श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2186, कुल 2549 में से
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छठा अध्याय
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अनुवाद—जब भी वह चौधरी पीटनेके निश्चयसे आता, श्रीरघुनाथको देखनेके साथ-ही-साथ उसका मन परिवर्तित हो जाता और वह उन्हें पीट नहीं पाता ॥ २२ ॥
बाहरमें रोष, अन्दरमें शङ्का :-
विशेषे कायस्थ-बुद्धये अन्तरे करे डर।
मुखे तर्जे गर्जे, मारिते सभय अन्तर ॥ २३ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके कायस्थ होनेके कारण मुस्लिम चौधरी उनसे डरता था। वह मुखसे तो बहुत तर्जन-गर्जन करता था, किन्तु पीटनेसे डरता था ॥ २३ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरघुनाथ सम्माननीय और धनी व्यक्तिके पुत्र एवं पण्डित हैं, विशेषतः ब्राह्मणोंके अनुगत अति प्रधान कायस्थ वर्णमें उत्पन्न हुए हैं—यह जाननेके कारण म्लेच्छ चौधरी उन्हें मार नहीं पाता था। सत्ययुगसे ही यह जाना जाता है कि कायस्थगण—राजकर्मचारी होते हैं; क्षत्रियोंके समान ही उनका सम्मान होता है; जैसे, याज्ञवल्क्ये,—
“चाटतस्करदुर्वृत्तैर्महासाहसिकादिभिः।
पीड्यमाना प्रजा रक्षेत् कायस्थैश्च विशेषतः ॥”
अर्थात् “राजाका धर्म यह है कि दुष्ट लोगोंके हाथोंसे प्रजाकी रक्षा करेंगे, और यदि उनके प्रधान कर्मचारी राजवल्लभ कायस्थगण प्रजापर अत्याचार करें, तो उसका भी विशेष रूपसे विचार करेंगे। क्योंकि राजाके प्रधान कर्मचारीके द्वारा किसी प्रकारका अत्याचार करनेपर राजाके विशेष ध्यान नहीं देनेपर उससे प्रजाकी रक्षा नहीं होगी ॥” २३ ॥
मधुर-भाषी, सम्मान प्रदान करनेवाले श्रीरघुनाथकी मुस्लिम चौधरीके प्रति सविनय उक्ति :-
तबे रघुनाथ किछु चिन्तिला उपाय।
विनति करिया कहे सेइ म्लेच्छ-पाय ॥ २४ ॥
“आमार पिता, ज्येठा हय तोमार दुइ भाइ।
भाई-भाइये तोमरा कलह कर सर्वदाइ ॥ २५ ॥
कभु कलह, कभु प्रीति—इहार निश्चय नाइ।
कालि पुनः तिन भाइ हइबा एक-ठानि ॥ २६ ॥
आमि यैछे पितार, तैछे तोमार बालक।
आमि तोमार पाल्य, तुमि आमार पालक ॥ २७ ॥
पालक हञा पाल्येरे ताड़िते ना युयाय।
तुमि सर्वशास्त्र जान ‘जिन्दापीर’-प्राय ॥” २८ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने उस मुस्लिम चौधरीकी धमकियोंसे बचनेका उपाय सोचा और उसके चरणोंमें विनती करते हुए कहा,—“मेरे पिता और ताऊ—आपके दो भाई हैं। भाई-भाईके बीचमें सदैव झगड़ा होता रहता है। कभी झगड़ा करते हैं और कभी प्रीति करते हैं—यह निश्चित नहीं है कि कब यह बदलता है। मुझे विश्वास है कि कल आप तीनों भाई फिरसे एक साथ हो जाओगे। मैं जैसे अपने पिताका पुत्र हूँ, उसी प्रकार आपका भी पुत्र हूँ। मैं आपका पाल्य हूँ और आप मेरे पालक हैं। पालक होकर पाल्यको इस प्रकारसे दण्डित करना उचित नहीं है। आप तो समस्त शास्त्रोंमें निपुण और जिन्दापीरके समान हैं ॥” २४-२८ ॥
मुस्लिम चौधरीकी श्रीरघुनाथके प्रति स्नेह-आर्द्रता :-
एत शुनि' सेइ म्लेच्छेर मन आर्द्र हैल।
दाड़ि बहि' अश्रु पड़े, काँदिते लागिल ॥ २९ ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके इन वचनोंको सुनकर उस म्लेच्छ चौधरीका हृदय पिघल गया। वह रोने लगा, उसके नेत्रोंसे अश्रु निकलकर उसकी दाढ़ीके ऊपरसे प्रवाहित होने लगे ॥ २९ ॥
म्लेच्छ बले,—“आजि हैते तुमि—मोर ‘पुत्र’।
आजि छोड़ाइमु तोमा' करि' एक सूत्र ॥” ३० ॥
अनुवाद—म्लेच्छ चौधरीने कहा,—“आजसे तुम मेरे पुत्र हो। मैं आज ही कोई उपाय करके तुम्हें छुड़ाऊँगा ॥” ३० ॥
अनुभाष्य—'सूत्र',—चलती भाषामें 'छुता' (छल) ॥ ३० ॥