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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1334

बारहवाँ अध्याय 12/188-195 ]
“नान्नदोषेण मस्करी”-एइ शास्त्र-प्रमाण।
आमि त' गृहस्थ-ब्राह्मण, आमार दोष-स्थान ॥191॥
'अपनेको गृहस्थ-ब्राह्मण' कहकर श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा
लौकिक स्मार्त्तसमाजके आनुगत्यकी छलना :-
जन्मकुलशीलाचार ना जानि याहार।
तार सङ्गे एक पंक्ति-बड़ अनाचार॥"192॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु एक
साथ बैठे थे और वहीं उन दोनोंमें प्रेम-कलह आरम्भ
हो गयी। श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-“मैंने इस अवधूतके
साथ एक ही पंक्तिमें बैठकर भोजन किया है, न जाने
मेरी क्या गति होगी? महाप्रभु तो संन्यासी हैं, उनको
कोई अन्तर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जहाँ कहींसे भी अन्न
खानेसे संन्यासीको दोष नहीं लगता। 'नान्नदोषेण मस्करी'
अर्थात् संन्यासीका किसीके घरमें भोजन करनेमें कोई
असङ्गति नहीं है-यह शास्त्रका प्रमाण है। किन्तु मैं
तो एक गृहस्थ ब्राह्मण हूँ, इसलिये मुझे दोष लगेगा।
जिसके जन्म, कुल, स्वभाव और आचरणका पता नहीं
है, गृहस्थ ब्राह्मणका उसके साथ एक पंक्तिमें बैठकर
प्रसाद पाना बड़ा अनाचार है॥"188-192॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नान्नदोषेण मस्करी'-अर्थात्
संन्यासीको अन्नदोष नहीं लगता॥ 191॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा केवलाद्वैतवादकी निन्दा :-
नित्यानन्द कहे,-"तुमि अद्वैत-आचार्य।
'अद्वैत-सिद्धान्ते' बाधे शुद्धभक्तिकार्य ॥ 193 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके
छलसे अद्वयज्ञानकी महिमाका वर्णन :-
तोमार सिद्धान्त-सङ्ग करे येइ जने।
'एक' वस्तु बिना सेइ 'द्वितीय' नाहि माने ॥ 194 ॥
अद्वयज्ञान-विरोधी जड़-द्वैतज्ञानी या मायावादीके सङ्गकी
निषिद्धताके विषयमें इङ्गित :-
हेन तोमार सङ्गे मोर एकत्रे भोजन।
ना जानि, तोमार सङ्गे कैछे हय मन ॥"195 ॥
अनुवाद-यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-
“तुम अद्वैत-आचार्य अर्थात् अद्वैतवादके आचार्य हो।
'अद्वैत-सिद्धान्त'से शुद्धभक्तिके कार्यमें बाधा पहुँचती
है। तुम्हारे सिद्धान्तको जो व्यक्ति ग्रहण करता है, वह
केवल एक वस्तुके अतिरिक्त दूसरी वस्तुको नहीं
मानता। ऐसे तुम्हारे साथ बैठकर मैं भोजन कर रहा
हूँ, न जाने तुम्हारे सङ्गसे मेरे मनपर क्या प्रभाव
होगा॥"193-195॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-तुम
अद्वैत-आचार्य हो। तुम्हारे सिद्धान्त सब अद्वैतवाद हैं,
जिससे शुद्ध भक्तिके कार्यमें बाधा पहुँचती है। तुम्हारे
सिद्धान्तके प्रति जो आसक्त होता है, वह एक वस्तु
(चिद्-विलास) ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं
देख पाता। इस प्रकार तुम्हारा सङ्ग द्वैतवादियोंके लिये
त्याज्य होनेपर भी तुम्हारे साथ एक स्थानपर भोजन
कर रहा हूँ-यह बात मेरे मनको अच्छी नहीं लग
रही॥ 193-195॥
अनुभाष्य- 'अद्वैत-सिद्धान्त'-सेव्य-सेवक-लीला नित्य
सत्य है, अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त इस बातका अनुमोदन
नहीं करता। वे श्रीकृष्णसेवारूप अप्राकृत भक्तिकार्यको
भी मनुष्यके कामादि इन्द्रियवृत्तिसे उत्पन्न सुखदुःख-भोग
अथवा कर्मफलके अन्तर्गत एक प्राकृत विषयभोग-चेष्टा
समझते हैं। इसलिये अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त-भगवान्‌से
अभिन्न नाम, रूप, गुण एवं लीला-वैचित्र्यसेवामय निर्मल
भक्तिकार्यका प्रतिबन्धक है।
आदिलाला 1/7 श्लोक इस स्थानपर विशेषरूपसे
विचारणीय है। असुरोंको मोहित करनेके लिये
श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके छलसे श्रीनित्यानन्द प्रभुने
ऐसा कहा। प्राकृत लोगोंकी बाहरी दृष्टिमें मायावादी
कैवलाद्वैतवादियोंके 'अद्वैत-सिद्धान्त' अथवा 'निर्भेद-
ब्रह्मसायुज्य'वादके साथ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा प्रचारित
शुद्ध अद्वय-ज्ञान आपाततः 'एक' प्रतीत होनेपर भी
वास्तवमें श्रीहरिके अभिन्न-विग्रह श्रीअद्वैताचार्यकी 'शुद्ध-
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