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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1346, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1346

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ दिया गया है:

[ 13/33-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तीसरी मण्डलीमें श्रीमुकुन्द मूल गायक, पाँच लोग पीछे
गानेवाले, श्रीहरिदास ठाकुर ही नर्तक :-
वासुदेव, गोपीनाथ, मुरारि याँहा गाय।
मुकुन्द-प्रधान कैल आर सम्प्रदाय ॥ 40 ॥
श्रीकान्त, वल्लभसेन आर दुइ जन।
हरिदास ठाकुर ताँहा करेन नर्त्तन ॥ 41 ॥
अनुवाद - तीसरी मण्डलीमें श्रीमुकुन्दको प्रधान
कीर्तनीया नियुक्त किया और उनके सहायक गानेवाले
श्रीवासुदेव, श्रीगोपीनाथ, श्रीमुरारि, श्रीकान्त तथा श्रीवल्लभसेन
थे। इस मण्डलीमें श्रीहरिदास ठाकुर नर्तक थे ॥ 40-41 ॥
चौथी मण्डलीमें श्रीगोविन्द घोष ही मूल गायक, पाँच
लोग पीछे गानेवाले, श्रीवक्रेश्वर नर्तक :-
गोविन्द घोष-प्रधान कैल आर सम्प्रदाय।
हरिदास, विष्णुदास, राघव, याँहा गाय ॥ 42 ॥
माधव, वासुदेव-घोष, - दुइ सहोदर।
नृत्य करेन ताँहा पण्डित-वक्रेश्वर ॥ 43 ॥
अनुवाद - चौथी मण्डलीमें श्रीगोविन्दघोषको प्रधान
कीर्तनीया बनाया और इसमें श्रीहरिदास, श्रीविष्णुदास,
श्रीराघव, तथा दो भाई-श्रीमाधव और श्रीवासुदेव घोष,
कुल मिलाकर पाँच सहायक गायक थे और श्रीवक्रेश्वर
पण्डित नर्तक थे ॥ 42-43 ॥
रथके एक ओर कुलीनग्रामवासियोंका कीर्तन-दल :-
कुलीन-ग्रामेर एक कीर्त्तनीया-समाज।
ताँहा नृत्य करेन रामानन्द, सत्यराज ॥ 44 ॥
अनुवाद - कुलीन-ग्रामसे भी एक कीर्तनमण्डली
आयी थी और महाप्रभुने उसमें श्रीरामानन्द वसु और
श्रीसत्यराज खाँको नृत्य करनेके लिये नियुक्त किया ॥ 44 ॥
दूसरी ओर श्रीअद्वैताचार्यके अनुगतजन :-
शान्तिपुरेर आचार्येर एक सम्प्रदाय।
अच्युतानन्द नाचे तथा, आर सब गाय ॥ 45 ॥
अनुवाद - श्रीअद्वैताचार्यकी शान्तिपुरसे एक मण्डली
आयी थी जिसमें श्रीअच्युतानन्द नृत्य कर रहे थे और
अन्य सब गायक थे ॥ 45 ॥
रथके पीछे खण्डवासियोंके कीर्तनदलमें
श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन ही नर्तक :-
खण्डेर सम्प्रदाय करे अन्यत्र कीर्त्तन।
नरहरि नाचे ताँहा श्रीरघुनन्दन ॥ 46 ॥
अनुवाद - श्रीखण्डसे भी एक मण्डली आयी थी
जो रथके पीछे अन्य स्थानपर कीर्तन कर रही थी।
उसमें श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन नृत्य कर रहे
थे ॥ 46 ॥
सात सम्प्रदायोंके अवस्थानकी पुनः आलोचना :-
जगन्नाथेर आगे चारिसम्प्रदाय गाय।
दुइ पाशे दुइ, पाछे एक सम्प्रदाय ॥ 47 ॥
सात सम्प्रदाये बाजे चौद्द मादल।
यार ध्वनि शुनि' हैल वैष्णव पागल ॥ 48 ॥
अनुवाद - श्रीजगन्नाथके आगे चार मण्डलियोंमें गान
हो रहा था। रथके दोनों ओर एक-एक मण्डली और
पीछे एक मण्डली थी। सात मण्डलियोंमें कुल चौदह
मृदङ्ग बज रहे थे जिनकी ध्वनिको सुनकर वैष्णवगण
आनन्दसे पागल हो रहे थे ॥ 47-48 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'सात सम्प्रदाय' - पूर्वोक्त चारों
मण्डलियोंके साथ कुलीनग्रामकी मण्डली, शान्तिपुरकी
मण्डली और श्रीखण्डकी मण्डली मिलाकर कुल सात
मण्डलियाँ हुईं एवं दो-दो मृदङ्गके हिसाबसे चौदह
मृदङ्गोंके साथ कीर्तन हुआ ॥ 48 ॥
अनुभाष्य - 'गायन' - गायक; सात-मण्डलयोंका
क्रमपूर्वक विवरण इस प्रकार है-
श्रीजगन्नाथके रथके आगे- (क) पहली मण्डलीके
प्रधान (मूल) गायक-श्रीदामोदर स्वरूप; गायक (पीछे
दोहरानेवाले) - 1) श्रीदामोदर पण्डित, 2) श्रीनारायण,
3) श्रीगोविन्द दत्त, 4) श्रीराघव पण्डित, 5) श्रीगोविन्दानन्द;
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