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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1137

आठवाँ अध्याय 8/124-148 ]
इस श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामीने श्रीराधाकी सखियों
ललिता और श्यामाके नाम दिये हैं। श्रीराधाके साथ
श्रीकृष्णके स्वच्छन्द विहारमें इनके द्वारा रसपुष्टिका
योगदान होता है। ये दोनों ही यूथेश्वरियाँ हैं।
श्रीकृष्ण वृन्दावनमें अप्राकृत नवीन मदन हैं और
उनकी उपासना कामगायत्री और कामबीजके द्वारा होती
है। 'कम' धातुसे काम शब्दकी निष्पत्ति होती है।
कामका अर्थ है—जिसकी कामना की जाय, अभिलाषा
की जाय। श्रीकृष्णकी ही कामना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि
वे अतिशय रूपवान हैं, अत्यन्त मधुर हैं, उनका यह
सौन्दर्य और माधुर्य क्षण-क्षणमें नित्य नवीन अनुभव
होता है। अतः वे अप्राकृत नवीन मदन हैं, उनका यह
स्वरूप प्रकृतिसे अतीत है। यह अप्राकृत मदन स्वरूप
उपासकोंके हृदयमें तीव्र कामना उत्पन्न करके उन्हें मत्त
कर देता है। श्रीकृष्ण परम करुण और रसिकशेखर
हैं। वे रस स्वरूप हैं। रस शब्दके दो अर्थ होते
हैं—आस्वाद्य 'रस' और रस-आस्वादक 'रसिक'। वे
रस-रूपमें आस्वाद्य हैं और रसिक-रूपमें वे आस्वादक
हैं। उसी 'रसस्वरूप' रूपमें श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके
लिये कामबीज और कामगायत्रीके द्वारा उनकी उपासना
की जाती है। कामगायत्री श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। इस
रसमय ब्रह्मकी उपासना कामबीजयुक्त कृष्णमन्त्र 'गोपालमन्त्र'
और कामगायत्रीके द्वारा ही सिद्ध होती है। बीजयुक्त
होनेपर ही मन्त्र सम्पूर्ण होता है।
कामबीज, 'क्लीं'—यह आदि एकाक्षर बीज या
कामबीज है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्र तथा उपनिषदोंमें
इसका अर्थ इस प्रकार है। श्रीभगवान्ने 'क्लीं'—इस
कामबीजके द्वारा इस जगत्की सृष्टि की। इस बीजके
अन्तर्गत 'क'-कारसे जल, 'ल'-कारसे भूमि, 'ई'-कारसे
अग्नि तथा नाद अर्थात् चन्द्रसे वायु एवं बिन्दुसे
आकाश उत्पन्न हुआ है। इसलिये कामबीजात्मक मन्त्र
ही समस्त प्राणियोंका मूल कारण है।
रागमार्गके अनुसार मन्त्रार्थ—'क'-कारसे सच्चिदानन्द-
विग्रह परम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, 'ल'-कारसे
श्रीराधाकृष्णके प्रेम-जनित परमानन्द सुख-समुद्र, 'ई'-कारसे
नित्य वृन्दावनेश्वरी सर्वप्रेयसी शिरोमणि परमा प्रकृति
श्रीराधा तथा चन्द्रबिन्दुसे श्रीराधाकृष्णका परस्पर चुम्बनानन्द
माधुर्य।
कृष्णमन्त्र या गोपाल-मन्त्र पाँच भागोंमें विभक्त
है—

  1. 'कृष्णाय'—श्रीकृष्ण अपनी वेणु, रूप, लीला
    आदिके अतुलनीय माधुर्य प्रवाहसे त्रिजगत्के
    स्थावर-जङ्गमादि सबके चित्तको आकर्षित करते हैं।
    इस प्रकार श्रीकृष्णके भुवनमोहन स्वरूपके साथ
    साधकका सम्बन्ध होता है।
  2. 'गोविन्दाय'—श्रीकृष्ण नन्द-गोकुलमें मनोहर
    नवजलधरवर्ण श्यामसुन्दर रूपमें अपनी मधुर लीलाका
    विस्तार करते हैं। नयन, कर्ण आदि समस्त इन्द्रियों
    और हृदयको उल्लसित करनेवाले गोविन्दकी साधक
    अपनी समस्त इन्द्रियोंके द्वारा आराधना करता है,
    अर्थात् अभिधेय तत्त्वमें प्रतिष्ठित होता है।
  3. 'गोपीजन'—'गोपी' श्रीकृष्णकी एक विशेष ह्लादिनी
    शक्ति है। यह भक्तोंको प्रेम प्रदानकर उनका पालन-पोषण
    करती हैं। श्रीराधा ही ह्लादिनी शक्ति-स्वरूपिणी हैं।
    इसलिये 'गोपी' शब्दसे मूलप्रकृति श्रीराधा तथा 'जन'
    शब्दसे श्रीराधाकी कायव्यूहरूपा ललिता, विशाखा आदि
    सखियोंका बोध होता है।
  4. 'वल्लभाय'—जो सर्वश्रेष्ठ नायकके रूपमें गोपियोंके
    साथ परम मधुर लीला-विलास करते हैं, वे ही
    गोपीजनवल्लभ श्रीराधिका और उनकी सखियोंके प्राणप्रियतम
    हैं। गोपीजनवल्लभ ही इस मन्त्रके प्रयोजन-तत्त्व हैं।
  5. 'स्वाहा'—यह श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता चिद् शक्ति
    योगमाया हैं, जो भक्तोंको श्रीकृष्णके पादपद्मोंमें समर्पण
    करती हैं। 'स्वाहा' पदके उच्चारणसे ही श्रीराधाकृष्ण
    युगलमें सम्पूर्ण रूपसे आत्मसमर्पण होता है।
    'कामगायत्री'—यह ब्रह्म गायत्रीका ही सिद्ध स्वरूप
    परिपक्व फल है। यह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है और
    रसमय ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे कृष्णगायत्री
    । 289