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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1859, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1859

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

चौबीसवाँ अध्याय 24/27-37 ]
[बायाँ स्तम्भ]
और मुक्ति—इन तीन प्रकारकी होती हैं। पहली है भुक्ति
जो अनन्त प्रकारकी है। सांसारिक भोगोंको ही भुक्ति
कहते हैं। सिद्धि—ये अठारह प्रकारकी और मुक्ति—पाँच
प्रकारकी होती है॥ 27-28॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सिद्धि'—अणिमादि अठारह
प्रकारकी सिद्धियाँ (भा: 11/15 अध्याय देखें)॥ 28॥
'अहैतुकी'-शब्दका अर्थ :—
एइ याँहा नाहि, सेइ भक्ति—'अहैतुकी'।
याहा हैते वश हय श्रीकृष्ण कौतुकी॥ 29॥
अनुवाद—भुक्ति, सिद्धि और मुक्ति—इन तीनोंकी
कामना जहाँपर नहीं है, उस भक्तिको 'अहैतुकी' कहते
हैं, जिसके द्वारा लीलामय श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते
हैं॥ 29॥
(7) 'भक्ति'-शब्दका अर्थ; दस प्रकारके भेद :—
'भक्ति'-शब्देर अर्थ हय दशविधाकार।
एक—'साधन', 'प्रेमभक्ति'—नव प्रकार॥ 30॥
'रति'-लक्षणा, 'प्रेम'-लक्षणा, इत्यादि प्रचार।
भावरूपा, महाभाव-लक्षणरूपा आर॥ 31॥
अनुवाद—'भक्ति'-शब्दका अर्थ दस प्रकारका होता
है। साधनभक्ति एक प्रकारकी और प्रेमभक्ति नौ
प्रकारकी होती है। नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति 'रति'-लक्षणासे
आरम्भ करके 'प्रेम'-लक्षणा आदिसे बढ़ती हुई भावरूपा
और महाभाव-लक्षणरूपा भक्ति तक बढ़ती है॥ 30-31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमभक्ति—नव प्रकार'—रति, प्रेम,
स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव—ये नौ
प्रकारकी प्रेमभक्ति है॥ 30॥
अनुभाष्य—साधन भक्तिका एक प्रकारका लक्षण
और प्रेम-भक्तिके नौ प्रकारके लक्षण हैं, जैसे रति
(भावभक्ति)-लक्षणा, प्रेम-लक्षणा, स्नेह-लक्षणा, मान-
लक्षणा, प्रणय-लक्षणा, राग-लक्षणा, अनुराग-लक्षणा,
भाव-लक्षणा और महाभाव-लक्षणा॥ 30-31॥
[दायाँ स्तम्भ]
शान्त और दास्यरसमें भक्तिकी सीमा :—
शान्त-भक्तेर रति बाड़े 'प्रेम' पर्यन्त।
दास्य-भक्तेर रति हय 'राग'दशा-अन्त॥ 32॥
सख्य और वात्सल्य-रसमें भक्तिकी सीमा :—
सखागणेर रति हय 'अनुराग' पर्यन्त।
पितृ-मातृ-स्नेह आदि 'अनुराग'-अन्त॥ 33॥
मधुररसमें भक्तिकी सीमा :—
कान्तागणेर रति पाय 'महाभाव'-सीमा।
'भक्ति'-शब्दे कहिलूँ एइ अर्थेर महिमा॥ 34॥
अनुवाद—शान्तरसके भक्तोंकी रति 'प्रेम' तक ही
बढ़ती है। दास्यरसके भक्तोंकी रति 'राग'-दशा तक
बढ़ती है। सखाओंकी रति 'अनुराग' तक बढ़ती है।
पिता-माताका स्नेहादि 'अनुराग'की अन्तिम सीमा तक
बढ़ता है। व्रजगोपियोंकी रति 'महाभाव' तक बढ़ती है।
ये कुछ 'भक्ति'-शब्दके महिमामय अर्थ हैं॥ 32-34॥
(8) 'इत्थम्भूतगुण' (इत्थम्भूत + गुण)
शब्दके अर्थकी व्याख्या :—
'इत्थम्भूतगुणः'-शब्देर शुनह व्याख्यान।
'इत्थम्भूत'-शब्देर भिन्न अर्थ, 'गुण'-शब्देर आन॥ 35॥
'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ :—
'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ—पूर्णानन्दमय।
याँर आगे ब्रह्मानन्द तृणप्राय हय॥ 36॥
अनुवाद—अब 'इत्थम्भूतगुणः' शब्दकी व्याख्या श्रवण
करो। इसमेंसे 'इत्थम्भूत'-शब्दके अर्थ 'गुण'-शब्दके
अर्थसे भिन्न हैं। 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ पूर्णानन्दमय
है, जिसके आगे ब्रह्मानन्द तृणकी भाँति प्रतीत होता
है॥ 35-36॥
हरिभक्तिसुधोदय (14/36)में—
त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे।
सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥ 37॥
अनुवाद—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार
। 413