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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1902, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1902

[ 24/288-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
बत्तीस अर्थोंको मिलाकर कुल अट्ठावन अर्थ हो गये। जायेगा, उसके द्वारा ही सभी अट्ठावन प्रकारके
अब एक ओर प्रकारका अर्थ श्रवण करो ॥ 288 ॥ आत्मारामोंका अर्थ प्रकाशित होगा ॥ 292 ॥
अनुभाष्य-भक्तोंकी श्रेणीमें बत्तीस प्रकार (278 “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ-
संख्याका अनुभाष्य देखें) एवं ज्ञानियों और योगियोंकी उक्तार्थानामप्रयोगः ॥ ”293 ॥
श्रेणीमें छब्बीस प्रकार (276 संख्याका अनुभाष्य देखें)- अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च कपित्थवृक्षाश्च।
कुल मिलाकर अट्ठावन प्रकारके हुए ॥ 288 ॥ आम्रवृक्षाश्च वृक्षाः ॥ 294 ॥
च-शब्दके द्वारा अर्थ :- अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 293-294 ॥
इतरेतर 'च' दिया समास करिये। अमृतप्रवाह भाष्य-स्वरूपसे एक जैसे और एक
'आटात्रं'वार आत्माराम नाम लइये ॥ 289 ॥ विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक
'आत्मारामश्च आत्मारामश्च' आटात्रबार। स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं
शेषे सब लोप करि' राखि एकबार ॥ 290 ॥ होता है, जैसे,-'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर
अनुवाद-अट्ठावन अर्थोंमें आत्माराम-शब्दके साथ एक 'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है। 'वृक्षा:' (बहुवचन)
'च'-शब्दका समास करनेपर 'आत्मारामश्च, आत्मारामश्च' शब्दसे पीपलका वृक्ष, बड़का वृक्ष, बेलका वृक्ष,
अट्ठावन बार कहे जायेंगे। (पहले जैसे पयार 143में आमका वृक्ष सभीको कहा गया है; इसलिये यहाँपर
कहा गया है) आखिरीको छोड़कर अन्य सब लोप हो वृक्षोंके पृथक् पृथक् नामोंका प्रयोग नहीं किया गया
जायेंगे और अन्तमें एक ही रहेगा जो अन्य सबका है ॥ 293-294 ॥
सूचक होगा ॥ 289-290 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291-293 ॥
विश्वप्रकाश, पाणिनि और सिद्धान्त-कौमुदी :- “अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति” यैछे हय।
स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ तैछे सब आत्माराम कृष्णे भक्ति करय ॥ 295 ॥
उक्तार्थानामप्रयोग इति ॥ 291 ॥ अनुवाद-“अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति"-अर्थात्
अनुवाद-स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें इस वनमें वृक्ष फलते हैं- इस वाक्यमें वृक्षसे सभी
जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको प्रकारके वृक्षोंका बोध होता है, उसी प्रकारसे सभी
रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, आत्माराम श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं ॥ 295 ॥
जैसे,- 'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर एक 'मुनयश्च'-पदको गिनकर उनसठ प्रकारके अर्थ :-
'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है ॥ 291 ॥ 'आत्मारामश्च' समुच्चये कहिये च-कार।
अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291 ॥ 'मुनयश्च' भक्ति करे, -एइ अर्थ तार ॥ 296 ॥
आटात्रबारे आत्माराम, सब लोप हय। 'निर्ग्रन्था एव' हञा, 'अपि'-निर्द्धारणे।
एक आत्माराम-शब्दे आटात्र अर्थ हय ॥ 292 ॥ एइ 'ऊनषष्टि' प्रकार अर्थ करिलुँ व्याख्याने ॥ 297 ॥
अनुवाद-अट्ठावन बारमें अन्य सब आत्माराम अनुवाद-अट्ठावन बार आत्माराम-शब्दका उच्चारण
लोप हो जायेंगे, केवल एक आत्माराम शब्द ही रह करनेपर च-कारको समुच्चयमें लेनेपर उसमें मुनय-
456 ।