सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1560, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1560

[ 17/146-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ब्राह्मणपर कृपा करनेके बाद महाप्रभुकी मथुरा यात्रा :-
एत बलि' सेइ विप्रे आत्मसात् करि'।
प्राते उठि' मथुरा चलिला गौरहरि ॥ 146 ॥
तीन लोगोंके द्वारा महाप्रभुका अनुगमन और
महाप्रभुके आग्रहसे लौटकर जाना :-
सेइ तीन सङ्गे चले, प्रभु निषेधिल।
दूर हैते तिनजने घरे पाठाइल ॥ 147 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उस ब्राह्मणको
अपने भक्तके रूपमें ग्रहण कर लिया। अगले दिन
प्रातःकालमें उठकर श्रीगौरहरि मथुराकी ओर चल दिये।
श्रीतपन मिश्र, श्रीचन्द्रशेखर तथा महाराष्ट्र
तीनों उनके साथ चलने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें
सङ्ग चलनेसे मना किया और दूरसे महाप्रभुने उन्हें घर
लौट जानेके लिये कहा ॥ 146-147 ॥
तीनोंका एक साथ मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान :-
प्रभुर विरहे तिने एकत्र मिलिया।
प्रभुगुण गान करे प्रेमे मत्त हञा ॥ 148 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके मथुरा चले जानेके बाद उनके
विरहमें वे तीनों परस्पर मिलकर महाप्रभुके गुणोंका गान
करते थे। इस प्रकार वे प्रेममें मत्त हो जाया करते
थे॥ 148 ॥
प्रयागमें आकर स्नानके बाद वेणीमाधवके दर्शनसे
महाप्रभुका नृत्य-कीर्तन :-
'प्रयागे' आसिया प्रभु कैल नदी-स्नान।
'माधव' देखिया प्रेमे कैल नृत्यगान ॥ 149 ॥
अनुवाद—काशीसे महाप्रभु प्रयागमें आये और वहाँ
त्रिवेणीके सङ्गममें स्नान किया। तब उन्होंने 'वेणी-माधव'
विग्रहके दर्शन करके प्रेममें नृत्य और गान किया ॥ 149 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'माधव'—वेणीमाधव ॥ 149 ॥
अनुभाष्य—'प्रयाग'—
“प्रकृष्टः यागः यागफलं यस्मात्”
[अर्थात् “प्रकृष्टरूपसे यज्ञका फल है जिसका”]
तीर्थराज, गङ्गा और यमुनाका सङ्गम अथवा
'त्रिवेणी'—वर्तमान इलाहाबाद दुर्गसे कुछ दूरीपर प्राचीन
'प्रतिष्ठानपुर' अथवा वर्तमान 'झूसी' ॥ 149 ॥
यमुनाके दर्शनसे व्रजलीलाके उद्दीपनके कारण उसमें
कूदना, भट्टके द्वारा उन्हें निकालना :-
यमुना देखिया प्रेमे पड़े झाँप दिया।
आस्ते-व्यस्ते भट्टाचार्य उठाय धरिया ॥ 150 ॥
अनुवाद—यमुनाको देखकर महाप्रभुने प्रेमावेशमें
उसमें छलाँग लगा दी। बलभद्र भट्टाचार्यने तुरन्त उन्हें
पकड़कर बाहर निकाला ॥ 150 ॥
प्रयागमें तीन दिन लोगोंका उद्धार :-
एइमत तिनदिन प्रयागे रहिला।
कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 151 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु तीन दिन तक
प्रयागमें रहे। उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम देकर लोगोंका
उद्धार किया ॥ 151 ॥
मथुराके मार्गमें जाते समय लोगोंका उद्धार :-
'मथुरा' चलिते पथे यथा रहि' याय।
कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोकेरे नाचाय ॥ 152 ॥
अनुवाद—मथुरा जानेके मार्गमें महाप्रभु जहाँ भी
विश्रामके लिये रुकते, वे वहींपर ही श्रीकृष्ण-नाम-प्रेम
देकर लोगोंको नचाते थे ॥ 152 ॥
दक्षिण देशकी भाँति पश्चिम देशका भी उद्धार :-
पूर्वे येन 'दक्षिण' याइते लोक निस्तारिला।
'पश्चिम'-देशे तैछे सब 'वैष्णव' करिला ॥ 153 ॥
अनुवाद—दक्षिण भारतकी ओर जाते समय
महाप्रभुने जिस प्रकार लोगोंका उद्धार किया था, उसी
प्रकार उन्होंने पश्चिम भारतमें भी सभीको वैष्णव बना
दिया ॥ 153 ॥
114 |

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1560, कुल 2549 में से · SarvaKosh