श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें206 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/315-324 ]
खानेके लिये डाल देते हैं, किन्तु सड़े भातकी दुर्गन्धके
कारण गायें उसे खा नहीं पाती ॥ 315-316 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘सड़ि’’, —सड़ जाना।
तैलङ्गी-गाई,—तैलङ्ग देशकी गायें ॥ 315-316 ॥
अनुभाष्य- ‘डारे’,-फेंक देते ॥ 316 ॥
सेइ भात रघुनाथ रात्रे घरे आनि’ ।
भात धुञा फेले घरे दिया बहु पानि ॥ 317 ॥
भितरेते दड़-भात माजि’ येइ पाय ।
लवण दिया रघुनाथ सेइ अन्न खाय ॥ 318 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें उसी भातको
अपने घर ले आते और बहुत अधिक पानीसे उसे
अच्छेसे धो लेते। धोनेके बाद उसके भीतर जो सख्त
भात मिलता, वे उसमें नमक मिलाकर खा
लेते ॥ 317-318 ॥
अनुभाष्य—‘भितरेते दड़-भात माजि’’,-अध-पके
चावलके (भातके) भीतरके कठोर मध्य-भागको धोकर
अर्थात् साफ करके ॥ 318 ॥
एकदिन श्रीस्वरूपका आनन्दपूर्वक चिद्वस्तु समझकर उस
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :-
एकदिन स्वरूप ताहा करिते देखिला ।
हासिया ताहार किछु मागिया खाइला ॥ 319 ॥
अनुवाद—एकदिन श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथ
दासको उन चावलोंको धोकर खाते हुए देखा। मुस्कुराते
हुए उन्होंने श्रीरघुनाथसे कुछ चावल माँगकर खा
लिये ॥ 319 ॥
श्रीगौरकृष्णके परमप्रिय श्रीरघुनाथके द्वारा ग्रहण
किया गया प्रसाद ही चिन्मय कृष्ण-भुक्तामृत :-
स्वरूप कहे,—“ऐछे अमृत खाओ निति निति ।
आमा-सबाय नाहि देह’, कि तोमार प्रकृति ? ?”320 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“तुम प्रतिदिन
ऐसा अमृत खाते हो, किन्तु हम सबको नहीं देते हो,
यह तुम्हारा कैसा स्वभाव है ?”320 ॥
श्रीगोविन्दसे सुनकर स्वयं महाप्रभुका भी उस
श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :-
गोविन्देर मुखे प्रभु से वार्त्ता शुनिला ।
आर दिन आसि’ प्रभु कहिते लागिला ॥ 321 ॥
“खासा वस्तु खाओ सबे, मोरे ना देह’ केने?”
एत बलि’ एक ग्रास करिला भक्षणे ॥ 322 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे उस वार्तालापको
सुना। अगले दिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे कहने
लगे,-“तुम सब उत्तम वस्तुएँ खाते हो, मुझे क्यों नहीं
देते हो?” यह कहकर महाप्रभुने भी उन चावलोंका
एक ग्रास खा लिया ॥ 321-322 ॥
साधकका स्वयं श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये वैराग्य-
आचरणका अभ्यास रहनेपर भी निखिल ऐश्वर्यशाली
हरि-गुरु-वैष्णवको एकमात्र प्रभु मानकर सर्वोत्कृष्ट
चित्-उपकरणके द्वारा पूजाकी कर्त्तव्यताकी शिक्षादान :-
आर ग्रास लैते स्वरूप हातेते धरिला ।
“तव योग्य नहे” बलि’ बले काड़ि’ निला ॥ 323 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा एक और ग्रास लेनेपर
श्रीस्वरूप दामोदरने उनका हाथ पकड़ लिया और
कहा,-“यह आपके योग्य नहीं है।” तब उन्होंने
बलपूर्वक उनके हाथसे चावल छीन लिये ॥ 323 ॥
महाप्रभुके द्वारा अपने प्रेष्ठ श्रीरघुनाथके द्वारा
ग्रहण किये प्रसादकी प्रशंसा :-
प्रभु बोले,—“निति निति नाना प्रसाद खाइ ।
ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे ना पाइ ॥”324 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,-“मैं प्रतिदिन अनेक
प्रकारका प्रसाद खाता हूँ, किन्तु मुझे ऐसा स्वाद किसी
और प्रसादको खानेसे नहीं मिला ॥”324 ॥