श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें178 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/103-112 ]
देख रहे थे। इसे केवल श्रीनित्यानन्द प्रभु ही देख पा रहे थे, अन्य कोई भी नहीं॥ 103 ॥
महाप्रभुके नृत्यकी ही श्रीनित्यानन्दके अनुपम नृत्यके साथ एकमात्र तुलना :-
नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार नर्त्तने।
उपमा दिवार नाहि ए-तिन भुवने ॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके नृत्यके समान ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी उपमा देनेके लिये त्रिभुवनमें कुछ भी नहीं है ॥ 104 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दप्रभुके नृत्यके माधुर्यका दर्शन :-
नृत्येर माधुरी केबा वर्णिवारे पारे।
महाप्रभु आइसे सेइ नृत्य देखिबारे ॥ 105 ॥
अनुवाद—जिसे देखनेके लिये स्वयं महाप्रभु आते हैं, ऐसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी माधुरीका कौन वर्णन कर सकता है ॥ 105 ॥
नृत्यके कारण विश्राम करनेके बाद श्रीनिताइका अपने भक्तों सहित श्रीराघवके घरमें रात्रि-भोजन :-
नृत्य करि' प्रभु यबे विश्राम करिला।
भोजनेर लागि' पण्डित निवेदन कैला ॥ 106 ॥
अनुवाद—नृत्य करनेके पश्चात् जब श्रीनित्यानन्द प्रभुने विश्राम कर लिया, तब श्रीराघव पण्डितने आकर उन्हें भोजन करनेके लिये निवेदन किया ॥ 106 ॥
श्रीनिताइके दायीं ओर महाप्रभुके भोजन करनेके लिये आसन :-
भोजने बसिला प्रभु निजगण लञा।
महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया ॥ 107 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने गणोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठे और उन्होंने अपनी दायीं ओर महाप्रभुके लिये आसन बिछाया ॥ 107 ॥
महाप्रभुको उसपर बैठे देखकर श्रीराघवको हर्ष :-
महाप्रभु आसि' सेइ आसने बसिल।
देखि' राघवरे मने आनन्द बाड़िल ॥ 108 ॥
अनुवाद—महाप्रभु आकर उस आसनपर बैठ गये। यह देखकर श्रीराघव पण्डितके मनमें आनन्द बढ़ने लगा ॥ 108 ॥
सर्वप्रथम दोनों प्रभु, बादमें भक्तोंके द्वारा प्रसाद-सेवन :-
दुइभाइ-आगे प्रसाद आनिया धरिला।
सकल वैष्णवे पिछे परिवेशान कैला ॥ 109 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंके सामने प्रसाद लाकर सजाया और बादमें उन्होंने समस्त वैष्णवोंको भी प्रसाद परोसा ॥ 109 ॥
श्रीराघवके घरमें प्रसादकी विचित्रताका वर्णन :-
नानाप्रकार पिठा, पायस, दिव्य शाल्य-अन्न।
अमृत निन्दये ऐछे विविध व्यञ्जन ॥ 110 ॥
अनुवाद—उस प्रसादमें अनेक प्रकारके पीठा-पाना, खीर, दिव्य शाल्य-चावलादि अनेक प्रकारके व्यञ्जन अमृतके स्वादको भी पराभूत करनेवाले थे ॥ 110 ॥
श्रीराघवके घरमें प्रस्तुत नैवेद्यादि-महाप्रभुको नित्यप्रिय :-
राघव-ठाकुरेर प्रसाद अमृतेर सार।
महाप्रभु याहा खाइते आइसे बार बार ॥ 111 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा निवेदित प्रसाद अमृतका सार स्वरूप होता था। उसे खानेके लिये महाप्रभु बारम्बार उनके घरपर आते थे ॥ 111 ॥
महाप्रभुके उद्देश्यसे प्रतिदिन पृथक् भोग और महाप्रभुके द्वारा उसको ग्रहण करना :-
पाक करि' राघव यबे भोग लागाय।
महाप्रभुर लागि' भोग पृथक् बाड़य ॥ 112 ॥
अनुवाद—रसोई बनानेके बाद जब श्रीराघव पण्डित भोग लगाते, तो वे महाप्रभुके लिये अलगसे भोग लगाते थे ॥ 112 ॥