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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1333, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1333

[ 12/181-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“मैं तो
तार्किक कुबुद्धिवाला था, किन्तु आपकी कृपासे मुझे
यह सम्पत्ति प्राप्त हुई है। महाप्रभुके बिना और कोई
भी ऐसा दयालु नहीं है, जो कौवेको भी गरुड़के समान
बना सके। जिस मुखसे मैं पहले तार्किक-सियारोंके
साथ भेउ-भेउ करता था, अब उसी मुखसे सदा 'कृष्ण'
'हरि' बोलता हूँ। मैं कहाँ तो पहले बहिर्मुख तार्कि
क-शिष्योंके सङ्गमें रहता था और कहाँ अब ऐसे
सङ्गरूपी अमृत-सिन्धुकी तरङ्गोंमें डूबा रहता हूँ॥ 181-184॥
अनुभाष्य—‘बहिर्मुख’—जो बाहरी रूप-रसादिमें अपनेको
भोक्तारूपमें अभिमान करते हुए अपने इन्द्रिय-भोगमें
व्यस्त है और श्रीकृष्णसेवा-विमुख है, वही 'बहिर्मुख'
है। (भाः 7/5/31)—
“मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।
अदान्त गोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः ।
अन्धा यथान्धैरुपनीयमानास्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ॥”
अर्थात् “श्रीप्रह्लादने कहा,—'हे पिताजी ! जो गृहव्रतधारी
परस्पर आसक्तिसे आबद्ध हैं, उनकी कभी भी अपने
प्रयाससे अथवा गुरुके कहनेसे श्रीकृष्णमें मति नहीं
होती। वे अजितेन्द्रिय हैं, इसलिये वे पुनः पुनः इस
क्लेशमय संसारमें प्रवेश करके चबाये गये विषयोंको
ही फिरसे चबाते हैं। जो बाह्य जड़ विषयोंका ही आदर
करते हैं, वे सब दूषित अन्तःकरणवाले व्यक्ति समस्त
स्वार्थकी एकमात्र गति जो श्रीविष्णु हैं, उनको नहीं जान
सकते हैं। एक अन्धा जैसे दूसरे अन्धे व्यक्तिको
पकड़कर ले जाता है, उसी प्रकार वे भी (अन्ध-परम्परामें)
वेदरूपी लम्बी रस्सीसे काम्यकर्मोंकी रस्सियोंसे बँधे हैं।”
जड़ विषयोंके भोक्ताके अभिमानके कारण
श्रीकृष्णसेवाके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती। अप्राकृत
राज्यके बाहरी भागमें यह देवीधाम अवस्थित है, इस
राज्यकी सभी वस्तुएँ ही प्राकृत है। स्वरूप-भ्रमके
कारण ये वस्तुएँ ही बद्धजीवको अपनी सेव्य वस्तुके
रूपमें प्रतीत होती हैं॥ 184॥
श्रीसार्वभौमकी मानद महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा :-
प्रभु कहे,—“पूर्वे सिद्ध कृष्णे तोमार प्रीति।
तोमा-सङ्गे आमा-सबार हैल कृष्णे मति ॥” 185॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आपकी तो पिछले
जन्मसे ही श्रीकृष्णमें प्रीति है। आपका श्रीकृष्णसे इतना
प्रेम है कि अब आपके सङ्गसे हम सबकी भी
श्रीकृष्णमें मति लग गयी है॥” 185॥
भक्तगुण-कीर्तन करनेमें भगवान् श्रीचैतन्य—अद्वितीय :-
भक्त-महिमा बाड़ाइते, भक्ते सुख दिते।
महाप्रभु बिना अन्य नाहि त्रिजगते ॥ 186॥
अनुवाद—भक्तोंकी महिमाको बढ़ाने तथा भक्तोंको
सुख प्रदान करनेमें महाप्रभुके अतिरिक्त त्रिभुवनमें अन्य
कोई नहीं है॥ 186॥
अनुभाष्य—भागवतके तीसरे स्कन्धका सोलहवाँ
अध्याय इस प्रसङ्गमें विचारणीय है ॥ 186 ॥
सभी भक्तोंको प्रसाद देना :-
तबे प्रभु प्रत्येके, सब भक्तेर नाम लञा।
पिठा-पाना देओयाइल प्रसाद करिया ॥ 187 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सारा प्रसाद एकत्रित करके
प्रत्येक भक्तका नाम लेकर सबको पिठा-पाना आदि
बाँटा ॥ 187 ॥
श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत, परस्पर कौतुकपूर्ण कलह :-
अद्वैत-नित्यानन्द बसियाछेन एक ठाञि।
दुइजने क्रीड़ा-कलह लागिल तथाइ ॥ 188 ॥
श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा कलह आरम्भ :-
अद्वैत कहे,—“अवधूतेर सङ्गे एक पंक्ति।
भोजन करिलुँ, ना जानि हबे कोन् गति ॥ 189 ॥
संन्यासीको अन्नस्पर्शदोष नहीं :-
प्रभु त' संन्यासी, उँहार नाहि अपचय।
अन्न-दोषे संन्यासीर दोष नाहि हय ॥ 190 ॥
488 ।