, तुमि—अतिथि सर्वोत्तम।
कोन् प्रकारे करिमु तोमार सेवन ?? 18 ॥
आज्ञा देह',—ब्राह्मण-घरे अन्न लञा दिये।
ताँहा तुमि प्रसाद पाओ, तबे आमि जीये ॥”19 ॥
अनुवाद—श्रीझडु ठाकुरने कुछ समय तक
श्रीकालिदासके साथ इष्ट-गोष्ठी करनेके पश्चात् मधुर
वचन कहे, —“मैं नीच-जातिका व्यक्ति हूँ और आप
सर्वोत्तम अतिथि हैं। मैं किस प्रकारसे आपकी सेवा
करूँ? यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं किसी ब्राह्मणके
घरमें कच्चे चावल आदि जाकर दे दूँ और आप वहीं
प्रसादको ग्रहण करें। ऐसा करनेसे मैं सुखपूर्वक जीवन
व्यतीत करूँगा ॥” 17-19 ॥
अमृतानुकणिका—इस पृथ्वीपर दो प्रकारके मनुष्य
देखे जाते हैं—एक प्रकारके मानव पूर्ण भगवद्-विश्वासी
और एक प्रकारके मानव कर्मजड़-स्मार्त्त। एक प्रकारके
व्यक्तियोंका विचार जीवके स्वरूपको लेकर होता है
और अन्य एक प्रकारके व्यक्तियोंका विचार विरूपको
लेकर होता है। श्रीगीता (2/24) में जीवात्माके स्वरूप
विचारमें कहा है—
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
आत्मा नित्य वस्तु है, सभी योनियोंमें भ्रमण
करनेपर भी स्थिर, अचल और सनातन है। आत्मामें