श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1300, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/169-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :-
हेनकाले काशीमिश्र, पड़िछा, — दुइ जन।
आसिया करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥ 169 ॥
सर्ववैष्णव देखि' सुख बड़ पाइला।
यथायोग्य सबा-सने आनन्दे मिलिला ॥ 170 ॥
अनुवाद—इतनेमें काशीमिश्र और पड़िछा-ये दोनों
वहाँ आये और उन्होंने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना
की। सभी वैष्णवोंका दर्शन करके वे दोनों बहुत प्रसन्न
हुए और यथायोग्य सभीसे आनन्दपूर्वक मिले॥ 169-170 ॥
वैष्णवोंकी सेवाके लिये काशीमिश्रकी
महाप्रभुसे आज्ञाके लिये प्रार्थना :-
प्रभुपदे दुइ जने कैल निवेदने।
“आज्ञा देह', — वैष्णवेर करि समाधाने ॥ 171 ॥
सबार करियाछि वासा-गृह-स्थान।
महाप्रसाद सबाकारे करि समाधान ॥” 172 ॥
अनुवाद-दोनोंने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन
किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो तो हम सभी वैष्णवोंके
लिये यथोचित व्यवस्था कर दें। सभीके लिये रहनेके
स्थानकी व्यवस्था हो चुकी है। अब हमें उन सबके
लिये महाप्रसादके परिवेशनकी आज्ञा दीजिये ॥” 171-172 ॥
श्रीगोपीनाथाचार्यको भक्तोंके सभी कार्योंको
सम्पादन करनेके लिये महाप्रभुका आदेश :-
प्रभु कहे,—“गोपीनाथ, याह' वैष्णव लञा।
याँहा याँहा कहे वासा, ताँहा देह' लञा ॥ 173 ॥
श्रीवाणीनाथके ऊपर प्रसादकी व्यवस्थाका भार :-
महाप्रसादान्न देह वाणीनाथ-स्थाने ।
सर्व वैष्णव इँहो करिबे समाधाने ॥ 174 ॥
श्रीकाशीमिश्रसे महाप्रभुके द्वारा बगीचेमें स्थित
निर्जन कमरेके लिये प्रार्थना :-
आमार निकटे एइ पुष्पेर उद्याने।
एकखानि घर आछे परम-निर्जने ॥ 175 ॥
सेइ घर आमाके देह'-आछे प्रयोजन।
निभृते बसिया ताँहा करिब स्मरण ॥” 176 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे गोपीनाथाचार्य ! आप
सभी वैष्णवोंको अपने साथ लेकर जाइये और
जहाँ-जहाँ ये काशीमिश्र और पड़िछा बतलायें, वहाँ
उन भक्तोंको रहनेके लिये स्थान दे दीजिये। और आप
(श्रीकाशीमिश्र और पड़िछा) जितना भी महाप्रसाद लाये
हैं, सब वाणीनाथको दे दीजिये। वे सभी वैष्णवोंकी
देखभाल करेंगे और सभीको महाप्रसाद भी वितरित
कर देंगे। मेरे स्थानके पास पुष्पोंके उद्यानमें एक निर्जन
कमरा है। वह कमरा मुझे दे दो, मुझे उसकी
आवश्यकता है। मैं वहाँ एकान्तमें बैठकर भगवान्का
स्मरण करूँगा ॥” 173-176 ॥
अनुभाष्य - अब यह स्थान 'सिद्धबकुल-मठ'के
नामसे प्रसिद्ध है ॥ 175 ॥
महाप्रभुसे सभी वस्तुओंको इच्छानुसार
ग्रहण करनेके लिये काशीमिश्रका आवेदन :-
मिश्र कहे, — “सब तोमार, चाह कि-कारणे ?
आपन-इच्छाय लह, येइ तोमार मने ॥ 177 ॥
काशीमिश्रका स्वयंको महाप्रभुके आज्ञाकारी
दासके रूपमें स्वीकार करने हेतु प्रार्थना :-
आमि-दुइ हइ तोमार दास आज्ञाकारी।
ये चाह, सेइ आज्ञा देह' कृपा करि' ॥” 178 ॥
अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने कहा, — “प्रभो ! सब कुछ
तो आपका ही है, फिर आप माँग क्यों रहे हैं? अपनी
इच्छासे आप जो चाहें ले सकते हैं। हम दोनों तो
आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं। आप जैसा
जो भी चाहते हैं, कृपा करके हमें उसकी आज्ञा
दीजिये ॥" 177-178 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - आपको जो चाहिये, कृपा करके
उसकी आज्ञा दीजिये। हम दोनों आपके आज्ञा
पालनकारी दास हैं ॥ 178 ॥
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