श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1940, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 25/117-122 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
जिस स्थानमें दिखलायी नहीं देता, उसको 'तमः' अथवा
'अन्धकार' कहा जाता है। चित्-जगत् भगवत्स्वरूपकी
किरणस्वरूप है। उसके समान ही दिखायी देनेवाला
आभासरूप मायावैभव है; यही आभासका उदाहरण है।
चित्-तत्त्वसे बहुत दूर अन्धकार जो मायावैभव है; वही
दूसरा उदाहरण है। तात्पर्य यह है कि आत्मतत्त्व और
मायातत्त्वका परस्पर दो प्रकारका सम्बन्ध है; पहला
सम्बन्ध इस प्रकार है-आत्मस्वरूपके अतिरिक्त जो भी
अन्य स्वरूप प्रकाशित होता है, वह 'माया' है और
आत्मस्वरूपसे बहुत दूर अनात्म अज्ञान भी माया
है॥ 117 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 1/54 संख्या देखें ॥ 117 ॥
चौथे श्लोकमें श्रौतपन्थामें देश-काल-पात्र-दशाके निरपेक्ष
अभिधेय साधन-भक्तिकी आवश्यकताका विचार :-
'अभिधेय' साधनभक्तिर शुनह विचार।
सर्व-जन-देश-काल-दशाते व्याप्ति यार ॥ 118 ॥
अनुवाद-अब 'अभिधेय' जो साधनभक्ति है, उसके
विषयमें सुनो। इस साधनभक्तिका अनुष्ठान सभी
व्यक्तियोंके द्वारा, सभी स्थानोंपर, सब समयमें और सभी
अवस्थाओंमें किया जा सकता है॥118॥
अनुभाष्य-अभिधेय 'साधनभक्ति' सभी पात्र, देश,
काल और अवस्थामें व्याप्त रहती है॥118॥
साधनभक्तिका अभिधेय-चतुर्वर्गसे अतीत :-
'धर्मादि' विषये यैछे ए 'चारि' विचार।
साधन-भक्ति-एइ चारि विचाररे पार ॥ 119 ॥
अनुवाद-धर्मादिके (धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके) विषयमें
देश-काल-पात्र-अवस्था-इन चारोंका विचार होता है।
साधनभक्तिके अनुष्ठानमें इनका कोई विचार नहीं होता
अर्थात् साधनभक्ति इन सबसे अतीत है॥ 119 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-गुरुसे शिक्षा प्राप्त करनेके लिये
जिस प्रकार धर्मशास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन
चार तत्त्वोंका विचार हुआ है, तत्त्वशास्त्रमें भी उसी
प्रकार विचार करनेके लिये 'ज्ञान', 'विज्ञान', 'तदङ्ग'
और 'तद्-रहस्य'का उपदेश किया गया है। किन्तु
यहाँपर देखने योग्य यह है कि धर्मादि चार विषय
सामान्य संसार-नीतिके अनुगत हैं, किन्तु इन तात्त्विक
चारोंका (ज्ञान-विज्ञानादिका) विचार वैसा नहीं है।
तात्त्विक चारोंमें प्राथमिक जो साधनभक्ति है, वह भी
धर्मादि चार तत्त्वोंसे ऊपर अथवा श्रेष्ठ है॥ 119 ॥
सद्गुरुकी सेवा और परिप्रश्नके द्वारा
दिव्य-ज्ञानकी प्राप्तिके साथ शुद्धभक्तिके
तत्त्वको श्रवण करनेकी आवश्यकता :-
सर्व-देश-काल-दशाय जनेर कर्त्तव्य।
गुरु-पाशे सेइ भक्ति प्रष्टव्य, श्रोतव्य ॥ 120 ॥
अनुवाद-सभी देशोंमें, सब समय और सभी
अवस्थाओंमें सभी व्यक्तियोंका कर्त्तव्य है कि वे गुरुसे
भक्तिके विषयमें ही जिज्ञासा करें तथा उसीके विषयमें
सुनें ॥ 120 ॥
चतुःश्लोकीका चतुर्थ श्लोक :-
श्रीमद्भागवत (2/9/35) में-
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः।
अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ 121 ॥
अनुवाद-आत्मतत्त्वके जिज्ञासु व्यक्ति मेरे
स्वरूपतत्त्वका अन्वय-व्यतिरेक क्रमसे अथवा विधि-
निषेधके द्वारा विचार करके जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा
नित्य है, उस विषयमें ही परिप्रश्न करेंगे ॥ 121 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 1/56 संख्या देखें ॥ 121 ॥
तीसरे-श्लोकमें अभिधेयके अङ्गी 'रहस्य' अथवा प्रयोजनका
वर्णन; भक्तके हृदयमें भक्तके प्रेमके वशीभूत भगवान् और
भगवान्के हृदयमें भगवान्के प्रेमके वशीभूत भक्त-परस्पर-
समाश्लिष्ट अथवा आलिङ्गन करता हुआ विग्रह; भक्त
और भगवान्में अचिन्त्यभेदाभेद :-
आमाते ये 'प्रीति', सेइ 'प्रेम'- 'प्रयोजन'।
कार्यद्वारे कहि तार स्वरूप-लक्षण ॥ 122 ॥
494 ।