सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1858, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1858

[ 24/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
यस्मात् [कारणात् त्रिविक्रमावतारे] अस्खलता (प्रतिघातशून्येन)
स्वरंहसा (स्वपादवेगेन) त्रिसाम्यसदनात् (त्रिगुणसाम्यरूपं सदनम्
अधिष्ठानं प्रधानं तस्मात् आरभ्य) उरुकम्पयानम् (अधिककम्पमानं)
त्रिपृष्ठं (सत्यलोकं) चस्कम्भ (धृतवान्)।-मन्त्रः (ऋग्वेदे
प्रथम मः 154 सूः प्रथम श्लोक)-“ॐ विष्णोर्नु वीर्याणि कं
प्रावोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि। योऽस्कम्भयदुत्तरं सधस्थं
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः” इति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (ऋग्वेद
मन्त्र)-जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकको बनानेवाले
हैं, जो देवताओंके निवास स्थान द्युलोकको स्थिर कर
देते हैं, जो तीन पगोंसे तीनों लोकोंमें विचरण करनेवाले
हैं (अथवा उन्हें मापनेवाले हैं), उन विष्णुके वीरतापूर्ण
कार्योंका कहाँ तक वर्णन करें?॥21॥
स्वरूप और माया-शक्तिवैभव-तीनों धामोंमें शक्ति अथवा
पराक्रमका विभिन्न परिचय :-
विभूरूपे व्यापे, शक्त्ये धारण-पोषण।
माधुर्यशक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये परव्योम॥22॥
मायाशक्त्ये ब्रह्माण्डादि-परिपाटी-सृजन।
‘उरुक्रम’-शब्देर एइ अर्थ निरूपण॥23॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें। भगवान् ‘उरुक्रम’-शब्दका
यही अर्थ है॥22-23॥
अनुभाष्य-भगवान् विभूरूपमें त्रिभुवनमें व्याप्त रहते
हैं और शक्तिके द्वारा उन्हें धारण तथा उनका पोषण
करते हैं। वे माधुर्यशक्तिके द्वारा गोलोकको धारण और
पोषण करते हैं। ऐश्वर्यशक्तिके द्वारा परव्योमको धारण
और पोषण करते हैं। और मायाशक्तिके द्वारा
ब्रह्माण्डादिका परिपाटीरूपसे सृजन करते हैं॥22-23॥
क्रमशब्दका समानार्थक शब्द :-
विश्वप्रकाशमें-
“क्रमः शक्तौ परिपाट्यां क्रमचालनकम्पयोः॥”24॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥24॥
अमृतप्रवाह भाष्य-क्रम-शब्दका अर्थ-शक्ति, परिपाटी,
चालन और कम्पन है॥24॥
(5) ‘कुर्वन्ति’-क्रियाके परस्मैपदका कारण :-
‘कुर्वन्ति’-पद-एइ परस्मैपद हय।
कृष्णसुखनिमित्त भजने तात्पर्य कहय॥25॥
अनुवाद-‘कुर्वन्ति’-पद परस्मैपदरूपमें व्यवहार किया
गया है। वे श्रीकृष्णके सुखके लिये ही भजन करते
हैं, इसलिये परस्मैपद व्यवहार करनेका यही तात्पर्य
है॥25॥
अनुभाष्य-‘कुर्वन्ति’-पद-परस्मैपद रूपमें प्रयोग किया
गया है; (फलकी प्राप्ति) कर्त्ताका अभिप्राय होनेपर
‘आत्मनेपद’का प्रयोग होता है। किन्तु यहाँपर श्रीकृष्णके
सुखके लिये वे भजन करते हैं, ऐसा तात्पर्य व्यवहार
हुआ है, इसलिये यहाँपर ‘कुर्वन्ति’का परस्मैपदीय प्रयोग
है॥25॥
प्रमाण :-
पाणिनिमें 1/3/72; सिद्धान्त-कौमुदीमें भ्वादि-प्रकरणमें-
“स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले॥”26॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥
अमृतप्रवाह भाष्य-उभयपदी (दो पदवाली) धातुका
उच्चरित स्वर और ञ ‘इत’ होता है। क्रियाका फल
यदि कर्त्ताका अभिप्राय होता है, तब वहाँ ‘आत्मनेपद’
होता है। इस स्थानपर ऐसा नहीं होनेके कारण
‘परस्मैपद’का प्रयोग हुआ है॥26॥
(6) ‘अहैतुकी’-शब्दके अन्तर्गत ‘हेतु’-शब्दके
तीन प्रकारके दार्शनिक अर्थ :-
हेतु’-शब्दे कहे-भुक्ति-आदि वाञ्छान्तरे।
भुक्ति, सिद्धि, मुक्ति-मुख्य एइ तिन प्रकारे॥27॥
भुक्ति, सिद्धि और मुक्तिमें अन्तर :-
एक भुक्ति कहे, भोग-अनन्त प्रकार।
सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति-पञ्चविधाकार॥28॥
अनुवाद-‘हेतु’-शब्दसे भुक्ति आदिकी इच्छाओंको
कहा जाता है। मुख्य रूपसे ये इच्छाएँ भुक्ति, सिद्धि
412 ।