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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1903, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1903

शब्दका योग करेंगे। इसका अर्थ होगा कि मुनिगण भी
श्रीकृष्णका भजन करते हैं। इस प्रकार यह उनसठवाँ
अर्थ है। तब निर्ग्रन्थ-शब्द लेकर 'अपि'-शब्दको
निर्धारण रूपमें लेनेपर मैंने इन उनसठ प्रकारके
अर्थोंकी व्याख्या की है॥ 296-297॥
अनुभाष्य—अट्ठावन प्रकारके आत्माराम और
मुनिगण निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं, —यही
उनसठवाँ अर्थ है॥ 296-297॥
और एक प्रकारका अर्थ :—
सर्वसमुच्चये आर एक अर्थ हय।
'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थाश्च' भजय ॥ 298 ॥
'अपि'-शब्द—अवधारणे, सेइ चारि बार।
चारिशब्द-सङ्गे 'एव' करिबे उच्चार ॥ 299 ॥
अनुवाद—सभी शब्दोंको साथ लेनेपर एक और
अर्थ होता है। आत्माराम हो अथवा मुनि हो अथवा
निर्ग्रन्थ हो, सभी श्रीकृष्णका भजन करेंगे। 'अपि'-शब्द
तब निश्चयके रूपमें प्रयोग होता है, और चार बार
चारों शब्दोंके साथ 'एव'का उच्चारण हो सकता
है॥ 298-299॥
अनुभाष्य—सर्व समुच्चय अर्थात् आत्माराम, मुनि
और निर्ग्रन्थगण, सभी श्रीकृष्णभजन करते हैं। अपि-
शब्दका अवधारण अर्थात् निश्चय-अर्थ ग्रहण करके
साठ प्रकारके अर्थ हुए हैं॥ 299॥
महाप्रभुपादोक्त-व्याख्या :—
“उरुक्रमे एव भक्तिमेव
अहैतुकीमेव कुर्वन्त्येव ॥" 300 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 300 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम', 'भक्ति', 'अहैतुकी'
और 'कुर्वन्ति'—इन चार शब्दोंके साथ 'एव' योग
करके और एक अर्थ करूँगा ॥ 300 ॥
अमृतानुकरणा—'च'-शब्दसे सर्वसमुच्चयमें एक और
अर्थ होता है—'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थश्च'
अर्थात् आत्मारामगण, मुनिगण और निर्ग्रन्थगण, सभी
श्रीकृष्णका भजन करते हैं। उस स्थानपर जो अपि-शब्द
है, वह 'एव'-रूपमें अवधारण-अर्थमें (निश्चयके अर्थमें)
चार शब्दोंके साथ चार बार प्रयोग होगा, जैसे—
(1) 'उरुक्रम एव'—उरुक्रम-श्रीकृष्णकी ही, ब्रह्म, परमात्मा
अथवा अन्य भगवत्स्वरूपकी नहीं, (2) 'भक्तिम्
एव'—केवल भक्ति ही, कर्म-ज्ञान-योगादि नहीं,
(3) 'अहैतुकीम् एव'—अहैतुकी ही, धर्म, अर्थ, काम,
मोक्षादि स्वसुख- वासनादि किसी हेतु-निमित्त नहीं और
(4) 'कुर्वन्ति एव'—परस्मैपदमैं 'कुर्वन्ति' प्रयोगके कारण
(25 संख्या देखें) श्रीकृष्णप्रीतिके उद्देश्य मात्रसे ही
भक्ति करते हैं॥ 298-300 ॥
यहाँ तक साठ प्रकारके अर्थ :—
एइ त' कहिलुँ श्लोकेर 'षष्ठि' संख्यक अर्थ।
एक अर्थ शुन आर प्रमाणे समर्थ ॥ 301 ॥
सबसे अन्तमें और एक प्रकारका अर्थ—
आत्मा-शब्दसे 'क्षेत्रज्ञा-शक्ति' :—
'आत्मा'-शब्दे कहे—'क्षेत्रज्ञ-जीव'-लक्षण।
ब्रह्मादि कीटपर्यन्त—ताँर शक्तिते गणन ॥ 302 ॥
अनुवाद—अब तक मैंने श्लोकके 'साठ' अर्थ
बतलाये हैं। अब एक और अर्थ सुनो जिसका बड़ा
प्रबल प्रमाण है। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ है—'क्षेत्रज्ञ
जीव'। ब्रह्मासे लेकर क्षुद्र कीट तक जितने भी जीव
हैं—उन सबकी गणना श्रीकृष्णकी जीव-शक्तिमें होती
है॥ 301-302 ॥
विष्णुपुराण (6/7/61)में—
विष्णुशक्तिः पराः प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 303 ॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको
मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया
। 457