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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1265, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1265

[ 10/109-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्वरूप दामोदरका आचरण, उनका निर्जनमें वास :-
पाण्डित्येर अवधि, वाक्य नाहि कारो सने।
निर्जने रहये, लोक सब नाहि जाने॥110॥
महाप्रभुके द्वितीय विग्रह :-
कृष्णरस-तत्त्ववेत्ता, देह—प्रेमरूप।
साक्षात् महाप्रभुर द्वितीय स्वरूप॥111॥
अनुवाद—अपने संन्यासगुरुसे आज्ञा लेकर वे नीलाचल चले आये और रात-दिन श्रीकृष्णप्रेमके आनन्दमें विह्वल रहने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर पाण्डित्यकी चरम सीमा थे, परन्तु वे किसीसे कोई बातचीत नहीं करते थे। वे एकान्त स्थानपर रहते थे और लोगोंको पता भी नहीं होता था कि वे कहाँ हैं। श्रीस्वरूप दामोदर श्रीकृष्णप्रेमके मूर्त्तरूप थे और श्रीकृष्णरस-तत्त्वके परम ज्ञाता थे। वे महाप्रभुके साक्षात् द्वितीय स्वरूप थे॥109-111॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णरस-तत्त्ववेत्ता'—उनकी देह साक्षात् प्रेमरूप थी, उन्हें देखनेसे ही प्रतीत था, जैसे महाप्रभुका द्वितीय स्वरूप उदित हुआ है॥111॥
दामोदर-स्वरूप ही भक्तिरस-सिद्धान्तके एकमात्र परीक्षक :-
ग्रन्थ, श्लोक, गीत केह प्रभु-पाशे आने।
स्वरूप परीक्षा कैले, प्रभु ताहा सुने॥112॥
महाप्रभुका अप्रिय विषय :-
भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध, आर रसाभास।
शुनिले ना हय प्रभुर चित्तेर उल्ल़ास॥113॥
अनुवाद—कोई भी व्यक्ति यदि किसी भी प्रकारका ग्रन्थ, श्लोक अथवा गीत लिखकर महाप्रभुके पास सुनानेके लिये लाता, तो पहले श्रीस्वरूप दामोदर उसकी परीक्षा करते। यदि वह दोषरहित होता, तब उसे महाप्रभुको सुनानेकी अनुमति देते। भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध या रसाभास-दोषयुक्त श्लोक-गीतादि सुनकर महाप्रभुके चित्तमें प्रसन्नता नहीं होती थी॥112-113॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध'—अचिन्त्य-भेदाभेद ही भक्ति सिद्धान्त है, इसके विरुद्ध जो कुछ भी है, वही 'भक्तिसिद्धान्त विरुद्ध' है। 'रसाभास' अर्थात् रस जैसा प्रतीत होता है, किन्तु रस नहीं है। इन दो प्रकारकी 'अभक्ति'से वैष्णवोंका दूर रहना कर्त्तव्य है। क्योंकि मायावादी भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध-वाक्य सुनते-सुनते जीवका पतन होता है। रसाभासकी विवेचना करते-करते जीव 'प्राकृत-सहजिया', 'बाउल' और 'जड़रसासक्त' हो जाता है। इन दोषोंसे जो दूषित हैं, उनके सङ्गका निषेध करनेके लिये श्रीमन्महाप्रभुने भक्तिसिद्धान्तविरुद्ध और रसाभासको दूर रखनेकी प्रथाका निर्देश किया है॥113॥
दामोदर-स्वरूपकी परीक्षामें उत्तीर्ण विषयोंमें ही महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
अतएव स्वरूप गोसाञि करे परीक्षण।
शुद्ध हय यदि, प्रभुरे करा'न श्रवण॥114॥
अनुवाद—इसलिये श्रीस्वरूप गोस्वामी पहले परीक्षण करते और यदि वह शुद्ध होता, तभी उसे महाप्रभुको श्रवण कराते॥114॥
अनुभाष्य—जिनसे श्रीकृष्ण भजनमें बाधा पड़ती है, वे सब सिद्धान्त ही भक्तिविरुद्ध हैं, इसलिये अशुद्ध हैं। शुद्धभक्त वैसे सिद्धान्तोंका अनुमोदन नहीं करते। और वे ऐसे रसाभास-परायण भक्तिविरुद्ध सिद्धान्तवाले लोगोंको 'शुद्धभक्त'के रूपमें स्वीकार नहीं कर सकते। अशुद्ध सिद्धान्त अथवा रसाभाससे पुष्ट होकर बहुतसे कुमत जगत्में चल रहे हैं। साधारण व्यक्तियोंसे सम्मान पानेके लिये अनेक लोग ऐसे भक्तिविरोधी असत् सिद्धान्तोंका आदर करते हैं और साथ ही अपनेको श्रीगौरसुन्दरका भक्त भी कहते हैं। परन्तु श्रीदामोदर-स्वरूप गोस्वामी उन्हें 'गौड़ीय-वैष्णव'के रूपमें स्वीकार नहीं करते थे और श्रीमन्महाप्रभुके निकट नहीं जाने देते थे॥114॥
चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके पद गाकर महाप्रभुकी प्रसन्नताका वर्द्धन :-
विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीतगोविन्द।
एइ तिन गीते करा'न प्रभुर आनन्द॥115॥
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