श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1939, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचीसवाँ अध्याय 25/113-117 ]
अनुभाष्य—निर्विशेषवादी भगवान्के व्यक्तिगत
सविशेष विग्रहको स्वीकार नहीं करते, इसलिये उनका
विचार भ्रमपूर्ण और सब प्रकारसे त्याज्य है—इसी
बातकी हृदयमें धारणा करानेके लिये तीन बार 'अहमेव'
कहकर 'सम्बन्ध' स्थापित किया है॥ 113 ॥
चतुःश्लोकीके द्वितीय श्लोकमें 'अन्तरङ्ग-स्वरूप'के अतिरिक्त
'तटस्थ-जीव' और 'बहिरङ्गा गुण-माया'-शक्तिका लक्षण
और उसकी प्रतीतिका विचार; जीवका भी
गुण-मायातीत-स्वरूप, अथवा अन्तरङ्ग-दर्शनमें निरपेक्ष
विशुद्ध स्वरूपानुभव अथवा-'विज्ञान'; जीव अथवा
गुणमायाका दर्शन 'स्वरूप-दर्शन' नहीं :-
एइ सब शब्दे हय—'ज्ञान'-'विज्ञान'-विवेक।
माया-कार्य, माया हैते आमि—व्यतिरेक ॥ 114 ॥
अनुवाद—[चतुःश्लोकीके प्रथम और द्वितीय श्लोकके]
शब्दोंसे भगवतत्त्वके 'ज्ञान' और 'विज्ञान'का
(भगवद्-स्वरूपकी अनुभूतिका) विवेक (यथार्थ ज्ञान)
प्राप्त होता है। मायाका कार्य—जगत् और माया, दोनों
भगवान्की शक्ति हैं, तो भी भगवान् इन दोनोंसे भिन्न
हैं॥ 114 ॥
सूर्य, आभास और तमः—एक ही वस्तुकी
विभिन्न प्रतीतियोंका दृष्टान्त :-
यैछे सूर्येर स्थाने भासये 'आभास'।
सूर्य बिना स्वतः तार ना हय प्रकाश ॥ 115 ॥
'ज्ञान' और 'विज्ञान'को लेकर ही
सम्बन्ध-तत्त्व निरूपित :-
मायातीत हैले हय आमार 'अनुभव'।
एइ 'सम्बन्ध'-तत्त्व कहिलुँ शुन आर सब ॥ 116 ॥
अनुवाद—जैसे कभी सूर्यके स्थानपर उसका प्रतिबिम्ब
दिखलायी पड़ता है, परन्तु उसका प्रकाश सूर्यसे स्वतन्त्र
नहीं है। मायाके बन्धनसे मुक्त होनेपर ही मेरा अनुभव
होता है, इसी सम्बन्ध-तत्त्वको मैंने प्रथम दो श्लोकोंमें
कहा है। अब अन्य तत्त्वोंके (अभिधेय और प्रयोजन
तत्त्वोंके) विषयमें सुनो ॥ 115-116 ॥
अनुभाष्य—'ज्ञान'-शास्त्रसे उत्पन्न, 'विज्ञान'-अनुभव।
गुरु अथवा शास्त्रके अतिरिक्त अन्य कहींसे आनेवाला
'विवेक' बहुत बार मनोधर्म अथवा निर्विशेष-परायण
होता है। अपनी अनुभूतिसे विवेकके उदित होनेपर
भगवद्-विग्रहकी उपलब्धि होती है। भगवान्का
अपना-विग्रह—माया और मायिक कार्यसे भिन्न है।
विज्ञानके उदित नहीं होने तक जीवको यह बोध नहीं
होता। जिस प्रकार सूर्यसे किरणें प्रकाशित होती हैं,
किन्तु किरणें—सूर्यसे भिन्न हैं, पुनः सूर्यके बिना
किरणोंका स्वतन्त्र प्रकाश भी सिद्ध नहीं होता, उसी
प्रकार भगवान् और माया—इन दोनोंकी (विजातीय)
विभिन्न प्रतीतिको जीव मायासे अतीत नहीं होनेपर
अनुभव नहीं करता अर्थात् मायाबद्ध-बुद्धिसे
भगवद्-विग्रहको समझा नहीं जा सकता ॥ 115-116 ॥
चतुःश्लोकीका द्वितीय श्लोक :-
श्रीमद्भागवत (2/9/33)में—
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥ 117 ॥
अनुवाद—पिछले श्लोकमें परमतत्त्वके स्वरूप-ज्ञानका
निर्णय किया गया। किन्तु स्वरूपसे भिन्न तत्त्वका ज्ञान
स्वरूपतत्त्वके ज्ञानको जब तक दृढ़ नहीं करता, तब
तक वह विज्ञान नहीं होता। स्वरूपतत्त्वसे भिन्न तत्त्वका
नाम 'माया' है। उसी मायातत्त्वका ज्ञान इस श्लोकमें
वर्णन किया गया है। स्वरूपतत्त्व ही 'अर्थ' अर्थात्
यथार्थ तत्त्व है। उस तत्त्वके बाहर जो प्रतीत होता है
और उस स्वरूप-तत्त्वमें जिसकी प्रतीति नहीं है,
उसीको ही आत्मतत्त्वके मायावैभव रूपमें जानना होगा।
इस तत्त्वको समझना सहज नहीं है, इसलिये यहाँ दो
प्रादेशिक उदाहरण दिये जा रहे हैं। स्वरूपतत्त्वको
सूर्यके समान मानो। सूर्यसे भिन्न तत्त्व दो रूपोंमें प्रतीत
होता है—एक रूप 'आभास' और दूसरा रूप 'तमः'।
जब सूर्यकी प्रतिच्छवि जलसे किसी दूसरे स्थानमें पड़ती
है, तब उसको 'आभास' कहा जाता है। सूर्यका प्रभाव
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