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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1480, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1480

[ 15/207–223 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उड़द और मूँगकी दालका सूप था। अन्य दोनोंमें
खट्टी-मीठी चटनी, दालकी बड़ी देकर पाँच-छः प्रकारकी
खट्टी चटनी आदि, मूँगकी दालका मीठा बड़ा, उड़दकी
दालका मीठा बड़ा, पके केलेका मीठा बड़ा, मीठे-घने
दूधसे बनी मिठाइयाँ, नारियलका पीठा और जितने भी
प्रकारके मीठे व्यञ्जन हो सकते हैं, उन सबको
परोसा। काँजी-बड़ा, दूधमें भिगोकर बनाया गया चिड़वा,
लौकीकी खीर और अन्यान्य जितने प्रकारके मीठे
व्यञ्जन बनाये, उनका वर्णन करनेमें भी मैं असमर्थ
हूँ। घी डालकर बनायी गयी खीरको मिट्टीके पात्रमें
भरकर उसमें चाँपाकला (एक प्रकारका केला), घना
दूध और आमको मिला दिया। अति स्वादिष्ट लस्सी
और भाँति-भाँतिके सन्देश (खोयेकी मिठाई) भी बनाये
थे। बङ्गाल और उड़ीसामें खाये जानेवाले अनेक खाद्य
पदार्थोंको बनाया ॥ 207-218 ॥
अनुभाष्य- 'उभारिल'—उड़ेल दिया। 'दुग्धतुम्बी'—दूधमें
पकी हुई लौकी। 'बेसर'—पिसी सरसों डालकर बनायी
गयी सब्जी, उड़ीसामें उसे 'बेसर' कहते हैं। 'शाक्रा'—चीनी
डालकर बनायी गयी सब्जी। 'भृष्ट-वार्त्ताकी'—बैंगन-भाजा;
'कुष्माण्ड-मान-चाकी'—छोटे-छोटे टुकड़े करके पेठे
और अरबीकी सब्जी। 'मधुराम्ल'—चटनी अथवा
खट्टा-मीठा। 'बड़ाम्ल'—दालकी बड़ीके साथ बनायी गयी
खट्टी चटनी। 'भृष्ट-माष-मुद्ग-सूप'—भुनी उड़दकी दाल
और भुनी मूँगकी दाल। 'माष-बड़ा'—उड़दकी दालका
बड़ा। 'दुग्ध-लकुलकी'—लौकीकी खीर ॥ 207-216 ॥
आसन और नैवेद्य-सज्जा :-
श्रद्धा करि' भट्टाचार्य सब कराइल।
शुभ्र-पीठोपरि सूक्ष्म वसन पातिल ॥ 219 ॥
दुइ-पाशे, सुगन्धि शीतल जल-झारी।
अन्न-व्यञ्जनोपरि दिल तुलसी-मञ्जरी ॥ 220 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रद्धापूर्वक श्रीभट्टाचार्यने सब
प्रकारके व्यञ्जनोंको बनाया। तब उन्होंने सफेद लकड़ीके
आसनपर एक महीन वस्त्र बिछाया। उन्होंने आसनके
दोनों ओर सुगन्धित शीतल जलसे भरी सुराहियाँ रखीं।
उन्होंने चावल और अन्य व्यञ्जनोंपर तुलसी मञ्जरियोंको
रखा ॥ 219-220 ॥
अनुभाष्य— 'शुभ्रपीठ'—सफेद चौकीके ऊपर एक
सूक्ष्म-वस्त्रके द्वारा आसन दिया गया ॥ 219 ॥
अमृतगुटिका, पिठा-पानादि आइल।
जगन्नाथ-प्रसाद सब पृथक् धरिल ॥ 221 ॥
अनुवाद—उन्होंने श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे अमृत-गुटिका
और पीठा-पाना आदि जो मँगावाया था, उस जगन्नाथजीके
प्रसादको अलगसे रखा ॥ 221 ॥
अनुभाष्य—ग्रन्थकार श्रीमद् कविराज गोस्वामीने
भोगके अति सुन्दर वर्णनके द्वारा अपने अति उत्कृष्ट
पाककला (रसोई बनानेकी कला) और प्रस्तुत करनेकी
निपुणताको यहाँ प्रकाशित किया है। मध्यलीला 3/44-45
संख्या देखें।
श्रीजगन्नाथ-प्रसादके साथ अपने घरपर बनाये गये
अप्रसादी या अनर्पित-नैवेद्यको उन्होंने मिलाकर एक
नहीं किया। वे इसके प्रति सावधान थे कि दोनों मिल
नहीं जाँय, इसलिये उन्हें पृथक्-पृथक् रखा ॥ 207-221 ॥
मध्याह्न-स्नानके बाद अकेले महाप्रभुका आगमन :-
हेनकाले महाप्रभु मध्याह्न करिया।
एकले आइल ताँर हृदय जानिया ॥ 222 ॥
चरण धुलाकर श्रीभट्टाचार्यका महाप्रभुको
घरके भीतर लाना :-
भट्टाचार्य कैल तब पाद-प्रक्षालन।
घरेर भितरे गेला करिते भोजन ॥ 223 ॥
अनुवाद—जब सब कुछ तैयारी हो गयी, तब
महाप्रभु दोपहरका स्नानादि कृत्य करनेके बाद
श्रीभट्टाचार्यकी हृदयकी अभिलाषा जानकर अकेले ही
उनके घरपर आये। श्रीभट्टाचार्यने महाप्रभुके चरणकमल
34 ।