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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1138, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1138

[ 8/124–152 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

न कहकर कामगायत्री इसलिये कहा गया, क्योंकि इसमें
सम्मिलित 'काम' नाम केवल मधुर भावमें ही ग्रहण
किया जाता है। श्रीकृष्णकी सर्वोत्कृष्ट अवस्थाका नाम
'काम' है। वही कामदेव अनङ्गके रूपमें हैं।
कामगायत्रीमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं, जो श्रीकृष्णके
अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्रोंको लक्ष्य करते हैं, यथा—एक
मुखचन्द्र, दो गण्ड(कपोल), एक चन्दन बिन्दु, अर्धचन्द्र
ललाट तथा बीस चन्द्र हस्त तथा पदके नख। उनका
ललाट केशोंसे आधा ढका हुआ होता है, इसलिये उसे
अष्टमीका अर्धचन्द्र कहा गया है। काम गायत्रीमें 'वि'के
पूर्व जो 'य' है, वही अर्धाक्षर माना गया है और
ललाटकी स्थिति भी मन्त्रमें इसी स्थानपर है। श्रीकृष्णके
विषयमें अर्धचन्द्र भी पूर्ण ही है, क्योंकि श्रीकृष्ण
अखण्ड हैं। श्रुतिके 'ॐ पूर्णमदं' श्लोकके अनुसार
श्रीकृष्णका एक अंश और कला भी परिपूर्ण है।
श्रीकृष्णके अङ्ग-स्थित ये चन्द्र उदित होकर त्रिजगत्‌को
काममय करते हैं, सबके हृदयमें श्रीकृष्णसेवा सुख
वासनाका उद्दीपन कराते हैं।
कामगायत्री सभी गायत्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि
उसमें जो ध्यान और प्रार्थना है वह सम्पूर्ण रूपसे
चिद्-विलासमय है, जो अन्य किसी गायत्रीमें नहीं है।
इस गायत्रीमें श्रीगोपीजनवल्लभके परिपूर्ण ध्यानके पश्चात्
उनकी लीलाकी स्फूर्ति और उस अप्राकृत अनङ्गको
प्राप्त करनेकी प्रार्थना होती है। व्रजगोपियोंसे परिवेष्ठित
श्रीमती राधिकाके सङ्ग लीलाविलासी नवीन मदन
श्रीकृष्णको सुख देनेकी कामनामें तन्मय हो जाना ही
कामबीज उपासनाका तात्पर्य है।
गोपाल-मन्त्रके कृष्ण, गोविन्द और गोपीजनवल्लभ
कामगायत्रीमें इस प्रकार अवस्थित हैं—'कृष्ण'—कामदेव,
'गोविन्द'—पुष्पबाण और 'गोपीजनवल्लभ'—अनङ्ग।
कामबीजके अन्तर्गत पञ्चाक्षर ही श्रीकृष्णके पञ्चबाण
हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके लिये बलवती वासना ही
पञ्चबाणकी क्रिया है। रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्शके
द्वारा आस्वादन ही पुष्पबाण हैं। श्रीकृष्ण ही साक्षात्
मन्मथ-मन्मथ अनङ्ग हैं। वे अपनी कन्दर्परूप लीलाको
प्रकट करके त्रिभुवनको जय करते हैं।
साधकगण कामगायत्री उपासनाके द्वारा व्रजमें विराजित
श्रीराधाकृष्णका सेवासुख लाभ करते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी ॥ 124-148 ॥

(2) श्रीराधिकाके तत्त्वका वर्णन आरम्भ :—
एइ त' संक्षेपे कहिल कृष्णेर स्वरूप।
एबे संक्षेपे कहि राधा-तत्त्वरूप ॥ 149 ॥
श्रीकृष्णकी तीन शक्तियाँ :—
कृष्णेर अनन्त-शक्ति, ताते तिन-प्रधान।
'चिच्छक्ति', 'मायाशक्ति', 'जीवशक्ति'—नाम ॥ 150 ॥
'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा', 'तटस्था' कहि यारे।
अन्तरङ्गा 'स्वरूप शक्ति'—सबार उपरे ॥ 151 ॥
अनुवाद—(श्रीरामानन्द रायने कहा—) इस प्रकार
संक्षेपमें मैंने श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन किया। अब
श्रीराधा-तत्त्वका स्वरूप संक्षेपमें सुनिये। श्रीकृष्णकी
अनन्त शक्तियाँ हैं, उनमेंसे तीन शक्तियाँ प्रधान
हैं—'चित्-शक्ति', 'मायाशक्ति' और 'जीवशक्ति'। इन्हें
क्रमशः 'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा' और 'तटस्था' भी कहते
हैं। इन सभीमें अन्तरङ्गा अर्थात् 'स्वरूप शक्ति' प्रधान
है॥ 149-151 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 2/101-103 संख्या, 5/42,
45, 57-58 संख्या देखें ॥ 151 ॥
विष्णुपुराण (6/7/61) :—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 152 ॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको
मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया
है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया'
है॥ 152 ॥

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