श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1149, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/180-186 ]
अनुभाष्य-श्रीमती राधिका ही श्रीकृष्णके निर्मल
प्रेमरूपी रत्नोंकी खान अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुकी मूर्तिविग्रह
हैं एवं श्रीराधिकाकी देह-अतुलनीय गुणोंसे परिपूर्ण है।
मध्यलीला 23/81-86 संख्या देखें॥180॥
याँर सौन्दर्यादि-गुण वाञ्छे लक्ष्मी-पार्वती।
याँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती॥183॥
याँर सद्गुण-गणने कृष्ण ना पाय पार।
ताँर गुण गणिबे केमने जीव छार॥"184॥
श्रीराधिका ही श्रीकृष्णप्रेमकी मूल भण्डार :-
श्रीगोविन्दलीलामृत (11/122)-
का कृष्णस्य प्रणयजनिभूः श्रीमती राधिकैका
कास्य प्रेयस्यनुपमगुणा राधिकैका न चान्या।
जैह्मयं केशे दृशि तरलता निष्ठुरत्वं कुचेऽस्या
वाञ्छापूर्त्त्यै प्रभवति हरे राधिकैका न चान्या॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णके प्रणयकी जन्मभूमि
कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका। श्रीकृष्णकी अनुपम
गुणोंवाली प्रिया कौन हैं?-एकमात्र श्रीमती राधिका,
अन्य कोई नहीं। केशोंमें कुटिलता (घुंघरालापन),
नेत्रोंमें तरलता (चञ्चलता), दोनों कुचोंमें (स्तनोंमें)
निष्ठुरता (कठोरता) आदि श्रीराधिकामें ही है। एकमात्र
श्रीराधिका ही श्रीहरिकी वाञ्छा पूर्ण करनेमें समर्थ हैं,
और कोई भी नहीं है॥181॥
अनुवाद-जिनके सौभाग्य-गुणोंकी सत्यभामा अभिलाषा
करती हैं, जिनसे समस्त व्रजरमणियाँ कला-विलासकी
शिक्षा लिया करती हैं, जिनके सौन्दर्य आदि गुणोंकी
लक्ष्मीजी एवं पार्वतीजी वाञ्छा किया करती हैं, जिनके
पातिव्रत्यधर्मकी सतीशिरोमणि अरुन्धतीजी भी कामना
किया करती हैं, जिनके सद्गुणोंका गान करते-करते
श्रीकृष्ण भी पार नहीं पाते, उन श्रीराधिकाके गुणोंकी
गणना एक तुच्छ जीव किस प्रकार कर सकता
है?"182-184॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/69, 75-79, 90-96,
122-124, 240-248, 255 संख्या देखें॥182-184॥
यहाँ तक श्रीराधाकृष्णतत्त्व;
अब रस-प्रेम-तत्त्व वर्णनारम्भ :-
प्रभु कहे,-"जानिलुँ कृष्ण-राधा-प्रेमतत्त्व।
शुनिते चाहिये दुँहार विलास-महत्त्व॥"185॥
अनुभाष्य-
(प्रश्नोत्तरक्रमेण श्रीराधिका-माहात्म्यं वर्णयति-) कृष्णस्य
प्रणयजनिभूः (प्रणयस्य जन्मभूमिः) का?-एका राधिका।
अस्य कृष्णस्य प्रेयसी (प्रेमपात्री) का?-अनुपमगुणा
(अतुलनीयगुणसमन्विता) एका राधिका, न च अन्या। अस्याः
(राधिकायाः एव) केशे जैह्मयं (कौटिल्यं), दृशि (नयने)
तरलता (चञ्चलता), कुचे निष्ठुरत्वं (काठिन्यं) हरेः वाञ्छा-पूर्त्त्यै
(वासनापूरणाय) प्रभवति (शक्नोति), न च अन्या (कापि
तादृशी)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥181॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैंने कृष्णतत्त्व, राधातत्त्व
और उनके परस्परके प्रेमतत्त्वको तो जान लिया है,
अब मैं राधा-कृष्णके विलासकी महिमाको श्रवण
करना चाहता हूँ॥"185॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'विलास-महत्त्व'-दोनोंके
प्रेमविलासकी महिमा॥185॥
व्रजके किशोर-किशोरीके चरित्रका वर्णन :-
राय कहे,-"कृष्ण हय 'धीर-ललित'।
निरन्तर कामक्रीड़ा-याँहार चरित॥186॥
श्रीराधिकाके श्रीकृष्णवशकारी विविध गुण :-
याँर सौभाग्य-गुण वाञ्छे सत्यभामा।
याँर ठाञि कलाविलास शिखे व्रजरामा॥182॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा,-"श्रीकृष्ण
'धीरदलित' नायक हैं। निरन्तर काम-क्रीड़ा ही उनके
चरित्रका वैशिष्ट्य है॥186॥
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