श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें168 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/16-22 ]
मथुरासे आये महाप्रभुका सङ्ग पानेके लिये प्रयास :-
'मथुरा हैते प्रभु आइला',—वार्त्ता यबे पाइला।
प्रभु-पाश चलिबारे उद्योग करिला ॥ 16 ॥
अनुवाद—'महाप्रभु मथुरासे लौट आये हैं',—
श्रीरघुनाथदासको जब यह समाचार मिला, तब वे
महाप्रभुके पास जानेका प्रयास करने लगे ॥ 16 ॥
सप्तग्रामके मुस्लिम चौधरी नवाबका वजीरकी
सहायतासे सप्तग्रामपर अधिकार :-
हेनकाले मुलुकेर एक म्लेच्छ अधिकारी।
सप्तग्राम-मुलुकेर से हय 'चौधुरी' ॥ 17 ॥
अनुवाद—उस समय उस प्रदेशमें एक मुसलमान
अधिकारी था। सप्तग्राम-प्रदेशका वह 'चौधुरी' था ॥ 17 ॥
अनुभाष्य—'चौधुरी',—जो प्रजासे उनके द्वारा देय
करमें-से एक चौथाई अपने भागको अपने पास रखकर
शेष धन भूमि-अधिकारीके पास खजानेमें जमा करते
हैं॥ 17 ॥
हिरण्यदास मुलुक निल 'मक्ररि' करिया।
तार अधिकार गेल, मरे से देखिया ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके ताऊ श्रीहिरण्यदासने राजासे
ताल-मेल करके सप्तग्राम-प्रदेशसे कर-संग्रहका अधिकार
स्थायीरूपसे अपने नामपर लिखवा लिया। मुसलमान
चौधुरीका अधिकार चले जानेपर वह श्रीहिरण्यदाससे
ईर्ष्या करने लगा ॥ 18 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मक्ररि',—इजारा (पट्टा देना),
(स्थायीरूपसे) व्यवस्था ॥ 18 ॥
अनुभाष्य—श्रीहिरण्यदासने सप्तग्राम-प्रदेशके कर-संग्रह
और भुगतानके कार्यकी स्थायीरूपसे व्यवस्था कर ली;
उससे मुसलमान चौधुरीको प्राप्त होनेवाला अंश सम्पूर्ण
रूपसे समाप्त हो गया, ऐसा देखकर उसके हृदयमें
बहुत क्रोध हुआ ॥ 18 ॥
बार लक्ष देय राजाय, साधे बिश लक्ष।
से 'तुरुक्' किछु ना पाञा हैल प्रतिपक्ष ॥ 19 ॥
अनुवाद—श्रीहिरण्यदास बीस लाख मुद्राएँ एकत्रित
करके कर-रूपमें राजाको बारह लाख मुद्राएँ देते थे।
वह 'तुर्क' (मुस्लिम चौधुरी) कुछ भी नहीं प्राप्त
करनेके कारण श्रीहिरण्यदासका प्रतिद्वन्द्वी बन गया ॥ 19 ॥
अनुभाष्य—बीस लाख करमें-से राजाको एक
चौथाई भाग (पाँच लाख) छोड़कर पन्द्रह लाख जमा
करनेके बदले बारह लाख जमा करनेपर वह तुर्क
अर्थात् मुसलमान स्वयंको प्राप्त होने वाले लाभसे
वञ्चित होकर उनका विरोधी बन गया ॥ 19 ॥
हिरण्य-गोवर्धनका भाग जाना
और श्रीरघुनाथका बन्धन :-
राज-घरे कैफियत् दिया उजीरे आनिल।
हिरण्यदास पलाइल, रघुनाथे बान्धिल ॥ 20 ॥
अनुवाद—उस मुस्लिम चौधुरीने राज-खजानेमें यह
समस्त जानकारी दी और श्रीहिरण्यदासको पकड़नेके
लिये वह राजाके मन्त्रीको अपने साथ लेकर सप्तग्राममें
आया। श्रीहिरण्यदास तो घरसे भाग गये, इसलिये
उन्होंने श्रीरघुनाथदासको पकड़ लिया ॥ 20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कैफियत्',—विवरण-पत्र ॥ 20 ॥
श्रीरघुनाथको मुस्लिम-चौधुरीके द्वारा डराना :-
प्रतिदिन रघुनाथे करये भर्त्सना।
“बाप-ज्येठारे आन', नहे पाइबा यातना ॥ ”21 ॥
अनुवाद—मुस्लिम चौधुरी प्रतिदिन आकर
श्रीरघुनाथदासको डराता-धमकाता और उनसे
कहता,—“अपने पिता और ताऊको लेकर आओ
अन्यथा तुम्हें यातनाएँ भोगनी पड़ेंगी ॥ ”21 ॥
श्रीरघुनाथके मुखके दर्शनसे स्नेहसे
आर्द्रीचित्त होकर लौटना :-
मारिते आसिया यदि देखे रघुनाथे।
मन फिरि' याय, तबे ना पारे मारिते ॥ 22 ॥