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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1211

नौवाँ अध्याय 9/144-156 ]
उन ग्रन्थोंकी रचनासे पहले प्रयोग किये गये हैं—ऐसा
कहकर इस ग्रन्थमें उनका उल्लेख हुआ है, तो यह
समझना चाहिये कि वे श्लोक बहुत प्राचीन श्रीकृष्णभक्तोंमें
भी प्रचलित थे। श्रीलरूप गोस्वामीने उन प्राचीन
श्लोकोंका ही अपने ग्रन्थमें प्रयोग किया है।
कविराज-गोस्वामीकी इस ग्रन्थकी रचनासे पहले, श्रीरूपके
सभी ग्रन्थ रचित हो चुके थे। इसलिये (कविराज
गोस्वामीने अपने इस ग्रन्थमें श्रीरूपके) उन-उन ग्रन्थोंसे
उद्धृत कहकर इन सब श्लोकोंका उल्लेख किया है।
अनेक स्थानोंपर, कविराज गोस्वामीने भावमात्रका सहारा
लेकर पूर्व-गोस्वामियोंके श्लोकोंको वार्त्तालापमें प्रवेश
कराया है ॥ 144-149 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 17/278-293 संख्या
देखें ॥ 148-149 ॥
ललितमाधव (6/14) :-
गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती
विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्।
आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि-
र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति ॥ 150 ॥
अनुवाद—किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः
अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया,
जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया।
इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय-
पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको
कौन पण्डित समझ सकता है? ॥ 150 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 17/281 संख्या देखें ॥ 150 ॥
महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी और
गोपियोंके तत्त्वका समन्वय :-
एत कहि' प्रभु ताँर गर्व चूर्ण करिया।
ताँरे सुख दिते कहे सिद्धान्त फिराइया ॥ 151 ॥
“दुःख ना भाविह, भट्ट, कैलुँ परिहास।
शास्त्रसिद्धान्त शुन, याते वैष्णव-विश्वास ॥ 152 ॥
स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और नारायणतत्त्व एवं
सर्वलक्ष्मीमयी श्रीराधा और लक्ष्मीतत्त्व :-
कृष्ण-नारायण, यैछे एकइ स्वरूप।
गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि हय एकरूप ॥ 153 ॥
एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप।
गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि, जानिह ‘स्वरूप’ ॥ 154 ॥
अनुवाद—ऐसा कहकर महाप्रभुने व्येङ्कट भट्टके
गर्वको तो चूर्ण कर दिया, परन्तु उसे प्रसन्न करनेके
लिये महाप्रभुने सिद्धान्तको घुमाकर कहा,— “भट्ट, आप
दुःखी मत होइये, मैंने तो केवल परिहास किया था।
अब आप शास्त्रोंके वे सिद्धान्त सुनो, जिनमें वैष्णवोंका
विश्वास है। श्रीकृष्ण और श्रीनारायण जैसे एक ही
स्वरूप हैं, वैसे ही गोपियों और लक्ष्मीमें भी कोई भेद
नहीं है, वे भी एकरूप हैं। एक ही विग्रह अनेक रूप
धारण करते हैं, इसलिये गोपी और लक्ष्मीमें भी कोई
भेद नहीं है, इसलिये उनके ‘स्वरूप’को जानो ॥ 151-154 ॥
अनुभाष्य—जिस प्रकार श्रीकृष्ण एवं नारायण—वस्तुतः
अभेद अर्थात् एक ही वस्तु हैं, उसी प्रकार गोपी एवं
लक्ष्मी वस्तुतः अभिन्न हैं। रस विचारसे लक्ष्मीकी
अपेक्षा गोपीकी उत्कर्षता होनेपर भी दोनोंको सिद्धान्तसे
अभिन्न ही जानना चाहिये ॥ 153 ॥
कृष्णतत्त्व और विष्णुत्तत्त्व एवं श्रीराधातत्त्व और
लक्ष्मीतत्त्वमें भेदबुद्धि—अपराधजनक :-
गोपीद्वारे लक्ष्मी करे कृष्णसङ्गास्वाद।
ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध ॥ 155 ॥
अनुवाद—गोपियोंके द्वारा ही लक्ष्मी श्रीकृष्णके
सङ्गका आस्वादन करती हैं। ईश्वरके विभिन्न रूपोंमें
भेद माननेसे अपराध होता है ॥ 155 ॥
भक्तोंके स्वरूपके अनुरूप सेवा-भेदसे
आराध्यवस्तुका माधुर्य और ऐश्वर्यभेद :-
एक ईश्वर—भक्तेर ध्यान-अनुरूप।
एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप ॥” 156 ॥
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