श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2178, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/140-145 पाँचवाँ अध्याय 161
'वेद-प्रवर्त्तक' किया और 'बालिश' शब्दका अर्थ
'बालक जैसे अभिमान रहित' किया। इसलिये इन्द्रके
इन दो शब्दोंका अर्थ इस प्रकार हुआ कि श्रीकृष्ण
वेद-प्रवर्त्तक होनेपर भी सरल गर्वहीन बालकके समान
व्यवहार करते हैं॥ 140॥
(3) 'स्तब्ध', (4) 'अज्ञ' :-
वन्द्याभावे 'अनम्र'—'स्तब्ध'-शब्दे कय।
याहा हैते अन्य 'विज्ञ' नाहि—से 'अज्ञ' हय॥ 141॥
अनुवाद—'अनम्र' अर्थात् जो किसीकी वन्दना नहीं
करते, सरस्वती देवीने 'स्तब्ध' शब्दका यह अर्थ किया।
सर्वश्रेष्ठ होनेके कारण श्रीकृष्णका कोई वन्दनीय नहीं
है, इसलिये वे अनम्र हैं। जिनसे अधिक विज्ञ कोई
नहीं हैं, वे ही अज्ञ हैं—ऐसा सरस्वतीदेवीने अर्थ
किया॥ 141॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'वन्द्याभावे 'अनम्र'—'स्तब्ध'-शब्दे
कय',— जिनका वन्दनीय अन्य कोई नहीं है, इसलिये
वे अनम्र हैं,—यह स्तब्ध-शब्दसे प्रकाशित होता है॥ 141॥
(5) 'पण्डिताभिमानी' और (6) 'मर्त्त्य' :-
पण्डितेर मान्य पात्र—हय 'पण्डितमानी'।
तथापि भक्तवात्सल्ये 'मनुष्य'-अभिमानी॥ 142॥
अनुवाद—'पण्डित मानिनम्' शब्दका ऐसा अर्थ भी
होगा कि श्रीकृष्ण विद्वानोंके भी सम्मानके पात्र हैं।
भक्तवात्सल्य गुणके कारण श्रीकृष्ण साधारण मनुष्यके
जैसे प्रकट होते हैं, इसलिये उनके लिये 'मर्त्त्य' शब्दका
भी प्रयोग किया जा सकता है॥ 142॥
विद्वेषी जरासन्धकी निन्दारूपी उक्तिका दृष्टान्त :-
जरासन्ध कहे,—“कृष्ण—पुरुष-अधम।
तोमार सङ्गे ना युझिमु, 'याहि बन्धुहन्'॥” 143॥
अनुवाद—जरासन्धने भी श्रीकृष्णकी निन्दा करते
हुए कहा,—“कृष्ण, तुम पुरुषोंमें अधम हो। मैं तुम्हारे
साथ युद्ध नहीं करूँगा, क्योंकि तुम अपने बन्धुओंका
वध करने वाले हो॥” 143॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'ना युझिमु, 'याहि बन्धुहन्'',—हे
बन्धुनाशक, तुम जाओ; तुम्हारे साथ युद्ध नहीं
करूँगा॥ 143॥
पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—जरासन्धने श्रीकृष्णको सम्बोधन करके
कहा,—“हे पुरुषाधम, हे बन्धुहन्, जाओ, मैं तुम्हारे साथ
युद्ध नहीं करूँगा।” जरासन्धके इन वचनोंके द्वारा शुद्धा
सरस्वती श्रीकृष्णका स्तव कर रही हैं—पुरुषाधम
शब्दका अर्थ (बहुव्रीहि-समास)—जिनसे समस्त पुरुष
अधम हैं अर्थात् 'पुरुषोत्तम'। [अमरकोष 3/1/68 के
अनुसार] संसारमें जो व्यक्ति उन्नतिकी आशा करता है,
वह 'बन्धु' कहलाता है, [बन्धन करनेके कारण] माया
अथवा अविद्या ही 'बन्धु' है; माया अथवा अविद्याका
हननकारी व्यक्ति ही 'बन्धुहा' है; सम्बोधनमें उसको
ही—'बन्धुहन्' कहा गया है॥ 143॥
शुद्धासरस्वतीके द्वारा इस प्रकारकी निन्दारूपी उक्तिसे भी
श्रीकृष्णस्तुति (1) 'पुरुषाधम' :-
याहा हैते अन्य पुरुषसकल—'अधम'।
सेइ हय 'पुरुषोत्तम'—सरस्वतीर मन॥ 144॥
अनुवाद—सरस्वती देवीने 'पुरुषाधम' शब्दका अर्थ
किया—जिनसे अन्य सभी पुरुष अधम हैं, वे 'पुरुषोत्तम'
हैं॥ 144॥
(2) 'बन्धुहन्' :-
'बान्धे सबारे'—ताते अविद्या 'बन्धु' हय।
'अविद्या-नाशक'—'बन्धुहन्'-शब्दे कय॥ 145॥
अनुवाद—सरस्वती देवीने अर्थ किया—'सभीको
बाँधकर रखनेवाली' होनेके कारण अविद्या 'बन्धु' है
और उस 'अविद्या-नाशक'को 'बन्धुहन्'-शब्दसे सम्बोधन
करते हैं॥ 145॥