श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ६०३ )
वह परमात्मा ही है। “उसे जानकर ही मृत्यु को अतिक्रमण करता है”
“उसको भली भाँति जानकर इस लोक में ही अमर हो जाता है, इसके
अतिरिक्त मुक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है” इत्यादि में परम पुरुष
परमात्मा को ही एक मात्र ज्ञेय और उपायरूप प्रतिपादन किया गया है।
परम पुरुष परमात्मा के विभूतिरूप, मोक्ष प्राप्त करने वाले जीवात्मा
का जो स्वरूपगत यथार्थ ज्ञान है, उसे भी मुक्ति प्राप्ति के उपायभूत
परमात्मज्ञान का उपयोगी बतलाया गया है। स्वतः उसकी उपायरूप
से कोई सत्ता नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि-इस प्रसंग में 'द्रष्टव्य”
इत्यादि वाक्य में मोक्षोपायरूप से परमात्मा का ही उपदेश दिया
गया है।
तथा-“तस्य ह वा एतस्य महतोभूतस्य निश्वसितमेतद्यद्
ऋग्वेदः” इत्यादिना कृत्स्नस्यजगतः कारणत्वमुच्यमानं परमपुरुषाद
न्यस्य कर्मपरवशस्यमुक्तस्यनिर्व्यापारस्य च पुरुषमात्रस्य न संभवति ।
तथा “आत्मनो वा अरे दर्शनेन” इत्यादिना एकविज्ञानमभिधीय-
( ६०४ )
यह कहना भी युक्ति युक्त नहीं है, क्योंकि—अचेतन प्रपंचमय जगत के
ज्ञान के बिना समस्त ज्ञान हो नहीं सकता। उक्त प्रतिज्ञा (एक के ज्ञान
से सबका ज्ञान हो जाना है) के प्रतिपादन के लिए "यही ब्राह्मण यही
क्षत्रिय" इत्यादि से लेकर "यह सब कुछ आत्मास्वरूप है" यहाँ तक
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध चिदचिद् मिश्रित सारे प्रपंचमय जगत को
"इदं" शब्द से बतलाकार "यह जो सब आत्म स्वरूप है" इत्यादि में
उसकी आत्मा के साथ एकता दिखलाई गई है, ऐसी एकता परमात्मा में
ही संभव हो सकती है।
नहीदंशब्दवाच्यं चिदचिन्मिश्रं जगत् पुरुषेणाचित्संसृष्टेन
तद्वियुक्तेनस्वरूपेणवावस्थितेन चैक्यमुपगच्छति। अतएव
"सर्वं तं परादात् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद" इति व्यतिरिक्तत्वेन
सर्व वेदन निन्दा च तथा प्रथमे च मैत्रेयीब्राह्मणे "महद्भूतमनंत-
मपारम्" इति श्रुता महत्त्वाद्यो गुणाः परमात्मन एव संभवंति।
अतः स एवात्र प्रतिपाद्यते।
पुरुष चैतन्य हो अथवा जडमिश्रित हो, किसी भी रूप से वह इदं
पद वाच्य जड़चेतनात्मक जगत के साथ अद्वैत भाव से रह नहीं सकता।
इसीलिए "जो लोग आत्मा के अतिरिक्त सब पदार्थों को जानते हैं
(अर्थात् सारे जगत को आत्मा से भिन्न मानते हैं) सारे पदार्थ उन्हें ही
प्रतारित करते हैं" इत्यादि में जगत् को परमात्मा से भिन्न मानने की
निन्दा की गई है। तथा प्रथम मैत्रेयीब्राह्मण के—"अनंत अपार स्वतः
सिद्ध महान्" इत्यादि में उक्त महत्त्वादि गुण भी उस परमात्मा में ही
संभव हो सकते हैं। इससे निश्चित होता है कि वह परमात्मा ही उक्त
प्रकरण के प्रतिपाद्य हैं।
यत्तूक्तं—पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियान्वयिनोजीवात्मन उप-
क्रमेत्वन्वेष्टव्यतया प्रतिपादनात्तद्विषयमेवेदंवाक्यमिति, तद-
युक्तम्, "आत्मनस्तु कामाय" इत्यात्मशब्देन जीवात्मसंशब्दने,
तस्य "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" इत्यनेनान्वयप्रसंगात्। "आत्मा
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वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यात्मनो द्रष्टव्यत्वोपयोगितया “आत्मनस्तु
कामाय” इत्युपदिष्टमिति प्रतीयते । आत्मनस्तुकामाय–आत्मनः
कामसंपत्तये, काम्यन्त इति कामाः, आत्मन इष्टसंपत्तय इति
यावत् । न च जीवात्मन इष्टसंपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति,
इत्युक्ते सति तस्यजीवस्य स्वरूपमन्वेष्टव्यं भवति । प्रियमेवहि अन्वे-
ष्टव्यम्, न तु प्रियंप्रति शेषिणः प्रियवियुक्तं स्वरूपम् । यस्मादात्मन
इष्ट संपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति, तस्मात् पत्यादिप्रियं परि-
त्यज्य तद्वियुक्तमात्मस्वरूपमन्वेष्टव्यमित्यसंगतं भवति ।
जो यह कहा कि—वाक्य के प्रारंभ में पति-पत्नी-पुत्र-धन-पशु
आदि प्रिय वस्तुओं से संपर्कित होने से “द्रष्टव्य” इत्यादि में जीवात्मा
को ही द्रष्टव्य आदि कहा गया है, सो यह कथन भी असंगत है । “आत्म-
नस्तु कामाय” में आत्मनः पद से जीवात्मा का निर्देश मानने से “आत्मा
वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादि वाक्य के साथ उसकी संगति बैठ ही नहीं
सकती, क्योंकि—“आत्मा ही द्रष्टव्य है” इत्यादि में आत्मदर्शन को उप-
योगी बतलाकर “आत्मा की कामना से” इत्यादि उपदेश दिया गया है,
जिसका तात्पर्य होता है “आत्मा की कामपूर्ति के लिए” “काम” शब्द
का तात्पर्य होता है, कामना का विषयीभूत अर्थात् अभीष्ठ विषयराशि ।
इस अर्थ के अनुसार आत्मनस्तु कामाय” इत्यादि का तात्पर्य होगा कि—
“आत्मा की इष्ट संपत्ति के लिए ही पति पुत्रादि प्रिय होते हैं” ऐसा अर्थ
होने पर जीवात्मा का स्वरूप अन्वेष्टव्य नहीं हो सकता । प्रिय वस्तु
ही अन्वेषणीय होती है; प्रियवस्तु का अंगीभूत प्रियवियुक्त आत्मा का
स्वरूप कभी अन्वेषणीय नहीं हो सकता । पति आदि प्रिय पदार्थों की
पुंजीभूत राशि, आत्मा के प्रिय संपादन के लिए साधन हो सकती है,
उन पत्यादि प्रिय वस्तुओं के अन्वेषण को छोड़कर, प्रियतारहित आत्मा
के स्वरूप को अन्वेष्टव्य कहना असंगत है ।
प्रत्युत न पत्यादिशेषतया पत्यादीनां प्रियत्वम्, अपितु आत्मनः
शेषतया पत्यादीनां प्रियत्वमित्युक्ते स्वशेषतया त एवोपादेयाः स्युः ।
( १०६ )
“आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” इत्यस्य परेणानन्वये
वाक्यभेदः प्रसज्येत, अभ्युपगम्यमानेऽपि वाक्यभेदे पूर्ववाक्यस्य न
किंचित् प्रयोजनं दृश्यते । अतः पत्यादि सर्वप्रियं परित्यज्यात्मन
एवान्वेष्टव्यत्वं यथा प्रतीयते, तथा वाक्यार्थो वर्णनीयः ।
ऐसी कल्पना करना अधिक युक्ति संगत होगा कि—पति आदि
इसलिए प्रिय नहीं हैं कि वह पति आदि के अश हैं अपितु परमात्मा के
अंश होने से उन पत्यादि की प्रियता है, ऐमा मानने से वे स्व के मान्य
अंश होंगे और उपादेय होगे । “आत्मा की कामना से सब प्रिय होते हैं”,
इस वाक्य का, परवर्त्ती वाक्यों के साथ यदि संबंध नहीं रहेगा तो वाक्य
भेद हो जायगा, यदि वाक्य भेद को मानेंगे तो पूर्ववर्त्ती वाक्यों का कोई
प्रयोजन नहीं रहेगा । इसलिए पत्यादि समस्त प्रियवस्तुओं को छोड़कर,
परमात्मा के अन्वेषण की ही जिसमें प्रतीति हो, वैसा वाक्यार्थ करना
अधिक समीचीन होगा ।
सोऽयमुच्यते—“अमृतत्त्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन”
इति वित्तादीनां नित्यनिर्दोषनिरतिशयानंदरूपामृतत्वप्राप्त्यनुपाय
तामुक्तवा वित्तपुत्रपतिजायादीनां सातिशयदुःखमिश्रकाचित्कप्रिय-
त्वमनुभूयमानं न पत्यादिस्वरूपप्रयुक्तम्, अपितु निरतिशयानंदस्व-
भावपरमात्मप्रयुक्तम् । अतो य एव स्वयं निरतिशयानंदः सन्
अन्येषामपि प्रियत्वलेशास्पदत्वमापादयति स परमात्मैव दृष्टव्यः,
इत्युपदिष्ट्यते । तदयमर्थ. “न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो
भवति” न हि पतिजायापुत्रवित्तादयो मत्प्रयोजनायाहमस्य प्रियः
स्यामिति स्वसंकल्पात् प्रिया भवन्ति, अपि तु आत्मनः कामाय
परमात्मन. स्वाराधक प्रियप्रतिलम्भनरूपेष्टनिर्वृत्तय इत्यर्थः ।
प्रसग मे कहा गया कि—“धन से अमरता की आशा नहीं है”
अर्थात् ये धन आदि क्षणभंगुर पदार्थ, नित्यनिर्दोष सर्वातिशय परमानंद-
मय मुक्ति लाभ के उपाय नहीं है। पति स्त्री पुत्रादि में जो कुछ दुःख
[email protected]
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मिश्रित प्रियता की उपलब्धि होती है वह, पत्यादि के स्वरूप से नहीं
होती, अपितु वे सब अत्यानंदमय परमात्मा के अंश हैं, इसलिए होती है ।
जो स्वयं अत्यानंदमय होकर दूसरों को भी उस आनंद के लेश से आप्ला-
वित करता है, ऐसा परमात्मा ही दृष्टव्य है, ऐसा उपदेश किया गया
है । इसका तात्पर्य हुआ कि--“'अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं
होता” इत्यादि का यह अर्थ नहीं है कि--“पति, स्त्री, धन आदि सब
मेरे ही प्रयोजन के साधन हैं, मैं ही इनका प्रिय हूँ”; अपितु आत्मा की
प्रीति के लिए अर्थात् परमात्मा की आराधना के लिए, ये सब अभीष्ट
प्रियता प्रदान करते हैं; ऐसा मानना चाहिए ।
परमात्मा हि कर्मभिराराधितस्तत्तत्कर्मानुगुणं प्रतिनियतदेश-
कालस्वरूपपरिमाणमाराधकानां तत्तद्वस्तुगतं प्रियत्वमापादयति
“एष ह्येवानंदयति” इति श्रुतेः । नतु तत्तद्वस्तुस्वरूपेण प्रियम-
प्रियंवा । यथोक्तं-- “तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते ,तदेव
कोपाय यतः प्रसादाय च जायते । तस्मात् दुःखात्मकं नास्ति न
च किंचित्सुखात्मकम्” इति । “आत्मनस्तु कामाय” इत्यस्य
जीवात्मपरत्वेऽपि “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” इति तु परमात्मा
विषयमेव ।
“एष ह्येवानंदयति” इत्यादि श्रुति बतलाती है कि—परमात्मा,
आराधना के अनुसार उन आराधकों को, देश-काल-स्वरूप-परिमाण-
आकृतिगत प्रियता प्रदान करते हैं--जैसा कि-कहा गया--“एक ही
वस्तु जो एक बार प्रीतिकारक होती है, वही पुनः दुखदायी हो जाती
है, जो वस्तु क्रोधकारक होती है वही प्रीतिकारक हो जाती है, इससे
ज्ञात होता है कि कोई भी वस्तु सुखात्मक या दुःखात्मक नहीं है ।”
कोई भी वस्तु तत्त्वतः स्वरूप से प्रिय वा अप्रिय नहीं होती । “आत्मनस्तु
कामाय” इस वाक्य के जीवात्मा परक होते हुए भी, “आत्मा वा अरे
दृष्टव्यः” वाक्य तो परमात्म विषयक ही है ।
तत्रायमर्थः, यस्मात् पत्यादीनां इष्ट संपत्तये तत्परवशेन पत्या-
दयः प्रियत्वेन नोपादीयते, अपितु आत्मेष्ट संपत्तये स्वतंत्रेण स्वीप्र-
( ६० म )
यत्वेन उपादीयन्ते, तस्माद् य एवात्मनो निरुपाधिकनिर्दोषनिरव-
धिकः प्रियः परमात्मा, स एव हि दृष्टव्यः, नदुःखमिश्राल्पसुखदुःखो-
दर्काः परायत तत्तत्स्वभावाः पतिजायापुत्रवित्तादयोविषयाः, इति ।
अस्मिंस्तु प्रकरणे, जीवात्मवाचिशब्देनापि परमात्मन एवाभि-
धानात् “आत्मनस्तु कामाय” आत्मा वा अरे दृष्टव्यः “इति पूर्वोक्त .
प्रक्रिययोभयत्रात्मशब्दावेकविषयौ ।
उक्त कथन का सारांश यह है कि—पति आदि की प्रीति के लिए,
पति आदि प्रिय पदार्थों को, प्रियरूप मैं ग्रहण नहीं किया जाता अपितु
अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए, उन सबको प्रिय रूप से ग्रहण किया जाता
है, यदि तुम स्वाभाविक निर्दोष अपार प्रिय स्वरूप परमात्मा को, पति,
स्त्री, पुत्रादि सभी में देखोगे तो तुम्हारी वास्तविक अभीष्ट सिद्धि होगी,
क्योंकि—ये सांसारिक जीव दुःखमिश्रित अल्प सुखदायी, परिणाम में
दुखप्रद एवं स्वरूप और स्वभाव से परतंत्र हैं इनको देखने से शांति
मिलने के बजाय दुःख ही पल्ले पड़ेगा। इसलिए परमात्मा ही दृष्टव्य
हैं, पति पुत्र आदि नहीं। इस प्रकरण में तो, जीवात्मवाची शब्द
( ६०६ )
"यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवंते सरूपाः,
तथाऽक्षरात् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायंते तत्र चैवापियंति ।"
इत्यादिभिर्ब्रह्मणो जीवानामुत्पत्ति श्रवणात् तस्मिन्नेव लय श्रवणा-
च्च जीवानां ब्रह्मकार्यत्वेन ब्रह्मणैक्यमवगम्यते । अतो जीव शब्देन
परमात्माभिधानमिति ।
एक के ज्ञान से संपूर्ण का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा की सिद्धि
के लिए ही उक्त प्रसंग में केवल आत्मा शब्द का प्रयोग किया गया है
जिससे कि जीवात्मवाची शब्दों से परमात्मा का अर्थबोध होता है; ऐसा
आश्मरथ्य आचार्य की मान्यता है । यदि यह जीवात्मा, परमात्मा का
कार्य होने से, परमात्मा ही न होता, उससे एकदम भिन्न होता तो,
परमात्मा को जान लेने पर, इसका ज्ञान नहीं हो सकता था । "सृष्टि के
पूर्व यह जगत, एकमात्र आत्मस्वरूप ही था" ऐसे सृष्टिपूर्व के अद्वैत
प्रतिपादक वाक्य से उक्त बात की ही पुष्टि होती है । "जैसे प्रज्वलित
अग्नि ज्वाला से हजारों चिनगारियां बाहर छिटकती हैं, हे सौम्य ! उसी
प्रकार विविध प्रजा भी उस परब्रह्म से उत्पन्न होती है और उसी में
विलीन हो जाती है।" इत्यादि वाक्य में कही गई, ब्रह्म से जीव की
उत्पत्ति और प्रलय से जीवों की ब्रह्म कार्यता, और ब्रह्मात्मकता ज्ञात
होती है। इसलिए जीव शब्द से परमात्मा का ही वर्णन किया गया है,
यह निश्चित मत है ।
उत्क्रमिष्यत एवम्भावादित्यौडुलोमिः ।१।४।२१॥
यदुक्तं जीवस्य ब्रह्मकार्यतया ब्रह्मणैक्येनैकविज्ञानेन सर्वं वि-
ज्ञानप्रतिज्ञोपादनाथं ब्रह्मणो जीवशब्देन प्रतिपादनमिति, तदयुक्तम्
“न जायते म्रियते वा विपश्चिद्” इत्यादिनाऽजत्वश्रुतेः जीवात्मनां
प्राचीनकर्मफल भोगाय जगत्सृष्ट्यभ्युपगमाच्च, अन्यथाविषमसृष्ट्-
यनुपपत्तेश्च ब्रह्मकार्यस्यजीवस्य ब्रह्मतापत्तिलक्षणो मोक्ष
आकाशादिवदवर्जनीय इति, तदुपायविधानानुष्ठानानर्थक्याच्च,
घटादिवत् कारणप्राप्तेर्विनाशरूपत्वेन मोक्षस्यापुरुषार्थत्वाच्च ।
[email protected]
( ६१० )
जीवात्मन उत्पत्तिप्रलयवादोपपत्तिरुत्तरत्र प्रपंचयिष्यते । श्रुतः
“एषसंप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेनरूपेणा-
भिनिष्पद्यते” यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे
विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति-
दिव्यम्” इत्युत्क्रमिष्यतः परमात्मभावात् जीवशब्देन परमात्म-
नोऽभिधानम् इति औडुलोमिराचार्यों मन्यतेऽस्म ।
जीव ब्रह्म का कार्य है, इससे जीव और ब्रह्म एक हैं, एक के ज्ञान
से संपूर्ण का ज्ञान होता है, इस प्रतिज्ञा के प्रतिपादन के लिए ही, ब्रह्म
का जीव शब्द से वर्णन किया गया है, यह कथन असंग । है। “ज्ञानी न
उत्पन्न होता है न मरता है” इत्यादि में जीव को अजन्मा बतलाया गया
है। जीवों के प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही जगत् की सृष्टि का भी वर्णन
मिलता है, यदि ऐसा न होना तो, सृष्टि में विषमता न होती । ब्रह्म के
कार्य आकाश आदि की तरह ब्रह्म के कार्य जीवात्मा का भी यदि ब्रह्म-
तापत्तिलक्षण वाला मोक्ष अनायास ही हो जाय तो, मोक्ष प्राप्ति के
उपाय अनुष्ठान आदि सब व्यर्थ हो जावेंगे [अर्थात् जैसे आकाश स्वतः
प्रकट होकर प्रलय में स्वतः लीन हो जाता है वैसे ही यदि जीवों की भी
उत्पत्ति और प्रलय होवे तो अनुष्ठानों की क्या आवश्यकता है] घट
आदि की तरह स्वतः ही विनष्ट होने पर अपने कारणत्व को यदि जीव
भी पा जावे तो, मोक्षनामक पुरुषार्थ को मानने की आवश्यकता ही क्या
है ? जीवात्मा के संबंध में जो उत्पत्ति और प्रलय की प्रसिद्धि है उसका
विवेचन आगे करेंगे ।
“यह जीव इस शरीर से बाहर निकल कर परमात्मा की परंज्योति
को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त कर लेता है, ‘जैसे कि
बहती हुई नदियाँ अपने नामरूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती
हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष नाम रूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को
प्राप्त हो जाता है ।” ऐसे, उत्क्रमणकारी जीव के परमात्मभाव के निरू-
पण से ज्ञात होता है कि उक्त प्रसंग में जीव शब्द से परमात्मा का ही
वर्णन किया गया है । ऐसा औडुलोमि आचार्य का मत है ।
[email protected]
अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ।१।४।२२॥
यदुक्तमुत्क्रमिष्यतो जीवस्य ब्रह्मभावाद् ब्रह्मणस्तच्छब्देनाभि-
धानमिति, तदप्ययुक्तम्, विकल्पासहत्वात् । अस्य जीवात्मन उत्क्रा-
न्तेः पूर्वमनेवंभावः किं स्वाभाविकः उतौपाधिकः अपारमार्थिकः
वेति । स्वाभाविकत्वे ब्रह्मभावो नोपपद्यते, भेदस्य स्वरूप-
प्रयुक्तत्वेन स्वरूपे विद्यमाने तदनपायात् । अथ भेदेनसह स्वरूपमप्य-
पैतीति, तथासति विनष्टत्वादेव तस्य न ब्रह्मभावः अपुरुषार्थत्वा-
-दिदोषप्रसंगश्च । पारमार्थिकौपाधिकत्वे प्रागपि ब्रह्मैवेति “उत्क्र-
मिष्यत एवंभावात्” इति विशेषो न युज्यते वक्तुम् । अस्मिन् पक्षे
हि उपाधिब्रह्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तराभावान्निरवयवस्य ब्रह्मण उपा-
धिनाच्छेदाद्यसंभवाच्चोपाधिगत एव भेद इत्युत्क्रान्तेः प्रागपि
ब्रह्मैव । औपाधिकस्य भेदस्यापारमार्थिकत्वे कस्यायमुत्क्रान्तौ ब्रह्म-
भाव इति वक्तव्यम् । ब्रह्मण एवाविद्योपाधितिरोहितस्वरूपस्येति चेन्न,
नित्यमुक्तस्वप्रकाशज्ञानस्वरूपस्याविद्योपाधितिरोधानासंभवात् । ति-
रोधानं नाम वस्तुस्वरूपेविद्यमाने तत्प्रकाशनिवृत्तिः । प्रकाश एव
वस्तु स्वरूपमित्यंगीकारे तिरोधानाभावः स्वरूपनाशो वा स्यात् ।
अतो नित्याविर्भूतस्वस्वरूपत्वात्तस्योत्क्रान्तौ ब्रह्मभावे न कश्चिद्
विशेषः , इति “उत्क्रमिष्यतः” इति विशेषणं व्यर्थमेव । “अस्माच्छ-
रीरात् समुत्थाय” इति पूर्वमनेवंरूपस्य न तदानीं ब्रह्मतापत्तिमाह,
अपितु पूर्वसिद्धस्वरूपस्याविर्भावम् । तथाहि वक्ष्यते “संपद्याविर्भावः
स्वेनशब्दात्” इत्यादिभिः ।
उत्क्रमण करने वाले जीव को ब्रह्मभाव प्राप्त होता है, इसीलिए
जीव शब्द से ब्रह्म का वर्णन किया गया है, इत्यादि कथन भी असंगत
है । ऐसा तो विकल्प से भी नहीं हो सकता ( एक विषय के लिए दो तीन
या इससे अधिक पक्षों की कल्पना करना ही विकल्प है ) उक्तमत वालों
से मैं पूछता हूँ कि-जीवात्मा में उत्क्रांति के पूर्व जो ब्रह्मभाव का अभाव है,
( ६१२ )
वह स्वाभाविक है या औपाधिक ? वह भी पारमार्थिक है या आपार-
मार्थिक ? यदि वह स्वाभाविक है तो जीवात्मा में कभी ब्रह्मभाव संभव
नहीं हैं, क्योंकि-जब भेद स्वतः सिद्ध है तो, वस्तुस्थिति में उस भेद का
अवगम हो नहीं सकता। यदि कहो कि भेद समाप्ति के साथ उसका
स्वरूप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा मानने पर तो, विनष्ट होने वाले
उसका ब्रह्मभाव होना और भी कठिन है, साथ ही मुक्ति के संबंध में,
अपुरुषार्थत्व दोष, उपस्थित हो जाता है। यदि यह पारमार्थिक
और औपाधिक है तो यह समझना चाहिए कि उत्क्रांति के पूर्व जीव
ब्रह्म ही है, तब “उत्क्रमण कर वह ब्रह्मभाव को प्राप्त करता है” इत्यादि
कहना निरर्थक है। इस स्थिति में ( पारमार्थिक औपाधिकावस्था में )
एक बात और है, उपाधि ब्रह्म इन दो के अतिरिक्त कुछ और तो रहता
नही तथा उपाधिद्वारा, निरवयव ब्रह्म में विभाग तो संभव है नहीं, इससे
यह सिद्ध होता है कि-वह केवल औपाधिक ही हो सकता है, पारमार्थिक
नही, इसलिए जीव, उत्क्रमण के पूर्व भी ब्रह्मस्वरूप ही था। यदि वह
औपाधिक भेद अपारमार्थिक है, तो फिर उत्क्रांति के बाद ब्रह्मभाव
किसका होता है ? यदि कहो कि अविद्या रूप उपाधि से विरहित ब्रह्म
ही, ब्रह्मभाव है, तो तुम्हारा यह कथन भी असंगत है, क्योंकि-नित्यमुक्त
और नित्य प्रकाश ज्ञान स्वभाव परब्रह्म में, अविद्याजन्य आवरण निमि-
त्तक तिरोधान असंभव है। वस्तुस्वरूप के रहते हुए उसके प्रकाश की
निवृत्ति हो जाना ही तो तिरोधान कहलाता है, प्रकाश स्वरूप परब्रह्म
का तिरोधान मानना तो प्रकाश निवृत्ति होने से उसके स्वरूप का नाश
मानना ही है। यदि नहीं मानते तो जीव का नित्यब्रह्मभाव निश्चित
होता है, उत्क्रांति से उसमें कोई विशेषता तो होगी नहीं, ‘उत्क्रमिष्यत्त···
यह विशेषण व्यर्थ ही है। “इस शरीर से उठकर” इत्यादि में मृत्युपूर्वी
अब्रह्मभाव वाले जीव की, तत्काल ब्रह्मप्राप्ति कही गई हो ऐसा भी नही
है, अपितु पूर्वसिद्ध उसके अपने वास्तविक स्वरूप का पुनः आविर्भाव
मात्र बतलाया गया है। यही बात सूत्रकार “संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात्”
इत्यादि में कहते हैं।
अतः “अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य”— य आत्मनि तिष्ठन्ना-
त्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्त रोयम-
[email protected]
( ६१३ )
यति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः”— योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं
शरीरं यमक्षरं न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव
एको नारायणः”— श्रन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा” इति
स्वशरीरभूते जीवात्मन्यात्मतयाऽवस्थिते जीव शब्देन ब्रह्म प्रतिपाद-
नमितिकाशकृत्स्न आचार्यो मन्यतेस्म ।
अतः “जीवात्मा के स्वरूप में प्रवेश करके” जो आत्मा में स्थित
रहते हुए भी आत्मा से पृथक् है आत्मा जिसको नहीं जानता, आत्मा ही
जिसका शरीर है जो कि आत्मा को नियमित करता है, वही तुम्हारा
अन्तर्यामी अमृत स्वरूप आत्मा है “जो अक्षर ( जीव ) में संचरण करता
है, अक्षर ही जिसका शरीर है अक्षर जिसे नहीं जानता ऐसा सर्वान्तर्यामी
निष्पाप दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है” सबका आत्मस्वरूप
परमेश्वर अन्तर्यामी शासक है” इत्यादि श्रुतियों में, अपने ही शरीररूप
जीवात्मा में आत्मा रूप से उनकी स्थिति बतलाई है, इसीलिए जीवात्म-
वाची शब्दों से परमात्मा का वर्णन किया गया है। ऐसा काशकृत्स्न
आचार्य का अभिमत है।
जीवशब्दश्च जीवस्य परमात्मपर्यन्तस्यैव वाचको न , जीवमा-
त्रस्येति पूर्वमेवोक्तम् “नामरूपे व्याकरवाणि” इत्यत्र । एवमात्म-
शरीरभावेन तादात्म्योपपादने परस्य ब्रह्मणोऽपहतपाप्मत्वसर्वज्ञ-
त्वादिगोचरा जीवस्याविदुषः शोचतो ब्रह्मोपासनान् मोक्षवादिन्यो
जगत्सृष्टिप्रलयाभिधायिन्यो जगतो ब्रह्मतादात्म्योपदेशपराश्च
सर्वाः श्रुतयः सम्यगुपपादितां भवेतीति काशकृत्स्नीयंमतं सूत्रकारः
स्वीकृतवान् ।
जीव शब्द, जीव के परमात्मभाव तक का वाचक है केवल,
जीवभाव मात्र का ही वाचक नहीं है, ऐसा “नामरूपे व्याकरवाणि” के
प्रसंग में भी बतला चुके हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, परमात्मा के
शरीर रूप जीवात्मा के साथ, तादात्म्य भाव स्थिर होता है। परब्रह्म के
[email protected]
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निर्दोष और सर्वज्ञ आदि गुणों के प्रतिपादक, तत्त्वज्ञान के अभाव में
शोक संतप्त जीव के ब्रह्मोपासना के फलस्वरूप होने वाले मोक्ष के प्रति-
पादक, जगत की सृष्टि स्थिति और प्रलय के प्रतिपादक, तथा ब्रह्म के
साथ ब्रह्म के साथ जगत के तादात्म्य के प्रतिपादक श्रुतिवाक्यों का भी
उक्त प्रकार से ही समाधान हो सकता है। इस काशकृत्स्न आचार्य के
मत को ही सूत्रकार ने स्वीकार किया है।
अयमत्रवाक्यार्थः, अमृतत्वोपाये मैत्रेय्या पृष्टे याज्ञवल्क्यः
“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” इत्यादिना परमात्मोपासनममृतत्वोपाय-
मुक्त्वा ”आत्मनि खल्वरे दृष्टे” इत्यादिनोपास्यलक्षणम्, दुंदुभ्या-
दिदृष्टान्तैश्चोपासनोपकरणभूत मनः प्रभृतिकरणनियमनं च सामा-
न्येभिधाय “सऽयथाऽर्द्रैन्धाग्ने” इत्यादिना “स यथा सर्वासामपां
समुद्र एकायनम्” इत्यादिना चोपास्यभूतस्य परस्यब्रह्मणो निखि-
लजगदेककारणत्वम्, सकलविषयप्रवृत्तिमूलकरणग्रामनियमनं च
विस्तीर्णमुपदिश्य “स यथा सैन्धवघनः” इत्यादिना अमृतत्वोपाय
प्रवृत्तिप्रोत्साहनाय जीवात्मस्वरूपेणावस्थितस्य परमात्मनोऽपरि-
च्छिन्नज्ञानैकाकारतामुपपाद्य तस्यैवारिच्छिन्नज्ञानैकाकारस्य संसार
दशायां भूतपरिणामानुवृत्ति “विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यःसमुत्थाय
तान्येवानुविनश्यति” इत्यभिधाय “न प्रेत्य संज्ञास्ति” इति मोक्षद-
शायां स्वाभाविकापरिच्छिन्नज्ञानसंकोचाभावेन भूतसंघातैनेकीकृत्या-
ऽत्मनि देवादिरूपज्ञानाभावमुक्तवा पुनरपि “यत्र हि द्वैतमिव भवति”
इत्यादिना अब्रह्मात्मकत्वेन नानाभूतवस्तुदर्शनमज्ञानकृतमिति निर-
स्तनिखिलाज्ञानस्य ब्रह्मात्मकं कृत्स्नं जगदनुभवतो ब्रह्मव्यतिरिक्तव-
स्त्वन्तराभावेन भेददर्शनं निरस्य “येनेदं सर्वं विजानाति तं केन वि-
जानीयात्” इति च जीवात्मा स्वात्मतयाऽवस्थितेन येन परमात्मना
ग्राहितज्ञानः सन्निदं सर्वं विजानाति, अयंतं केन विजानीयात् , न
केनापीति परमात्मनो दुरवगमत्वमुपपाद्य “स एष नेति नेति”
( ६१५ )
इत्यादिनाऽयं सर्वेश्वरः स्वेतरसमस्तचिदचिद्वस्तुविलक्षणस्वरूप
एव सर्वशरीरः सर्वस्यात्मतयाऽवस्थित इति स्वशरीरभूतचिदचिद्-
वस्तुगतैः दोषैर्न स्पृश्यत इत्यभिप्राय 'विज्ञातारमरेकेन विजानीया-
दित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वम्" इति समस्त
वस्तुविजातीयं निखिलजगदेककारणभूतं सर्वस्य विज्ञातारं पुरुषो-
त्तममुक्तप्रकारादुपासनात् ऋते केन विजानीयात् इतोदमेवोपासनम-
मृतत्वोपायः, ब्रह्मप्राप्तिरेव च अमृतत्वमभिधीयते, इत्युक्तवान् ।
अतः परब्रह्मैवास्मिन्वाक्ये प्रतिपाद्यत इति परमेव ब्रह्म जगत्कारणं,
न पुरुषस्तदधिष्ठाता च प्रकृतिरिति स्थितम् ।
उक्त मत के अनुसार प्रासंगिक वाक्यों का अर्थ इस प्रकार किया
जावेगा कि-मैत्रेयी को, मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछने पर याज्ञवल्क्य ऋषि
ने प्रथम तो "आत्मा ही दृष्टव्य है" इत्यादि से परमात्मोपासना को ही,
मुक्ति प्राप्ति का उपाय बतलाया फिर "आत्मा में दर्शन करने से ही"
इत्यादि से उपास्य वस्तु का स्वरूप तथा दुन्दुभि आदि के दृष्टान्त से
उपासना की सहायक मन आदि इन्द्रियों के संयम का उपदेश सामान्यतः
करके "अग्नि जैसे आर्द्र काष्ठ में है वैसे ही वह भी है" तथा "समुद्र ही
जैसे सब जलों का एकमात्र आश्रय है, वैसे ही वह भी है" इत्यादि से
उपास्य परब्रह्म को ही समस्त जगत का कारण बतलाते हुए समस्त
प्रवृत्तियों की मूल उत्स, इन्द्रियों के नियमन का विस्तृत रूप से विवेचन
करके "सैन्धव नमक का टुकड़ा जैसे बाहर भीतर एक रस है वैसे ही वह
भी आनन्दैकरस स्वभाव है" इत्यादि से, मोक्ष प्राप्ति के उपायों अनुष्ठानों
की वृत्ति को उत्साहित करने के लिए, जीवात्मा में अवस्थित परमात्मा
को अपरिच्छिन्न ज्ञान का मूल कारण बतलाकर "विज्ञान मूर्ति (जीव)
इन प्रपंचों से संसक्त होकर उत्पन्न होता है और उन्हीं के साथ विनष्ट हो
जाता है" इत्यादि से अपरिच्छिन्न ज्ञानैकमूर्ति परमात्मा की ही संसारदशा
में पंचभूत परिणाम रूप शरीरादि की अनुवृत्ति बतलाकर अन्त में कहा कि
"मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता" अर्थात ज्ञान ही जो कि आत्मा का
एक मात्र स्वभावसिद्ध स्वरूप है, मोक्षावस्था में भी उस अपरिच्छिन्न ज्ञान
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में कोई न्यूनता नही आती , जिससे ज्ञात होता है कि -देहरूप से संबद्ध
आत्मा मे अज्ञानमूलक देव- मनुष्य- दानव आदि बुद्धि होती है। "जब
द्वैतबुद्धि होती है" इत्यादि मे ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति न होने से वस्तुओ
मे विभिन्नता प्रतीत होती है जो कि अज्ञान मूलक है, जिसका अज्ञान नष्ट
हो जाता है, उसे सारा जगत ब्रह्मात्मक ही प्रतीत होता है वह ब्रह्म के
अतिरिक्त कुछ और देखता ही नही, इसलिए उसकी भेद दृष्टि समाप्त हो
जाती है, ऐसा प्रत्याख्यान करके "जिसके द्वारा यह सारा जगत ज्ञात हो
जाता है उसे जानने के लिए और कौनसा उपाय शेष रह जाता है ?"
इत्यादि में दिखलाया गया कि- जीवात्मा, अपने अन्तर्यामी परमात्मा की
सहायता से विज्ञान संपन्न होकर सपूर्ण पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है,
'इसलिए उसे ज्ञान प्राप्त के लिए किन्ही अन्य उपायो की अपेक्षा नही
होती । "स एष नेति नेति' इत्यादि से बतलाया गया कि- सर्वेश्वर
निश्चित ही जड़चेतन सभी वस्तुओं से विलक्षण है, सारे पदार्थ उसके शरीर
है, वही आत्मारूप से सभी मे अनुस्यूत है, फिर भी वह अपने शरीर रूप
इस जड़चेतन जगत की दोष राशि से अस्पृष्ट रहता है "अरी मैत्रेयी !
उस विज्ञाता को अब अधिक और क्या जाना जा सकता है ? तुमने यह
तत्वोपदेश प्राप्त कर लिया, यहाँ तक ही अमृतत्व का व्याख्यान है"
अर्थात् समस्त पदार्थों से विलक्षण, समस्त जगत के एकमात्र कारण, संपूर्ण
रहस्य के ज्ञाता परब्रह्म पुरुषोत्तम को, उक्त प्रकार की उपासना के अति-
रिक्त और किन उपायों से जाना जा सकता है, इसलिए उपासना ही
मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र उपाय है, ब्रह्मभाव की प्राप्ति ही मोक्ष कहा
गया है ।
इत्यादि विवेचन से सिद्ध होता है कि- परब्रह्म ही इस संपूर्ण प्रसंग के
प्रतिपाद्य विषय हैं, वही एकमात्र जगत के कारण है, पुरुष अधिष्ठिता
प्रकृति जगत का कारण नहीं है।
७ प्रकृत्यधिकरणः-
प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ।१।४।२३।।
एवं निरीश्वर सांख्ये निरस्ते सति, सेश्वरसांख्यः प्रत्यव-
तिष्ठते । यद्यपि ईक्षणादि गुणयोगात् सर्वज्ञमीश्वरं जगत्कारण-
त्वेन वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति, तथापि वेदांतैरेव जगदुपादानतया
प्रधानमेव प्रतिपाद्यत् इति प्रतीयते । न हि वेदान्ताः सर्वज्ञस्य अप-
रिणामिनोऽधिष्ठातुरोश्वरस्यांधिष्ठेयेनाचेतनेन परिणामिना
प्रधानेन विना जगतः कारणत्वमवगमयंति । तथाहि अपरिणामिनं
प्रधानमेतं प्रकृतिं चैतदधिष्ठितां परिणामिनीमधीयते- "निष्कलं
निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरंजनम्" स वा एष महानज आत्माऽ-
जरोऽमरः “विकारजननीमज्ञामष्टरूपमजां ध्रुवाम्” ध्यायते अध्या-
सिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः, सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठिता
जगत् , गौरनाद्यंतवती सा जनित्री भूतभाविनी" इति । तथा
प्रकृतिमुपादानभूतामधिष्ठायैवेश्वरो विश्वं जगत्सृजतीति श्रूयते
“अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” मायां तु प्रकृतिंविद्यान्मायिनं
तुमहेश्वरम्” इति । स्मृतिरपि “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा-
चरम्” इति एवम् श्रुतेऽपि प्रधानोपादानत्वे ब्रह्मणो जगत्कार-
णत्व श्रुत्यन्यथानुपपत्त्यैव प्रधानस्वरूपं तस्येश्वराधिष्ठितस्य
जगदुपादानत्वं च सिद्ध्यति ।
इस प्रकार निरीश्वर सांख्य के परास्त हो जाने पर, सेश्वरसांख्य
सामने उपस्थित होता है । यद्यपि ईक्षण आदि गुणों के होने के सर्वज्ञ
ईश्वर को ही, जगत के कारण रूपसे सारे वेदांत प्रतिपादन करते हैं, तथापि
वे ही वेदांत, जगत की उपादान कारण प्रधान (प्रकृति) है, ऐसा प्रतिपादन
करते हुए भी प्रतीत होते हैं । वेदांत वाक्य , ईश्वराधिष्ठित परिणामी
अचेतन प्रकृति के अतिरिक्त , केवल अपरिणामी (निर्विकार) सर्वज्ञ ईश्वर
को ही जगत कारण रूप से प्रतिपादन करते हों, ऐसा नहीं है । जैसा कि-
ईश्वर को अपरिणामी तथा ईश्वराधिष्ठित प्रकृति को परिणामी बतलाने
वाले निम्नवाक्यों से प्रतीत होता है “ब्रह्म अखंड, निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष
और निरंजन है "यह महान् आत्मा अजर और अमर है" समस्त विकारों
की मूलकारण आठ प्रकार की अचेतन प्रकृति अजन्मा और नित्य है “वह
प्रकृति, परमात्मा से अधिष्ठित होने से ज्ञेय है, परमात्मा ही उसका
विस्तार करके उसे जगत् सृष्टि की प्रेरणा देते हैं, वह प्रकृति उन्ही से
अधिष्ठित होकर पुरुषार्थ (भोग और अपवर्ग) और जगत का सृजन करती
( ६१८ )
है, आदि अन्तरहित, भूतभव्यात्मक गौरूपा यह प्रकृति ही सबकी जननी
है।" इत्यादि। वह ईश्वर, उपादान कारणरूपा प्रकृति के अधिष्ठान
पूर्वक ही संपूर्ण जगत् का निर्माण करते हैं—" मायाधीश इस
प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि करते हैं "माया को प्रकृति तथा मायाधीश
को महेश्वर जानो" मेरी अध्यक्षता में प्रकृति, जडचेतन जगत् का प्रसव
करती है" इत्यादि श्रुति स्मृति वाक्यों से ज्ञात होता है। उक्त उदाहरणों
से एकमात्र ब्रह्म की ही जगत् कारणता सिद्ध नहीं होती, अपितु प्रधान
की उपादान कारणता का स्पष्ट उल्लेख न होते हुए भी प्रकृति के बिना
कार्य हो नहीं सकता इस उल्लेख से, ईश्वराधिष्ठित उस प्रकृति का
अस्तित्व और उपादान कारणत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है।
एवमेवहि लोके निमित्तोपादानयोर्यत्यंतभेदो दृश्यते। मृत्सुव-
र्णादेरचेतनस्य घटकटकाद्युपादानत्वं चेतनस्य कुलालसुवर्णकारादे-
र्निमित्तत्वं च नियतमुपलभ्यते कार्यनिष्पत्तिश्च नियमेनानेककारक-
सव्यपेक्षत्वनियमं च अतिक्रम्यैकमेव ब्रह्मोपादानं निमित्तं च प्रतिपा-
दयितुं न प्रभवंति वेदांतवाक्यानि अतोब्रह्मनिमित्तकारणमेव नोपा-
दानम्। उपादानं तु तदधिष्ठितंप्रधानमेव इति।
ऐसे ही व्यवहार जगत् मे भी उपादान कारण और निमित्त कारण
का अन्तर दृष्टिगत होता है। अचेतन मिट्टी और सुवर्ण, उपादान
कारण के रूप मे तथा चेतन कुंभकार और सुवर्णकार, निमित्त कारण के
रूप मे दीखते हैं। सभी कार्यों मे, अनेक कारणो की अपेक्षा नित्य
दृष्टिगत होती है निमित्त और उपादान कारणों के नियमित भेद तथा
कार्यों की अनेक कारण सापेक्षता का उल्लंघन करके, एकमात्र ब्रह्म को
ही, उपादान और निमित्त कारण के रूप मे, वेदांत वाक्य प्रतिपादन
नहीं कर सकते। इसलिए यही मानना चाहिए कि ब्रह्म निमित्त कारण
मात्र है, उपादान नहीं, उपादान कारण तो ब्रह्म से अधिष्ठित प्रकृति
ही है।
सिद्धान्तः— एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे- प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता
नुपरोधात्-इति प्रकृतिश्च उपादानं च। न निमित्त कारण मात्रं
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ब्रह्म, उपादानकारणं ब्रह्मैवेत्यर्थः । कुतः ? प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरो-
धात् । एवमेवहि प्रतिज्ञादृष्टान्तौ नोपरुध्येते । प्रतिज्ञा तावत् "स्त-
ब्धोऽस्युत तमादेशमप्रोक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतंमतमविज्ञातं
विज्ञातम्" इत्येक विज्ञानेन सर्वविज्ञानविषया । दृष्टान्तश्च- "यथा
सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात् "यथा सोम्यैकेन
लोहमणिना" यथा सौम्यैकेन नखनिकृन्तनेन" इति कारण-
विज्ञानात् कार्यविज्ञान विषयः । यदि निमित्तकारणमेव जगतो
ब्रह्म, तदा तद्विज्ञानान्न समस्तंजगद्विज्ञातं स्यात् । नहि
कुलालादिविज्ञानेन घटादिर्विज्ञायते । अतः प्रतिज्ञादृष्टान्त
योर्बाध एव । ब्रह्मण एवोपादानत्वे उपादानभूतमृत्पिण्डलोहमणि
नखनिकृं तनविज्ञानेनघटमणिकटकमुकुटायसीपरश्वथादितत्कार्यवि -
ज्ञानवन्निखिलजगदुपादानभूतेब्रह्मणिविज्ञाते तत्कार्यं निखिलं
जगद्विज्ञातं स्यात् । कारणमेवावस्थान्तरान्नकार्यम्, न
द्रव्यान्तरमिति कार्यकारणरूपेणावस्थितमृत्तिकादिनिदर्शनेन
प्रतिज्ञासमर्थनाद् ब्रह्म जगदुपादानं चेति निश्चीयते ।
उक्त मत का प्रत्याख्यान करते हुए सूत्रकार सिद्धान्त रूप से
"प्रकृतिश्च दृष्टान्तानुपरोधात्" सूत्र प्रस्तुत करते हैं। प्रकृतिश्च अर्थात्
वह उपादान भी है। वह निमित्त कारणमात्र नहीं है उपादान कारण
भी है। प्रतिज्ञा और दृष्टान्त दोनों, इसविषय में एकमत हैं। प्रतिज्ञा
जैसे-"हे सौम्य ! तुम स्तब्ध हो, क्या तुमने कभी किसी प्राज्ञ से उसे
जानने की इच्छा की है ? जिसे जानकर अश्रुत श्रुत, अचिन्त्य चिन्त्य,
अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है" इत्यादि में एक के ज्ञान से समस्तज्ञान
की प्रतिज्ञा की गई है। दृष्टांत जैसे-"हे सौम्य ! जैसे एक मिट्टी के डेले
से, संपूर्ण मिट्टी के पदार्थों का ज्ञान हो जाता है" तथा "एक लोहमणि
से" एक लोहनिकृन्तन (नहन्ना) से" इत्यादि में कारण के ज्ञान से कार्य
का ज्ञान होता है, ऐसे दृष्टांत दिए गए। यदि ब्रह्म, जगत का निमित्त
कारण मात्र है तो उसके ज्ञान से समस्त जगत का ज्ञान नहीं हो सकता।
जैसे कि कुम्हार आदि की जानकारी से घर की जानकारी नहीं हो
जाती। ऐसा मानने से प्रतिज्ञा और दृष्टांत मे बाधा उपस्थित होती
है। ब्रह्म को उपादान कारण मानने से ही, उसके कार्य रूप समस्त का
ज्ञान हो सकता है, जैसे कि- उपादान कारण रूप मिट्टी, सोना, लोहा
आदि की जानकारी से, उनसे निर्मित, घडा मटकी, कगन मुकुट, कुठार
आदि का ज्ञान हो जाता है। अवस्थान्तर की प्राप्ति ही तो कार्य है,
वस्तु का बदल जाना कभी कार्य नही कहलाता। ऐसे कारण कार्य भाव
मानने से, मिट्टी और उनके विकार घट आदि की तरह ब्रह्म और
उसका कार्यरूप जगत प्रतिज्ञानुसार निश्चित होता है, इससे यह भी
निश्चित है कि-ब्रह्म, उपादान कारण भी है।
यत्तुनिमित्तोपादानयोर्भेदः श्रुत्यैव प्रतीयत इति, तदसत् नि-
मित्तोपादानयोरैक्य प्रतीतेः "उत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं
भवति" इति। आदिश्यते प्रशिष्यतेऽनेनेत्यादेशः "एतस्य वा अक्षर-
स्य प्रशासने गार्गि" इत्यादि श्रुतेः। साधकतमत्वेनकर्त्ता विवक्षितः।
तमादेष्टारमप्राक्ष्यः, येनाश्रुतं श्रुतं भवति, येनादेष्ट्राऽधिष्ठात्रा श्रुते-
नाश्रुतमपि श्रुतंभवतीति, निमित्तोपादानयोरैक्यं प्रतीयते। "सदेव
सोम्येदमग्र आसीदेकमेव" इति प्राक्सृष्टेरेकत्वावधारणात् अद्वितीय-
पदेनाधिष्ठात्रन्तरनिवारणाच्च।
जो यह कहा कि- निमित्त और उपादान का भेद तो श्रुति से ही
प्रतीत होता है, यह कहना भी गलत है; "जिससे अश्रुत भी श्रुत हो
जाता है" इत्यादि वाक्य ही निमित्त और उपादान की एकता बतला
रहा है। जिसके द्वारा आदिष्ट अर्थात् उत्तमरूप से शासित हो, उसे
आदेश कहते है, इस आदेश की बात "इस अक्षर के प्रशासन मे सूर्य
और चन्द्र स्थिर है" इत्यादि वाक्य मे कही गई है। ब्रह्म ही क्रियासिद्धि
के प्रधान उपाय है, इसलिए वे ही कर्त्ता रूप से विवक्षित है। इस
आदेष्टा (शासक) के विषय में कहा गया कि "जिसको जान लेने से अश्रुत
भी श्रुत हो जाता है" अर्थात् जो आदेष्टा (प्रकृति का अधिष्ठाता) है,
उसके श्रुत हो जाने पर, अन्यान्य अश्रुत विषय भी श्रुत हो जाते हैं।
इस कथन से निमित्त और उपादान की एकता प्रदान होती है "हे सौम्य !
( ६२१ )
सृष्टि के पूर्व यह जगत सत् स्वरूप ही था” इस श्रुति में, एकत्वावधा-
रणता बतलाने वाली अद्वितीयता बतलाई गई है, जिससे किसी अन्य
की अधिष्ठातृता का निवारित हो जाता है ।
ननु एवं सति—“विकारजननीम् गौरनाद्यन्तवती” इत्यादिभिः
प्रकृतेराद्यन्त विरहेण नित्यत्वं जगदुपादानत्वं च श्रूयमाणं कथमुप-
पद्यते ?
तदुच्यते— तत्राप्यविभक्तनामरूपं कारणावस्थं ब्रह्मैव प्रकृति
शब्देनाभिधीयते । ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वंतराभावात् । तथाहि श्रुतयः
“सर्वं यो परादात् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद” यत्रत्वस्य सर्वमात्मै-
वाभूत तत् किं केन पश्येत् ? “इत्याद्याः । सर्वं खल्विदं ब्रह्म “ऐत-
दात्म्यमिदं सर्वम्” इति कार्यावस्थं कारणावस्थं च सर्वं जगत्
ब्रह्मात्मकमिति श्रवणाच्च ।
प्रश्न होता है कि-एकमात्र ब्रह्म को ही कारण मान लेंगे तो,“विकारों
की जननी” आदि अन्त रहित गौ “इत्यादि वाक्यों में जो प्रकृति की
आद्यन्तरहितनित्यता और जगत् उपदानता बतलाई गई है, उसका समा-
धान कैसे होगा ?
उसका उत्तर देते हैं कि- उन वाक्यों में भी अव्यक्त नामरूप वाले
कारणावस्थ ब्रह्म को ही प्रकृति शब्द से बतलाया गया है । वैसी ही बात
अन्य श्रुतियों में भी जैसे- “सब उसका विरोध करते हैं, जो इस जगत
को ब्रह्म से भिन्न मानते हैं” जब यह सब कुछ आत्मा ही है तो किससे
किसको जाना जाय ? “इत्यादि तथा”—यह सब कुछ ब्रह्म ही है “यह सब
ब्रह्मात्मक ही है” इत्यादि से कार्यावस्थ और कारणावस्थ समस्त जगत
को ब्रह्मात्मक बतलाया गया है ।
एतदुक्तं भवति—“यः पृथवीमंतरे संचरन्यस्य पृथिवी शरीरं यं
पृथिवी न वेद” इत्यारभ्य “योऽव्यक्तमंतरे संचरन् यस्याव्यक्तं शरीरं
यमव्यक्तं न वेद” योऽक्षरमन्तरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं
[email protected]
( ५२२ )
न वेद” यः पृथ्व्यांतिष्ठन् पृथिव्याअन्तरो यं पृथिवी न वेद, पृथिवी
शरीरं यः पृथिवीमंतरोयमयति” इत्यारभ्य– ‘य आत्मनि तिष्ठन्
आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो
यमयति त आत्माऽन्तर्याम्यमृत.” इति च सर्वचिदचिद्वस्तुशरीर-
तया सर्वदा सर्वात्मभूतं परंब्रह्म कदाचिद्विभक्तनामरूपं, कदा-
चिच्चाविभक्त नामरूपम्, यदा विभक्त नामरूपं तदा तदेव बहुत्वेन
कार्यत्वेन चोच्यते, यदा चाविभक्तनामरूपं तदैकद्वितीयं कारण-
मिति च । एवं सर्वदा चिदचिद् वस्तु शरोरस्य परस्य ब्रह्मणोऽ-
विभक्त नामरूपा या कारणावस्था सा “गौरनाद्यंतवती”
विकारजननीमज्ञाम् “अजामेकाम्” इत्यादिभिरभिधीयते इति ।
कथन यह है कि-“जो पृथ्वी में संचरण करता है, पृथ्वी ही जिसका
शरीर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती” इत्यादि से प्रारंभ करके “जो
अव्यक्त मे संचरण करता है, अव्यक्त ही जिसका शरीर है, अव्यक्त
जिसे नहीं जानता” “जो अक्षर में संचरण करता है, अक्षर ही जिसका
शरीर है, जिमे अक्षर नहीं जानता” यहाँ तक तथा-“जो पृथ्वी मे स्थिति
है, उस अन्तर्यामी को पृथिवी नही जानती, पृथिवी ही उसका शरीर है,
वह अन्तर्यामी ही पृथ्वी का सयमन करता है” इत्यादि से प्रारंभ करके
“जो आत्मा में स्थित है, उस अन्तर्यामी को आत्मा नही जानता, आत्मा
ही उसका शरीर है, वह अन्तर्यामी ही आत्मा का संयमन करता है वह
अन्तर्याभी ही अमृत है” यहाँ तक बतलाया गया कि-समस्त जड चेतन
शरीरवाला, सर्वदा, सर्वात्मा वह परब्रह्म कभी विभक्त नामरूप वाला
और कभी अविभक्त नाम रूपवाला होता है, जब वह विभक्त नाम रूप
वाला होता है, तब उसे अनेक कार्यों के रूप में वर्णन किया जाता है और
जब वह अविभक्त नाम रूपवाला रहता है, तो उसे “एक वही अद्वितीय
कारण है” ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार सदा जड चेतन शरीर उस
परब्रह्म की अविभक्त नामवाली कारणावस्था को “आदि अन्त रहित गौ”
विकारजननी “एकाअजा” इत्यादि नामों से बतलाया गया है ।