श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1502, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/59-67 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা
अनुवाद-चातुर्मास्यके अन्तमें महाप्रभु पुनः
श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ प्रतिदिन एकान्तमें कुछ
परामर्श करते। वे क्या परामर्श करते थे, इसे कोई नहीं
जान सका॥ 59 ॥
श्रीअद्वैताचार्यका रहस्यपूर्ण पहेलीका पाठ :-
आचार्य-गोसाञि प्रभुके कहे ठारे-ठोरे।
आचार्य तर्ज्जा पड़े, केह बुझिते ना पारे ॥ 60 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको सङ्केतसे कुछ-
कुछ कहा और कुछ पद्य पढ़े, जिन्हें कोई नहीं समझ
पाया था॥ 60 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'तर्ज्जा'-पय़ार आदि छन्दमय
बातें, जिन्हें दूसरे लोग आसानीसे नहीं समझ सकते॥ 60 ॥
महाप्रभुके द्वारा पहेलीमें कहे गये विचारको
स्वीकार करनेसे श्रीअद्वैतको आनन्द :-
ताँर मुख देखि' हासे शचीर नन्दन।
अङ्गीकार जानि' आचार्य करेन नर्त्तन ॥ 61 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके मुखको देखकर महाप्रभु
हँसने लगे। इसीसे वे समझ गये कि महाप्रभुने मेरी
बातको स्वीकार कर लिया है और वे नृत्य करने
लगे॥ 61 ॥
श्रीगौर और श्रीअद्वैतका परस्परमें संलापादि-दूसरोंकी
समझसे परे; महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतको विदायी देना :-
किवा प्रार्थना, किवा आज्ञा-केह ना बुझिल।
आलिङ्गन करि' प्रभु ताँरे विदाय दिल ॥ 62 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने क्या प्रार्थना की थी और
महाप्रभुने उन्हें क्या आज्ञा दी थी-इसे कोई भी नहीं
समझ पाया। महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको आलिङ्गन
करके विदायी दी ॥ 62 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीअद्वैताचार्यने पयारोंके द्वारा
क्या प्रार्थना की और श्रीशचीनन्दनके हँसनेका भी क्या
अर्थ हुआ,-उसे और कोई भी नहीं समझ पाया॥ 62 ॥
श्रीनिताइको प्रतिवर्ष पुरीमें नहीं आकर गौड़देशमें
नाम-प्रेम-प्रचार करनेका आदेश :-
नित्यानन्दे कहे प्रभु, - "शुनह श्रीपाद।
एइ आमि मागि, तुमि करह प्रसाद ॥ 63 ॥
प्रतिवर्ष नीलाचले तुमि ना आसिबा।
गौड़े रहि' मोर इच्छा सफल करिबा ॥ 64 ॥
श्रीनिताइके द्वारा महाप्रभुका अत्यन्त
कठिन कार्य करवाना :-
ताँहा सिद्धि करे-हेन अन्ये ना देखिये।
आमार 'दुष्कर' कर्म, तोमा हैते हुये ॥"65 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - 'सुनिये,
श्रीपाद! मैं आपसे कुछ माँगता हूँ, आप कृपा कीजिये।
आप प्रत्येक वर्ष नीलाचल मत आना और गौड़देश
(बङ्गाल)में रहकर मेरी इच्छाको पूर्ण करना। वहाँ मेरी
अभिलाषाको जो पूर्ण कर सके, ऐसा मैं किसी अन्यको
नहीं देखता हूँ। मेरा यह अत्यन्त कठिन कार्य केवल
आपके द्वारा ही हो सकता है॥"63-65 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-गौड़देशमें महाप्रभुकी अनुपस्थितिमें
श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त कोई भी चण्डाल तकको
नाम-प्रेमदानरूपी महाप्रभुके उद्देश्यकी सिद्धि नहीं कर
सकता ॥ 64-65 ॥
महाप्रभुके भक्त प्रभु-नित्यानन्द :-
नित्यानन्द कहे, - "आमि 'देह', तुमि 'प्राण'।
'देह' 'प्राण' भिन्न নহে,-एइ त' प्रमाण ॥ 66 ॥
अचिन्त्यशक्त्ये कर तुमि ताहार घटन।
ये कराह, सेइ करि, नाहिक नियम ॥"67 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, - "मैं देह हूँ
और आप प्राण हैं। देह और प्राणमें कोई भेद नहीं
है-यही तो प्रमाण है। आप जो चाहते हैं, वह आपकी
अचिन्त्य शक्तिके द्वारा घटता है। आप मुझसे जो
कराते हैं, मैं बिना किसी प्रतिबन्धके वही करता
हूँ॥"66-67 ॥
56 ।