श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1561, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/154–163 ]
यमुनाके दर्शनमात्रसे ही उसमें कूद जाना :- प्रेमावेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। एक
पथे याँहा याँहा हय यमुना-दर्शन। ब्राह्मण महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा और वह भी प्रेममें
ताँहा झाँप दिया पड़े प्रेमे अचेतन ॥ 154 ॥ आविष्ट होकर उनके साथ नृत्य करने लगा ॥ 157–158 ॥
अनुवाद—मार्गमें जहाँ-जहाँ भी महाप्रभुको यमुनाका दोनोंका नृत्य-कीर्तन :-
दर्शन होता, वे वही छलाँग लगाकर उसमें कूद पड़ते दुँहे प्रेमे नृत्य करि' करे कोलाकुलि।
तथा प्रेममें अचेतन हो जाते ॥ 154 ॥ 'हरि' 'कृष्ण' कहे दुँहे बलि बाहु तुलि' ॥ 159 ॥
मथुराके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुवाद—दोनों प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे थे और
मथुरा-निकटे आइला—मथुरा देखिया। उन्होंने एक-दूसरेको गले लगाया। अपनी भुजाओंको
दण्डवत् हञा पड़े प्रेमाविष्ट हञा ॥ 155 ॥ उठाकर दोनों 'हरि' 'कृष्ण' आदि नामोंका कीर्तन कर
रहे थे ॥ 159 ॥
अनुवाद—मथुराके निकट आनेपर मथुराको देखकर
महाप्रभु भूमिपर पड़ गये और प्रेमाविष्ट होकर दण्डवत् लोगोंका कोलाहल, पुजारीके द्वारा
प्रणाम किया ॥ 155 ॥ महाप्रभुके गलेमें माला देना :-
लोक 'हरि' 'हरि' बोले, कोलाहल हैल।
विश्राम-घाटमें स्नान और योगपीठमें श्रीकेशव-दर्शन :- 'केशव'-सेवक प्रभुके माला पराइल ॥ 160 ॥
मथुरा आसिया कैला 'विश्राम-तीर्थे' स्नान।
'जन्मस्थाने' 'केशव' देखि' करिला प्रणाम ॥ 156 ॥ अनुवाद—वहाँ उपस्थित सभी लोग जोर-जोरसे
'हरि' 'हरि' बोलकर कीर्तन करने लगे, वहाँ कोलाहल
अनुवाद—मथुरामें आकर महाप्रभुने विश्राम-घाटपर मच गया। भगवान् श्रीकेशवके सेवकने महाप्रभुको
स्नान किया। तब महाप्रभु श्रीकृष्ण-जन्मभूमिपर आये माला लाकर पहनायी ॥ 160 ॥
और वहाँ भगवान् श्रीकेशवको देखकर उन्हें प्रणाम
किया ॥ 156 ॥ महाप्रभुके प्रेमकी 'अलौकिक'के रूपमें लोगोंको प्रतीति :-
लोके कहे, प्रभु देखि' हञा विस्मय।
अमृतप्रवाह भाष्य— विश्राम-तीर्थ'—प्रसिद्ध विश्रामघाट। ऐछे हेन प्रेम 'लौकिक' कभु नय ॥ 161 ॥
'जन्मस्थाने केशव'—श्रीकृष्णके जन्म स्थानपर श्रीकेशवजीकी
मूर्ति ॥ 156 ॥ अलौकिक होनेके कारणका निर्देश :-
याँहार दर्शने लोके प्रेमे मत्त हञा।
महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर लोगोंका विस्मय :- हासे, कान्दे, नाचे, गाय, कृष्णनाम लञा ॥ 162 ॥
प्रेमावेशे नाचे, गाय, सघने हुङ्कार।
प्रभुर प्रेमावेश देखि' लोके चमत्कार ॥ 157 ॥ निश्चय सिद्धान्त :-
सर्वथा निश्चित—इँहो—कृष्ण-अवतार।
एक ब्राह्मणका महाप्रभुके आनुगत्यमें मथुरा आइला लोकेर करिते निस्तार ॥ 163 ॥
प्रेमावेशमें नृत्यगान :-
एकविप्र पड़े प्रभुर चरण धरिया। अनुवाद—महाप्रभुको प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते
प्रभु-सङ्गे नृत्य करे प्रेमाविष्ट हञा ॥ 158 ॥ देखकर लोग विस्मित हो गये और कहने लगे कि ऐसा
प्रेम कभी भी 'लौकिक' नहीं है। जिनके दर्शनमात्रसे
अनुवाद—महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य कर ही लोग प्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते
रहे थे, गा रहे थे और जोरसे हुङ्कार कर रहे थे, उनके
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