श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2196, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/113-121 छठा अध्याय 179
प्रतिदिन महाप्रभु करेन भोजन।
मध्ये मध्ये प्रभु ताँरे देन दरशन ॥ 113 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीराघव पण्डितके घरपर
भोजन करते और बीच-बीचमें उनको अपने दर्शन
देते॥ 113 ॥
श्रीराघवके द्वारा दोनों प्रभुओंके भोजनका सम्पादन :—
दुइ भाइरे राघव आनि’ परिवेशे।
यत्न करि’ खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥ 114 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डित दोनों भाइयोंको (महाप्रभु
और श्रीनित्यानन्द प्रभुको) बुलाकर परोसते और बहुत
प्रीतिसे उन्हें खिलाते। इसलिये दोनों भाई सब कुछ खा
लेते और कुछ भी अवशेष नहीं बचता॥ 114 ॥
दोनों प्रभुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे बहुत
प्रकारके विचित्र प्रसादका सेवन :—
कत उपहार आने, हेन नाहि जानि।
राघवेर घरे रान्धे राधा-ठाकुराणी ॥ 115 ॥
अनुवाद—वे कितने प्रकारके व्यञ्जन-पकवानादि
लेकर आते उसे कोई भी नहीं जान सकता। वास्तवमें
श्रीराघव पण्डितके घरपर स्वयं श्रीराधा-ठाकुराणी ही
भोजन पकाती थीं॥ 115 ॥
श्रीराघवके घरमें स्वयं श्रीराधिकाका श्रीकृष्णके उद्देश्यसे
अमृतको भी निन्दित करनेवाले भोजन बनाना :—
दुर्वासार ठाञि तैं हो पाञाछेन वर।
अमृत हइते पाक ताँर अधिक मधुर ॥ 116 ॥
अनुवाद—श्रीराधा-ठाकुराणीको दुर्वासा ऋषिसे वरदान
मिला था कि उनके द्वारा बनायी गयी भोजन सामग्री
अमृतसे भी अधिक मधुर होगी॥ 116 ॥
दोनों प्रभुओंको उनके भोजनको खानेमें आनन्द :—
सुगन्धि सुन्दर प्रसाद—माधुर्येर सार।
दुइ भाइ ताहा खाञा सन्तोष अपार ॥ 117 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा परोसा गया
सुगन्धित सुन्दर प्रसाद माधुर्यका सार था, दोनों भाई
उसे खाकर अत्यन्त सन्तुष्ट होते ॥ 117 ॥
सभी भक्तोंका बैठना, श्रीरघुनाथको भोजनके लिये
अनुरोध, श्रीरघुनाथके द्वारा बादमें बैठना स्वीकार :—
भोजने बसिते रघुनाथे कहे सर्वजन।
पण्डित कहे,—“इँह पाछे करिबे भोजन ॥” 118 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीरघुनाथको भी बैठकर
भोजन करनेके लिये कहा। किन्तु श्रीराघव पण्डितने
उनसे कहा,—“यह बादमें भोजन करेगा॥” 118 ॥
भक्तोंका गले तक भरकर भोजन और आचमन :—
भक्तगण आकण्ठ भरिया करिल भोजन।
‘हरि’ ध्वनि करि’ उठि’ कैला आचमन ॥ 119 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने गले तक भरकर भोजन
किया तथा ‘हरि’ ध्वनि करते हुए उठकर आचमन
किया॥ 119 ॥
आचमनके बाद दोनों प्रभुओंको
माला तथा चन्दन पहनाना :—
भोजन करि’ दुइ भाइ कैला आचमन।
राघव आनि’ पराइला माल्य-चन्दन ॥ 120 ॥
अनुवाद—दोनों भाइयोंने भी भोजन करके आचमन
किया। श्रीराघव पण्डितने लाकर उन दोनोंको माला
पहनायी और चन्दन लगाया॥ 120 ॥
दोनों प्रभुओंके द्वारा ताम्बूल-खाना;
सभीको अवशेषकी प्राप्ति :—
बिड़ा खाओयाइला, कैला चरण-वन्दन।
भक्तगणे दिला बिड़ा, माल्य-चन्दन ॥ 121 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंको ताम्बूल
खिलाया और उनके चरणोंकी वन्दना की। उन्होंने
उपस्थित भक्तोंको भी ताम्बूल तथा माला-चन्दन आदि
प्रदान किया॥ 121 ॥
अनुभाष्य—‘बिड़ा’,—सजाया हुआ ताम्बूल, पानका
बीड़ा॥ 121 ॥