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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1212, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1212

[ 9/151-162 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-एक ही विग्रह नाना प्रकारके आकार
और रूप प्रकाश करते हैं। एक ईश्वर भक्तोंके ध्यानके
अनुरूप भिन्न-भिन्न रूपोंमें स्वयंको प्रकाशित करते
हैं॥” 156 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने परिहास-वाक्य छोड़कर
अन्तमें कहा, - ओहे भट्ट, तुम दुःखी मत होवो,
‘श्रीकृष्ण’ और ‘श्रीनारायण’ जिस प्रकार अभेद हैं, गोपी
और लक्ष्मी भी उसी प्रकार अभेद हैं। सर्वलक्ष्मीमयी
राधिका एक ही विग्रहसे नाना आकार और रूप
प्रकाशित करती हैं। गोपियोंके द्वारा लक्ष्मी कृष्णसङ्गका
आस्वादन करती हैं अर्थात् स्वरूपशक्ति माधुर्यस्वरूपमें
गोपीदेहमें श्रीकृष्ण-सङ्गास्वादन करती हैं और ऐश्वर्यदेहमें
लक्ष्मीरूपमें नारायण-सङ्गास्वादन करती हैं। ईश्वर-तत्त्वमें
भेद नहीं है। भक्तोंके भावोंके भेदसे एक ही चिद्-विग्रहमें
अनेक प्रकारके आकार और रूपके ध्यानभेद मात्र
जानने चाहिये॥ 151-156 ॥
[औदार्यपराः आदौ गौरादिकं, ततः माधुर्यपर-भावापन्नाः गौराभिन्नरूपं
श्यामादिकं पश्यन्ति]।
श्लोक-भावानुवाद-वैदूर्यमणि जिस प्रकार नीले-पीले
रङ्गोंको अपने विभागसे प्रकट करती हुई विभिन्न
रङ्गोंवाली प्रतीत होती है, उसी प्रकार श्रीअच्युत (जिनमें
कोई भी च्युति या न्यूनता न हो अथवा भक्तोंका
जिनसे कभी भी विच्छेद न हो, जैसा कि स्कन्दपुराणके
काशीखण्डमें कहा गया है- 'जिनके भक्त महान विपत्ति
(प्रलयादि सङ्कट) में भी उनसे दूर नहीं होते अथवा उन्हें
नहीं भुलाते, इसलिये वे सभी लोकोंमें साधुओंके द्वारा
अच्युत-नामसे कीर्त्तित होते हैं) भक्तके भावानुसार
उपासना-भेदसे ध्यानमें अलग अलग रूप (चतुर्भुज-द्विभुज
आकार भेद तथा शुक्ल-रक्त-श्यामादि वर्ण भेद)
दिखलायी देते हैं [उदारतापरायण श्रीगौरहरिके भक्त
पहले श्रीगौरचन्द्रका ध्यान करते हैं और तब माधुर्य-भावापन्न
जन श्रीगौरसे अभिन्न श्याम (द्वापर), रक्त (त्रेता) और
शुक्ल (सत्य) आदि रूपोंका दर्शन करते हैं] ॥ 157 ॥
लघुभागवतामृत (1/357) में उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र-वचन :-
मणैर्यथा विभागेन नीलपीतादिभिर्युतः।
रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात्तथाच्युतः॥ 157 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 157 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वैदूर्यमणि जिस प्रकार विभिन्न
वस्तुओंके निकट आनेसे उनके रङ्गके अनुसार नीले-पीले
आदि रङ्गभेदसे दिखायी देती है, उसी प्रकार भक्तके
भावानुसार ध्यानभेदसे एक अद्वितीय अच्युतके ध्यानमें
अलग अलग रूप दिखलायी देते हैं ॥ 157 ॥
व्यङ्कटभट्टका महाप्रभुको श्रीकृष्ण समझना :-
भट्ट कहे,-“काँहा आमि जीव पामर।
काँहा तुमि सेइ कृष्ण, - साक्षात् ईश्वर ॥ 158 ॥
महाप्रभुके सिद्धान्तमें भट्टका दृढ़ विश्वास :-
अगाध ईश्वर-लीला किछुइ ना जानि।
तुमि येइ कह, सेइ सत्य करि' मानि ॥ 159 ॥
उपास्य लक्ष्मीनारायणकी कृपासे ही
महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :-
मोरे पूर्ण कृपा कैल लक्ष्मी-नारायण।
ताँर कृपाय पाइनु तोमार चरण-दरशन ॥ 160 ॥
महाप्रभुकी कृपासे भट्टके द्वारा श्रीकृष्णसेवा आरम्भ :-
कृपा करि' कहिले मोरे कृष्णेर महिमा।
याँर रूप-गुणैश्वर्येर केह ना पाय सीमा ॥ 161 ॥
एबे से जानिनु कृष्णभक्ति सर्वोपरि।
कृतार्थ करिले, मोरे कहिले कृपा करि' ॥” 162 ॥
अनुभाष्य-
मणिः (वैदूर्य) नीलादिभिः [गुणैः युतः सन्] यथा विभागेन
[उपलक्षितः भवति, यद्वा, विभागेन उपलक्षितः सन् नीलादिभिर्युतः
भवति] तथा अच्युतः (च्युतिरहितः, यद्वा, नास्ति च्युतं क्षरणं
भक्तानां यस्मात्-“न च्यवन्ते हि यद्भक्ता महत्यां प्रलयापादि।
अतोऽच्युतोऽखिले लोके महद्भिः परिगीयते ॥”* इति
काशीखण्ड-वचनात्); ध्यानभेदात् (उपासनाभेदात्) रूपभेदं
(चतुर्भुज-द्विभुजाद्याकारभेदं शुक्लरक्तश्यामादिकं च) अवाप्नोति
364 ।