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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1150, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1150

[ 8/187-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/230) :-
विदग्धो नवतारुण्यः परिहास-विशारदः।
निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥ 187 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जो पुरुष चतुर, नवतरुण,
परिहास-पटु, निश्चिन्त और प्रेयसीके वशीभूत होता है,
वह - 'धीर-ललित' है ॥ 187 ॥
अनुभाष्य-
विदग्धः (रसिकः) नवतारुण्यः (नवयौवनयुक्तः) परिहास-
विशारदः (रहस्यनिपुणः) निश्चिन्त (उद्वेगरहितः) धीरललितः
(नायकः) प्रायः प्रेयसीवशः (प्रेयसीनां प्रेमतारतम्येन वशीभूतः)
स्यात्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 187 ॥
श्रीराधाके साथ नित्य विलासमें रत श्रीकृष्ण :-
रात्रि-दिन कुञ्जे क्रीड़ा करे राधा-सङ्गे।
कैशोर-वयस सफल कैल क्रीड़ा-रङ्गे ॥ 188 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण रातमें और दिनमें भी श्रीराधाके
साथ कुञ्जमें विभिन्न प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं और
इस प्रकार उन्होंने क्रीड़ारङ्गमें अपनी कैशोरवस्थाको
सफल किया है ॥ 188 ॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/231) :-
वाचा सूचितशर्वरीरतिकला-प्रागल्भ्या राधिकां
व्रीड़ाकुञ्चित-लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ।
तद्वक्षोरुहचित्रकेलिमकरीपाण्डित्यपारं गतः
कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहारं हरिः ॥ 189 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण प्रगल्भ (वाक्चातुर्य) वाक्योंके
साथ पूर्वरात्रिमें श्रीमती राधिकाके सङ्ग घटित रतिकलाका
वृत्तान्त वर्णन करने लगे। उससे लज्जावशतः श्रीमती
राधिकाके दोनों नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके
स्तनयुगलपर चित्रकेलि-भ्रमरादि चित्रित करते हुए सखियोंके
मध्य विशेष पाण्डित्यका प्रकाश करने लगे। इस
प्रकारकी रसक्रीड़ाके द्वारा कुञ्जमें विहार करते हुए
श्रीहरिने कैशोर-अवस्थाको सफल किया ॥ 189 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/117 संख्या देखें ॥ 189 ॥
नित्य चिन्मयसेवा-विलासकी सर्वोत्तम अवस्था
ही 'प्रेमविलास-विवर्त्त', वह जड़ निर्विशेष
केवलाद्वैत-सिद्धि नहीं :-
प्रभु कहे,- "एहो हय, आगे कह आर।"
राय कहे,-"इहा वइ बुद्धि-गति नाहि आर ॥ 190 ॥
येबा 'प्रेमाविलास-विवर्त्त' एक हय।
ताहा शुनि' तोमार सुख हय, कि ना हय ॥" 191 ॥
एत बलि' आपन-कृत गीत एक गाहिल।
प्रेमे प्रभु स्वहस्ते तौर मुख आच्छादिल ॥ 192 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190-192 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे रामानन्द! तुमने जो 'साध्य'
निर्णय किया है, राधा-कृष्णके (तत्त्वका) वर्णन किया
है और दोनोंके विलासकी महिमाको कहा है, वही सत्य
है। किन्तु इससे आगे और जो कुछ है, उसे बोलो।
श्रीरायने कहा, - इसके आगे बुद्धि और आगे काम नहीं
कर पा रही। तो भी 'प्रेमविलास-विवर्त्त' नामक एक
भाव है, उसे सुना रहा हूँ, इसको सुनकर आपको सुख
होगा या नहीं, मैं कह नहीं सकता। तात्पर्य यह है,-
अब तक मैंने 'प्रेम-विलासके स्वरूप' का वर्णन किया
था। प्रेमविलासतत्त्वमें दो प्रकारके भाव हैं अर्थात्
सम्भोग (मिलन) और विप्रलम्भ (विरह)। विप्रलम्भके
बिना सम्भोगकी स्फूर्ति नहीं होती। विच्छेद (वियोग) का
नाम ही विप्रलम्भ है। वही प्रेमविलासका विवर्त्त है
अर्थात् विरहके समयमें अधिरूढ़भाववशतः सम्भोगके
अभावमें भी सम्भोगकी स्फूर्त्ति होती है। श्रीराय
रामानन्दके द्वारा स्वरचित इस रसके एक सङ्गीतके गान
करते ना करते महाप्रभुने अपने भावमें विह्वल होकर
302 ।