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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1347, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1347

तेरहवाँ अध्याय 13/33-55 ]
नर्तक—श्रीअद्वैताचार्य। (ख) दूसरी मण्डलीके मूल
गायक—श्रीवास; पीछे दोहरानेवाले—1) श्रीगङ्गादास, 2)
(बड़े?) श्रीहरिदास, 3) श्रीमान्, 4) श्रीशुभानन्द, 5)
श्रीराम; नर्तक—श्रीनित्यानन्द प्रभु। (ग) तीसरी मण्डलीके
मूल गायक—श्रीमुकुन्द; पीछे दोहरानेवाले—1) श्रीवासुदेव
दत्त, 2) श्रीगोपीनाथ, 3) श्रीमुरारि, 4) श्रीकान्त, 5)
श्रीवल्लभसेन; नर्तक—श्रीहरिदास ठाकुर। (घ) चौथी
मण्डलीके मूल गायक—श्रीगोविन्द; पीछे दोहरानेवाले—1)
(छोटा?) श्रीहरिदास, 2) श्रीविष्णुदास, 3) श्रीराघव, 4)
श्रीमाधव, 5) श्रीवासुघोष; नर्तक—श्रीवक्रेश्वर। रथके
बाँयी ओर (ङ) पाँचवीं मण्डलीके गायक—कुलीन
ग्रामवासिगण; नर्तक—श्रीरामानन्द और श्रीसत्यराज। रथके
दाँयी ओर—(च) छठी मण्डलीके गायक—श्रीअद्वैताचार्यके
अनुगतजन; नर्तक—श्रीअच्युतानन्द। रथके पीछे—(छ)
सातवीं मण्डलीके गायक—खण्डवासिगण; नर्तक—श्रीनरहरि
और श्रीरघुनन्दन ॥ 33-48 ॥
महासंङ्कीर्त्तन-वर्णन :-
वैष्णवेर मेघ घटाय हइल बाद्ल।
कीर्त्तनानन्दे सब वर्षे नेत्र-जल ॥ 49 ॥
त्रिभुवन भरि' उठे कीर्त्तनेर ध्वनि।
अन्य वाद्यादिर ध्वनि किछुइ ना शुनि ॥ 50 ॥
अनुवाद—सभी वैष्णव मेघकी घटाके समान एकत्रित
होकर बादलकी भाँति छा गये और कीर्त्तनके आनन्दमें
उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी वर्षा होने लगी। कीर्त्तनकी
ध्वनिसे समस्त त्रिभुवन गूँजने लगा जिससे अन्य वाद्यों
आदिकी ध्वनि कुछ भी सुनायी नहीं दे रही थी ॥ 49-50 ॥
महाप्रभुका आचरण :-
सात ठाञि बुले प्रभु 'हरि' 'हरि' बलि'।
'जय जगन्नाथ', बलेन हस्तयुग तुलि' ॥ 51 ॥
अनुवाद—महाप्रभु अपने दोनों हाथोंको उठाकर
'हरि' 'हरि', 'जय जगन्नाथ' बोलते हुए सातों मण्डलियोंमें
भ्रमण कर रहे थे ॥ 51 ॥
महाप्रभुका सात रूपोंमें प्रकाश :-
आर एक शक्ति प्रभु करिल प्रकाश।
एककाले सात ठाञि करिल विलास ॥ 52 ॥
सबे कहे,—'प्रभु आछेन मोर सम्प्रदाय।
अन्य ठाञि नाहि या'न आमारे दयाय ॥ '53 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने एक ही समयमें सातों मण्डलियोंमें
प्रकट होकर विलास करते हुए एक और शक्तिका
प्रकाश किया। सब कहने लगे,—'महाप्रभु केवल हमारी
मण्डलीमें हैं और अन्य मण्डलीमें नहीं जा रहे हैं। वे
हमारे ऊपर ही कृपा वर्षण कर रहे हैं॥ '52-53 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार रासमें और
महिषियोंके साथ विलासमें श्रीकृष्ण एक साथ 'अनेक'
विग्रह होकर 'प्रकाशित' हुए थे, श्रीकृष्णचैतन्यने भी
उसी प्रकार उसी शक्तिको प्रकाशित करके प्रत्येक
मण्डलीमें स्वयंको 'प्रकाशित' किया था। प्रत्येक मण्डलीके
लोग यह समझ रहे थे कि 'महाप्रभु हमारी मण्डलीमें
ही हैं, दूसरी मण्डलीमें नहीं ॥ '52 ॥
महाप्रभुकी शक्ति, शुद्ध भक्तोंके ही दृष्टिगोचर :-
केह लक्षिते नारे प्रभुर अचिन्त्यशक्ति।
अन्तरङ्ग-भक्त जाने, याँर शुद्धभक्ति ॥ 54 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी अचिन्त्यशक्तिको कोई नहीं
देख पाया। एकमात्र अन्तरङ्ग भक्त जिनमें शुद्धभक्ति है,
वे ही इसे जान सके ॥ 54 ॥
कीर्त्तन-दर्शनसे श्रीजगन्नाथको आनन्द :-
कीर्त्तन देखिया जगन्नाथ हरषित।
सङ्कीर्त्तन देखे रथ करिया स्थगित ॥ 55 ॥
अनुवाद—कीर्त्तनको देखकर श्रीजगन्नाथ बहुत प्रसन्न
हुए और वे अपने रथको स्थगित करके सङ्कीर्त्तन देखने
लगे ॥ 55 ॥
। 503