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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1266

दसवाँ अध्याय 10/115-119 ]
अनुवाद—श्रीविद्यापति और श्रीचण्डीदासके पद एवं
श्रीजयदेव गोस्वामीके द्वारा रचित श्रीगीतगोविन्दके
श्लोकों-गीतोंका गान करके श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको
आनन्द प्रदान करते थे॥ 115 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'विद्यापति'—मिथिला प्रान्तके प्राचीन
वैष्णव कवि। 'चण्डीदास'—(वीरभूम-जिलेमें साकुल्लिलपुर
थानेके अन्तर्गत) नानूर-ग्रामके प्राचीन बङ्गाली-वैष्णव-कवि।
'श्रीगीतगोविन्द'—श्रीजयदेवके द्वारा रचित कृष्णरसाश्रित
संस्कृत गीत समूहसे परिपूर्ण सुप्रसिद्ध काव्य॥ 115 ॥
दामोदर-स्वरूपके गुण :—
सङ्गीत-गन्धर्व-सम, शास्त्रे-बृहस्पति।
दामोदर-सम आर नाहि महामति ॥ 116 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर सङ्गीतमें गन्धर्वके समान
तथा शास्त्रोंके ज्ञानमें देवताओंके गुरु बृहस्पति के समान
थे। श्रीस्वरूप दामोदरके समान महाबुद्धिमान और कोई
नहीं था ॥ 116 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूप गोस्वामी गीत-शास्त्र और
साधारण-शास्त्रमें विशेष निपुण थे। श्रीमन्महाप्रभुने उन्हें
गानविद्यामें निपुण देखकर पहले ही उन्हें 'दामोदर' नाम
दिया था। 'दामोदर' नामके साथ संन्यास गुरुके द्वारा
दिया 'स्वरूप' जुड़कर उनका नाम 'दामोदर-स्वरूप'
हुआ था। 'संगीतदामोदर' नामक संगीत-शास्त्रका एक
ग्रन्थ भी उन्होंने लिखा है॥ 116 ॥
सभी भक्तोंके ही प्रिय पात्र :—
अद्वैत-नित्यानन्देर परम प्रियतम।
श्रीवासादि भक्तगणेर हय प्राण-सम ॥ 117 ॥
स्वरूप दामोदरके महाप्रभुकी दयाके वैशिष्ट्य
वर्णनकारी प्रणाम श्लोक :—
सेइ दामोदर आसि' दण्डवत् हैला।
चरणे धरिया श्लोक पड़िते लागिला ॥ 118 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर श्रीअद्वैताचार्य और
श्रीनित्यानन्द प्रभुके परम प्रियतम तथा श्रीवासादि
भक्तोंके प्राणोंके समान थे। वे श्रीस्वरूप दामोदरने
महाप्रभुके चरणकमलोंमें दण्डवत् प्रणाम किया और
उनके श्रीचरणोंको पकड़कर निम्नलिखित श्लोक पढ़ने
लगे॥ 117-118 ॥
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (8.14) श्लोक—
हेलोद्भूल्लित-खेदया विशदया प्रोन्मीलदामोदया
शाम्यच्छास्त्रविवादया रसदया चित्तार्पितोन्मादया।
शश्वद्भक्तिविनोदया स-मदया माधुर्यमर्यादया
श्रीचैतन्यदयानिधे, तव दया भूयादमन्दोदया ॥ 119 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे दयानिधे श्रीचैतन्य! जो
अनायास ही समस्त खेद दूर करती है, जिसमें सम्पूर्ण
निर्मलता है, जिसमें परमानन्द (अन्य सभी विषयोंको
आच्छादित करके) प्रकाशित होता है, जिसके उदित
होनेसे शास्त्र विवाद समाप्त हो जाते हैं, जो रसकी वर्षा
करके चित्तको उन्मत्त बना देती है, जिसकी
भक्तिविनोदनक्रिया सर्वदा शमता (स्थिरबुद्धि) दान करती
है, माधुर्य मर्यादाके द्वारा आपकी अति विस्तृत वह शुभ
प्रदान करनेवाली दया मेरे प्रति उदित हो ॥ 119 ॥
अनुभाष्य—
हे दयानिधे श्रीचैतन्य, हेलोद्भूल्लितखेदया (हेलया अवहेलया
उद्भूल्लितो दूरीकृतः खेदो मनस्तापो यया तया) विशदया
(निर्मलतया सर्वप्रकाशिकया) प्रोन्मीलदामोदया (प्रकृष्टेन उन्मीलन्
प्रकाशमानः आमोदः परमानन्दो यस्यां सा तया)
शाम्यच्छास्त्रविवादया (शाम्यन् शास्त्राणां विवादः वादप्रतिवादो
यस्यां सा तया) रसदया (मधुरादि-रसं ददातीति रसदा तया)
चित्तार्पितोन्मादया (चित्ते अर्पितः उन्मादः देहादौ अनभिनिवेशः,
यद्वा, प्रौढ़ानन्दापद्विरहादिजः हृद्भ्रमः, दिव्योन्मादः इत्यर्थः, यया
सा तया) शश्वद्भक्तिविनोदया (शश्वत् निरन्तरं भक्तिं विनोदयति
स्वभावेन प्रेरयति या तया) समदया (मदः अनङ्गविक्रियाभरजः
विवेकहरः उल्लासः, तेन सहितया, 'शमदया' इति पाठे
तु—कृष्णेतर-तृष्णया रहितया) माधुर्यमर्यादया (माधुर्याणां मर्यादा
सीमा यस्यां सा तया—विशेषणे तृतीया) तव अमन्दोदया
(मन्दः कुण्ठः तद्रहितः अमन्दः निःश्रेयसं, तस्य उदयो यस्यां
सा) दया [मयि] भूयात् (भवतु)।
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