श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें160 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/135-140 ]
द्वारा ही अपने आराध्य श्रीगौर-कृष्णका स्तव किया
है॥ 135॥
यैछे दैत्यादि करे कृष्णेर भर्त्सन।
सेइ-शब्दे सरस्वती करेन स्तवन॥ 136॥
अनुवाद-जैसे दैत्यादि अथवा कभी इन्द्र भी
श्रीकृष्णका तिरस्कार करते हैं, किन्तु सरस्वतीदेवी उन्हीं
शब्दोंके द्वारा ही श्रीकृष्णकी स्तुति कर देती हैं॥ 136॥
अक्षजज्ञानी इन्द्रकी निन्दा-उक्तिका दृष्टान्त :-
श्रीमद्भागवत (10/25/5) में-
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रु
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 137॥
अमृतप्रवाह भाष्य-इन्द्रने कहा,-इस वाचाल, मूर्ख,
स्तब्ध, अज्ञ, पण्डिताभिमानी मरणशील कृष्णका आश्रय
करके सभी गोपोंने मेरा अप्रिय कार्य किया है॥ 137॥
अनुभाष्य-
गोपाः वाचालं (बहुभाषिणं) बालिशं (शिशुं मूर्खं वा)
स्तब्धम् (अविनीतम्) अज्ञं (परिणामदर्शनहीनं) पण्डितमानिनं
(पण्डितम्मन्यं) मर्त्यं (मरणशीलं मानवं) कृष्णम् उपाश्रित्य
(अवलम्ब्य) मे (मम) अप्रियम् (अभिलषित-विरुद्धम् अपमानं)
चक्रु
स्तौति]-वाचालं (वाचा हेतुना अलं समर्थं शास्त्रयोनिं वेद-प्रवर्त्तकं)
बालिशं (शिशुवत् निरभिमानं गर्वहीनं) स्तब्धम् (अन्यस्य
वन्द्यस्य अभावात् अनम्रम्) अज्ञं (नास्ति ज्ञः बुद्धिमान्
यस्मात् सर्वज्ञं) पण्डितमानिनं (पण्डितानां ब्रह्मविदां बन्धमोक्षविदां
वा बहुसेव्यं बहुमाननीयमित्यर्थः) मर्त्यं (भक्तवात्सल्यान्मनुष्यतया
प्रतीयमानं) कृष्णं (सच्चिदानन्दरूपं परं ब्रह्म इत्यादिकं स्फुटम्)।
श्लोक-भावानुवाद-सभी गोपोंने इस वाचाल, मूर्ख
शिशु, अविनीत, परिणामका विचार नहीं करनेवाले,
पण्डिताभिमानी, मरणशील मानव कृष्णका आश्रय करके
मेरे विरुद्ध कार्य (अपमान) किया है।
[इन्द्रने जो श्रीकृष्णकी निन्दा की है, वाग्-अधिष्ठात्री
शुद्धा सरस्वतीने उसके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति की
है]-वाचाल (वेद-शास्त्रोंके प्रवर्त्तक), बालिश (शिशुके
समान गर्वहीन), स्तब्ध (जिनके लिये कोई भी पूजनीय
नहीं), अज्ञ (जिनके समान ज्ञानी और कोई नहीं,
इसलिये सर्वज्ञ), पण्डिताभिमानी (संसार बन्धन और
मोक्षके कारणको जाननेवाले होनेके कारण पण्डितोंके
द्वारा सम्मानित), मर्त्य (भक्तवात्सल्यवशतः मनुष्यरूपमें
प्रतीत होनेवाले) श्रीकृष्ण सच्चिदानन्दरूप परंब्रह्म हैं॥ 137॥
प्राकृत अहङ्कारसे गर्वित इन्द्र :-
ऐश्वर्य-मदे मत्त इन्द्र,–येन मातोयाल।
बुद्धिनाश हैल, केवल नाहिक साम्भाल॥ 138॥
अनुवाद-ऐश्वर्यके मदमें इन्द्र ऐसा मतवाला हो
गया था जैसे मद्यपान करनेवालेको भले-बुरेका ज्ञान
नहीं रहता। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और वह अपने
जिह्वावेगको सम्भाल नहीं पाया, इसलिये वह श्रीकृष्णकी
निन्दा करने लगा॥ 138॥
अनुभाष्य- 'साम्भाल',- (हिन्दी शब्द), व्यवहारिक
ज्ञान अथवा सावधानता; चलती [बङ्गला] भाषामें
'सामाल' [हिन्दी अर्थ-सावधान होना]॥ 138॥
इन्द्रके मुखसे निकली निन्दारूपी उक्तिके
द्वारा ही शुद्धा-सरस्वतीकी कृष्णस्तुति :-
इन्द्र बले,–“मुञि कृष्णेर करियाछि निन्दन।”
तारइ मुखे सरस्वती करेन स्तवन॥ 139॥
अनुवाद-इन्द्रने विचार किया, – “मैंने कृष्णकी निन्दा
की है।” किन्तु सरस्वती देवीने उसीके मुखसे परोक्षरूपसे
श्रीकृष्णकी स्तुति करवा दी॥ 139॥
शुद्धासरस्वतीके द्वारा शब्दोंकी व्याख्या-
(1) 'वाचाल' और (2) 'बालिश' :-
'वाचाल' कहिये–'वेदप्रवर्त्तक' धन्य।
'बालिश'-तथापि 'शिशुप्राय' गर्वशून्य॥ 140॥
अनुवाद-सरस्वती देवीने 'वाचाल' शब्दका अर्थ