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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1478

[ 15/196-203 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-अन्य आठ संन्यासी दो-दो दिन मेरे
घरपर भिक्षा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार एक-एक
व्यक्तिको एक-एक दिन भिक्षा करानेसे पूरा मास हो
जायेगा॥196॥
अनुभाष्य - 'आर अष्ट संन्यासी' अर्थात् 'और
आठ संन्यासी'-श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीदामोदर स्वरूपके
अतिरिक्त बाकी आठ लोग। 'पूर्ण हैल मासे' अर्थात्
'मास पूर्ण हो गया'-श्रीमहाप्रभुके 5 दिन, श्रीपरमानन्दपुरीके
5 दिन, श्रीदामोदर स्वरूपके 4 दिन, 8 अन्य संन्यासियोंके
16 दिन-कुल 30 दिन होनेसे एक मास पूर्ण हो
गया॥196॥
दस संन्यासियोंको एक साथ भिक्षा करानेसे यथायोग्य
मर्यादाकी रक्षामें असम्भावना-हेतु अपराधकी आशङ्का :-
बहुत संन्यासी यदि आइसे एक ठाञि।
सम्मान करिते नारि, अपराध पाइ ॥197॥
अनुवाद-बहुत संन्यासी यदि एक ही साथ आयेंगे,
तो मैं उनका उचित सम्मान नहीं कर पाऊँगा, अपितु
उनके प्रति अपराध हो जायेगा ॥197॥
कभी तो अकेले, और कभी
श्रीस्वरूपके साथ निमन्त्रण :-
तुमिह निज-छाये आसिबे मोर घरे।
कभु सङ्गे आनिबे स्वरूप-दामोदरे॥”198॥
अनुवाद-आप भी केवल अपनी छायाके साथ
अर्थात् अकेले ही मेरे घरपर आना और कभी
श्रीस्वरूप दामोदरको अपने साथ लाना॥”198॥
अमृतप्रवाह भाष्य-निज-छायें'-अपनी छाया लेकर
अर्थात् अकेले ॥198॥
महाप्रभुके अनुमोदनसे उस दिन उनको निमन्त्रण :-
प्रभुर इङ्गित पाञा आनन्दित मन।
सेइ दिन महाप्रभुर कैल निमन्त्रण ॥199॥
अनुवाद-सारी व्यवस्थाके लिये महाप्रभुकी सम्मतिसे
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका मन आनन्दित हो गया और
उसी दिन उन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया॥ 199 ॥
श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी, षाठीकी माता-महाप्रभुकी भक्त :-
‘षाठीर माता' नाम, भट्टाचार्येर गृहिणी।
प्रभुर महाभक्त तेंहो, स्नेहेते जननी ॥ 200 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी पत्नी 'षाठीकी माता'-नामसे
प्रसिद्ध थीं। वे महाप्रभुकी परम भक्त और स्नेहमें
उनकी माताके समान ही थीं॥ 200 ॥
षाठीकी माताका रसोई बनाना :-
घरे आसि' भट्टाचार्य ताँरे आज्ञा दिल।
आनन्दे षाठीर माता पाक चड़ाइल ॥ 201 ॥
अनुवाद-घरमें आकर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें रसोई
बनानेकी आज्ञा दी। षाठीकी माताने आनन्दसे रसोई
बनाना आरम्भ कर दिया ॥ 201 ॥
साग-फल आदि अनेक नैवेद्यका संग्रह :-
भट्टाचार्येर गृहे सब द्रव्य आछे भरि'।
येबा शाकफलादिक, आनिल आहरि' ॥ 202 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यके घरमें खानेका सामान सदा
पूर्ण मात्रामें रहता था। उसके अतिरिक्त जो कुछ साग,
फल चाहिये था, उसे वे स्वयं संग्रह करके ले
आये ॥ 202 ॥
अनुभाष्य- 'भरि"-पूर्ण; 'आहरि'-जुगाड़ करके ॥ 202 ॥
स्वयं श्रीभट्टाचार्यके द्वारा पत्नीकी
रसोई बनानेमें सहायता :-
आपनि भट्टाचार्य करे पाकेर सब कर्म।
षाठीर माता-विचक्षणा, जाने पाकेर कर्म॥203॥
अनुवाद-स्वयं श्रीभट्टाचार्य रसोई बनानेमें अपनी
पत्नीकी सहायता करने लगे। षाठीकी माता रसोई
बनानेमें बहुत अनुभवी थीं और उन्हें बहुत अच्छा
खाना बनाना आता था ॥ 203 ॥
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