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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1301, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1301

ग्यारहवाँ अध्याय 11/179-189
विदायी लेकर श्रीगोपीनाथको गृह-निर्वाचन और
श्रीवाणीनाथको प्रसादकी व्यवस्थाका भार-अर्पण :-
एत कहि' दुइजने विदाय लइल।
गोपीनाथ, वाणीनाथ-दुँहे सङ्गे निल॥ 179 ॥
गोपीनाथे देखाइल सब वासा-घर।
वाणीनाथ-ठाञि दिल प्रसाद विस्तर॥ 180 ॥
वाणीनाथ आइला बहु प्रसाद पिठा लञा।
गोपीनाथ आइला वासा संस्कार करिया॥ 181 ॥
अनुवाद-यह कहकर उन दोनोंने महाप्रभुसे विदायी
ली। तब वे दोनों श्रीगोपीनाथाचार्य तथा श्रीवाणीनाथको
अपने साथ ले गये। उन्होंने श्रीगोपीनाथाचार्यको सभी
रहनेके स्थान दिखला दिये और श्रीवाणीनाथको बहुत
सारा महाप्रसाद दिया। श्रीवाणीनाथ वह प्रसाद और
पिठा-पाना लेकर आ गये। श्रीगोपीनाथाचार्य भी सभी
रहनेके स्थानोंकी सफाई करके वहाँ आ गये॥ 179-181 ॥
महाप्रभुका सभी भक्तोंको स्नानके बाद चूड़ा दर्शन करके
प्रसादका सम्मान करनेके लिये आमन्त्रण :-
महाप्रभु कहे,—"शुन, सर्व वैष्णवगण।
निज-निज-वासा सबे करह गमन॥ 182 ॥
समुद्रस्नान करि' कर चूड़ा दरशन।
तबे आजि इँह आसि' करिबे भोजन॥" 183 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "सभी वैष्णव सुनो!
आप सभी अपने-अपने रहनेके स्थानपर जाइये। फिर
समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका (शिखरका)
दर्शन कीजिये। तब यहाँ आकर महाप्रसाद सेवन
कीजिये॥" 182-183 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'चूड़ा'- श्रीजगन्नाथ मन्दिरका
चूड़ा॥ 183 ॥
महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्तोंका श्रीगोपीनाथके द्वारा
बतलाये अपने अपने वासस्थानको ग्रहण करना :-
प्रभु नमस्करि' सबे वासाते चलिला।
गोपीनाथाचार्य सबे वासास्थान दिला॥ 184 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्त
श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ गये और उन्होंने सभीको उनके
रहनेका स्थान दिया॥ 184 ॥
महाप्रभुका श्रीहरिदास ठाकुरके पास आना :-
महाप्रभु आइला तबे हरिदास-मिलने।
हरिदास करे प्रेमे नाम-सङ्कीर्त्तने॥ 184 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने
आये। उस समय श्रीहरिदास प्रेमपूर्वक नाम-सङ्कीर्तन
कर रहे थे॥ 184 ॥
श्रीहरिदासका प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :-
प्रभु देखि' पड़े पाय दण्डवत् हञा।
प्रभु आलिङ्गन कैल ताँरे उठाञा॥ 186 ॥
परस्पर गुणोंके स्मरणसे भक्त और भगवान्,
दोनोंकी प्रेम-विह्वलता :-
दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दने।
प्रभु-गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य-गुणे॥ 187 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीहरिदास ठाकुरने
उनके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने
उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया। दोनों प्रेमके
आवेशमें क्रन्दन करने लगे। प्रभुके गुणोंसे दास और
दासके गुणोंसे प्रभु विह्वल हो रहे थे॥ 186-187 ॥
श्रीहरिदास ठाकुरका अपनेको अस्पृश्य मानना :-
हरिदास कहे,—"प्रभु, ना छुँइओ मोरे।
मुञि—नीच, अस्पृश्य, परम पामरे॥" 188 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - 'हे प्रभो!
आप मुझे स्पर्श मत कीजिये। मैं नीच, अस्पृश्य
(अछूत) और सबसे अधिक पतित हूँ॥" 188 ॥
साक्षात् ब्रह्मण्यदेव-प्रभुके द्वारा
श्रीहरिदासके आर्य होनेकी घोषणा :-
प्रभु कहे,—"तोमा स्पर्शि पवित्र हइते।
तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते॥ 189 ॥
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