श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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छठा अध्याय
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श्रीरघुनाथके कृष्णेन्द्रिय-प्रीति वाञ्छामय वैराग्य-दर्शनसे
महाप्रभुको आनन्द :-
एइमत महाप्रभु नाना लीला करे।
रघुनाथेर वैराग्य देखि' सन्तोष अन्तरे ॥ 325 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु अनेक प्रकारकी
लीलाएँ करते। श्रीरघुनाथ दासके वैराग्यको देखकर
उनके हृदयमें बहुत सन्तोष था ॥ 325 ॥
श्रीरघुनाथके द्वारा रचित स्तवमें
महाप्रभुकी करुणाका वर्णन :-
आपन-उद्धार एइ रघुनाथदास।
'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥ 326 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथने अपने उद्धारकी बातको स्वरचित
'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है ॥ 326 ॥
श्रीगौरकृपासे श्रीरघुनाथका श्रीदामोदर-आनुगत्य और
श्रीगान्धर्वा-गिरिधारीकी सेवाकी प्राप्ति :-
स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तव (11)—
महासम्पद्दारादपि पतितमुद्धृत्य कृपया
स्वरूपे यः स्वीये कुजनमपि मां न्यस्य मुदितः।
उरो गुञ्जाहारं प्रियमपि च गोवर्धनशिलां
ददौ मे गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 327 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे महा-दुर्जन होनेपर भी
कृपापूर्वक जो मुझे पतित देखकर मेरा सम्पत्ति और
पत्नी (पाठान्तरमें विषयरूपी दावाग्नि)से उद्धार करके
मुझे श्रीस्वरूपको अर्पण करके आनन्दित हुए थे,
जिन्होंने मुझे अपने वक्षकी गुञ्जा-माला और गोवर्धन-शिला
प्रदान की थी, वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे
मत्त करें ॥ 327 ॥
छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
यः (महाप्रभुः) कृपया कुजनम् अपि मां [स्वानुकम्पया]
महासम्पद्दारात् (महासम्पदश्च दाराश्च तेषां समाहारः, हिरण्ययोषित्-
संसर्गात्, महासम्पद्दावात् इति पाठे महासम्पदेव दावः तस्मात्
सकाशात्) उद्धृत्य स्वीये (निजजने) स्वरूपे (श्रीदामोदरस्वरूपे)
न्यस्य (समर्प्य) मुदितः (हृष्टः सन्) प्रियम् अपि उरोगुञ्जाहारं
(वक्षसः गुञ्जामालां) गोवर्धनशिलां च (गिरिधरविग्रहं) मे
(मह्यं) ददौ, सः (गौराङ्गः गौरहरिः) मे (मम) हृदये उदयन्
(प्रकटयन्) मां मदयति (हर्षयति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥
छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभु और श्रीरघुनाथके मिलनके श्रवणसे
श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्ति :-
एइ त' कहिलुँ रघुनाथेर मिलन।
इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 328 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ दासका महाप्रभुके
साथ मिलनका वर्णन किया है। इसे जो श्रवण करता
है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती
है ॥ 328 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 329 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीरघुनाथदासमिलनं नाम
षष्ठः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 329 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीरघुनाथदासमिलन
नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।