सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४६६ )
शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है कि—अतिवादी से भिन्न कोई दूसरी
वस्तु अवश्य है, ऐसा नहीं है कि-सत्यवादिता, अतिवादी का, एक अङ्ग
विशेष मात्र ही है। “वही यथार्थ अग्निहोत्री है जो कि सत्यवादी है”
अग्निहोत्र विधायक, प्राण प्रकरण के इस वाक्य से ज्ञात होता है कि--
सत्य वस्तु भिन्न ही है। सत्यवादिता, के अंगरूप से, अग्निहोत्र की
कल्पना, क्लिष्ट है। उक्त प्रकरण में, अतिवादी से भिन्नता बतलाने
वाली, सत्य शब्द से अभिधेय परब्रह्म की, सुस्पष्ट प्रतीति होती है।
सत्य शब्दश्च “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” इत्यादिषु परस्मिन्
ब्रह्मणि प्रयुक्तः, अतस्तन्निष्ठस्यातिवादिनः पूर्वस्मादाधिकत्वं
सम्भवतीति वाक्यस्वरस सिद्धमन्यत्वं न बाधितव्यम्।
सत्य शब्द “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इत्यादि में परब्रह्म के लिए ही
प्रयोग किया गया है, इसलिए सत्यनिष्ठ अतिवादी, पूर्वोक्त (प्राणविद्)
अतिवादी से श्रेष्ठ हो सकता है; वाक्यार्थ से ही स्पष्ट, जो दो अतिवादी
की प्रतीति हो रही है, उसमें बाधा देना ठीक नहीं है।
अतिवादित्वं हि वस्त्वंतरात् पुरुषार्थतयाऽतिक्रान्तस्वोपास्य वस्तु
वादित्वम्। नामाद्याशापर्यन्तोपास्यवस्त्वतिक्रान्तस्वोपास्य प्राणशब्द
निर्दिष्ट प्रत्यगात्म वादित्वात् प्राणविदो ऽतिवादित्वम्। तस्यापि
सातिशय पुरुषार्थत्वात् निरतिशय पुरुषार्थतयोपास्य परब्रह्मवादिन
एव साक्षादतिवादित्वम् “एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति”
इत्युक्तम्। सत्येनेतीत्थम्भूतलक्षणे तृतीया, सत्येनपरेणब्रह्मणोपास्येनो-
पलक्षितो योऽतिवदतीत्यर्थः। अतएवैवंशिष्यः प्रार्थयते “सोऽहं भगवः
सत्येनातिवदानि” इति। आचार्यश्च “सत्यंत्वेव विजिज्ञासितव्यम्”
इत्याह। “आत्मनः प्राणः” इति च प्राणशब्दनिर्दिष्टस्य आत्मन
उत्पत्तिरुच्यते। अतः “तरतिशोकमात्मवित्” इति प्रक्रान्त आत्मा
प्राण शब्द निर्दिष्टादन्य इति गम्यते।
[email protected]

( ४७० )

अन्यान्य वस्तुओं की अपेक्षा अपनी उपास्य वस्तु का समधिक
उत्कर्ष बतलाना ही अतिवादिता है। पहिले “नाम” से लेकर “दिक्”
तक अन्य जो समस्त पदार्थ, उपास्य बतलाए गए हैं, उनमें अन्यों से,
प्राण शब्दवाची जीवात्मा उत्कृष्ट उपास्य है, इसीलिए प्राणविद् अति-
वादी कहा गया है। प्राण विद् की अतिवादिता, धर्म आदि पुरुषार्थ से
श्रेष्ठ पुरुषार्थ है, परंतु निरतिशय पुरुषार्थ रूप से जो परब्रह्म की
उपासना करते हैं, वह उस से श्रेष्ठ हैं; यही अतिवादिता है। यही बात
“जो सत्यवादी हैं वह अतिवादी हैं” इत्यादि वाक्य से निश्चित होती
है। उक्त वाक्यस्थ “सत्येन” पद में जो तृतीया विभक्ति है, वो “इत्थंभूत”
अर्थ ज्ञापन करती है, जिसका तात्पर्य है कि—सत्य रूप से उपासनीय,
परब्रह्मोपलक्षित, अतिवादी होता है। शिष्य ऐसी ही प्रार्थना करता है—
“हे भगवन ! मैं भी वह सत्योपलक्षित अतिवादी हो सकता हूँ ?” उत्तर
में आचार्य कहते हैं—“सत्य ही विशेष रूप से जिज्ञास्य है”। “आत्मनः
प्राणः” इत्यादि वाक्य में भी, प्राण शब्द निर्दिष्ट आत्मा की उत्पत्ति
बतलाई गई है इससे निश्चित होता है कि—आत्मविद् पुरुष शोक से पार
हो जाता है” इत्यादि वाक्य का प्रस्तावित आत्मा, प्राण से, पृथक् है।
यदुक्तम्— “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इति प्रश्नस्य “अदो
वाव प्राणाद्भूयः” इति प्रतिवचनस्य चादर्शनात्प्रक्रांत आत्मोपदेशः
प्राणोपदेश पर्यवसानो गम्यत इति, तदयुक्तम्; नहि प्रश्न प्रतिवच-
नाभ्यामेवार्थतत्त्वं गम्यते, प्रमाणान्तरेणापि तत्संभवात् । उक्तं च
प्रमाणान्तरम् । “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इत्यपृच्छतोऽयमभिप्रायः;
नामादिष्वाशापर्यन्तेष्वचेतनेषु पुरुषार्थभूयस्तया, पूर्वपूर्वमतिक्रान्तेषु
अप्युत्तरोत्तरेषूपदिष्टेषु तत्तद्वेदिनाचार्येणातिवादित्वं नोक्तम् ।
प्राणशब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्मयाथात्म्यवेदिनस्तु पुरुषार्थभूयस्त्वातिशयं
मन्वानेन “स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी
भवति” इति अतिक्रान्तवस्तुवादित्वमुक्तम् । अतोऽत्रैवात्मोपदेशः
समाप्त इति मत्वा शिष्योभूयो न पप्रच्छ आचार्यस्त्वेतदपि साति-
शयं मत्वा, निरतिश पुरुषार्थभूतं सत्य शब्दाभिधेयं परं ब्रह्म “एष तु

वा अतिवदति यस्सत्येनातिवदति” इति स्वयमेवोपचिक्षेप । शिष्योऽपि
परंपुरुषार्थरूपे परस्मिन्ब्रह्मण्युपक्षेप्ते तत्स्वरूपतदुपासन याथात्म्य-
बुभुत्सया “ सोऽहम्भगवः सत्येनातिवदानि” इति प्राथंयामास । ततो
ब्रह्मसाक्षात्कारनिमित्तातिवादित्वसिद्धये, ब्रह्मसाक्षात्कारोपायभूतं
ब्रह्मोपासनं ‘सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम्' इत्युपदिश्य तदुपायभूतं
ब्रह्ममननम् “मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्य, श्रवण प्रतिष्ठा-
र्थत्वान्मननस्य मननोपदेशेन श्रवणंमर्थसिद्धं मत्वा श्रवणोपायभूतां
ब्रह्मणि श्रद्धां “श्रद्धात्वेव विजिज्ञासितव्या” इत्युपदिश्य, तदुपायभूतां
च तन्निष्ठाम् “निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्या इत्युपदिश्य, तदुपाय भूतां
च तदुद्योगप्रयत्नरूपां कृतिमपि “कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्या”
इत्युपदिश्य, श्रवणाद्युपक्रमरूपकृति सिद्धये प्राप्यभूतस्य, सत्यशब्दा-
भिहितस्य, ब्रह्मणः सुखरूपता ज्ञातव्येति “सुखं त्वेवविजिज्ञासितव्यम्”
इत्युपदिश्य, निरतिशयविपुलमेव सुखं परम् पुरुषार्थरूपं भवतीति,
तस्यैव ब्रह्मणः सुखरूपस्य निरतिशय विपुलता ज्ञातव्येति “भूमात्वेव
विजिज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्य, निरतिशय विपुल सुखरूपस्य ब्रह्मणो
लक्षणमिदमुच्यते “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति
स भूमा” इति । अयमर्थः, अनवधिकातिशय सुखरूपे ब्रह्मएयनुभूय-
माने ततोऽन्यत्किमपि न पश्यत्यनुभविता, ब्रह्मस्वरूपतद्विभूत्यन्तर-
गतत्वाच्च कृत्स्नस्य, वस्तु जातस्य अत ऐश्वर्यपरपर्याय विभूति
गुणविशिष्टं निरतिशयसुखरूपं ब्रह्मानुभवन् तद्व्यतिरिक्तस्य वस्तुनोऽ-
भावादेव किमप्यन्यन्न पश्यति अनुभाव्यस्य सर्वस्य सुखरूपत्वादेव दुःखं
च न पश्यति, तदेव हि सुखम्, तदनुभूयमानं पुरुषानुकूलं भवति ।
जो यह कहते हो कि—“भगवन् ! प्राण की अपेक्षा भी कुछ वृहद्
है क्या ? “इस प्रश्न के” यही प्राण से वृहद है “इस उत्तर से अदृष्ट
प्रस्तावित आत्मा का ही उत्तर दिया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि-

( ४७२ )
प्राणोपदेश में ही तत्त्व का पर्यवसान है। तुम्हारा यह कथन भी ठीक
नहीं है। केवल इन प्रश्नोत्तरों से ही तथ्य का निर्णय नहीं होता, अन्य
प्रमाणों से भी निर्णय किया जा सकता है। पहिले हम अन्य प्रमाण दे
भी चुके हैं। “भगवन् ! प्राण की अपेक्षा कुछ अधिक है क्या ?” इस
प्रश्न का तात्पर्य है कि-नाम से दिक् तक जिन अचेतन तत्त्वों का उपदेश
दिया गया है, उनमें एक के बाद एक श्रेष्ठ बतलाए गए हैं, उन सबके
ज्ञाताओं को आचार्य ने अतिवादी नहीं कहा। प्राणशब्द निर्दिष्ट
जीवात्मा का यथार्थ वेत्ता, उसको ही पुरुषार्थ मानने वाला “वह प्राण-
विद् व्यक्ति, ऐसे दर्शन, ऐसे मनन और ऐसे ज्ञान से अतिवादी होता है”
इत्यादि में पहिले मन आदि तत्त्वों को अतिक्रमण करने वाले को ही
अतिवादी कहा गया है। यहीं पर आत्मोपदेश की समाप्ति समझ कर
शिष्य ने पुनः प्रश्न नहीं किया। किन्तु आचार्य ने इसे भी न्यून बताते हुए
अधिक पुरुषार्थ भूत सत्य शब्दाभिधेय परब्रह्म को “को सत्य वादी है वही
यथार्थ अतिवादी है” इत्यादि में स्वयं ही बतलाया ऐसा बतलाने पर शिष्य
ने, परंपुरुषार्थ रूप परब्रह्म के स्वरूप और उनकी उपासना के यथार्थ रूप
को जानने के लिए, पुनः “भगवन् ! मैं सत्यवादी होने की इच्छा करता
हूँ” ऐसी अभिलाषा की। आचार्य ने, ब्रह्म साक्षात्कार की मूल कारण
अतिवादिता की सिद्धि के लिए, ब्रह्म साक्षात्कार की उपाय उपासना को
“सत्य ही ज्ञेय है” इत्यादि में बतलाकर, उसके उपाय रूप ब्रह्म मनन
को “मति ही विशेष रूप से ज्ञातव्य है” इस प्रकार बतला कर यह प्रस्तुत
किया कि-श्रुत पदार्थ की दृढ़ता के लिए मनन आवश्यक है मनन से ही
श्रवणार्थ की सिद्धि होती है। इस श्रवण की उपाय रूप ब्रह्म श्रद्धा को
श्रद्धा जिज्ञास्य है” ऐसा बतलाकर, श्रद्धा की उपाय रूप ब्रह्म निष्ठा को
“निष्ठा ही विशेष रूप से ज्ञातव्य है” ऐसा बतला कर, उसकी उपायभूत
उद्योग प्रयत्न रूपा कृति को “कृति ज्ञातव्य है” ऐसा बतला कर, श्रवण
आदि में प्रवृत्ति हो इस लिए, सत्य शब्द से अभिधेय प्राप्तव्य ब्रह्म की
सुखरूपता को “सुख ज्ञातव्य है” इत्यादि में ज्ञातव्य बतलाया। निस्सीम
विपुल सुख ही परम पुरुषार्थ है, उस ब्रह्म की निरतिशय विपुल सुख-
रूपता को “भूमा जिज्ञास्य है” ऐसा बतलाकर उस विपुल सुखरूप ब्रह्म
के लक्षण को बतलाते हुए कहते हैं कि-मुमुक्षु जिसके अतिरिक्त कुछ
नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं जानता, वही भूमा है।” इसका
[email protected]

( ४७३ )
तात्पर्य हुआ कि- निस्सीम निरतिशय रूप में ब्रह्मानुभूति हो जाने पर,
अनुभव करने वाला उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखता, क्यों कि-
समस्त वस्तुए, ब्रह्म और उनकी विभूति के ही अन्तर्गत हैं । इसलिए वह
एकमात्र, ऐश्वर्य स्वरूप विभूति विशिष्ट निरतिशय सुखस्वरूप ब्रह्म की
ही अनुभूति करता है उसे अनुभव गोचर सारे ही पदार्थ सुख रूप ज्ञात
होते हैं, वह कहीं भी दुःख नहीं देखता, अनुभूयमान सुख ही उसे प्रिय
लगता है ।
ननु चेदमेव जगद्ब्रह्मणोऽन्यतयाऽनुभूयमानं दुःखरूपं परिमित
सुखरूपं च भवत्कथमिव ब्रह्मविभूतित्वेन तदात्मकतयाऽनुभूयमानं
सुखरूपमेव भवेत् ? उच्यते-कर्मवश्यानां क्षेत्रज्ञानां ब्रह्मणोऽन्यत्वेना-
नुभूयमानं कृत्स्नं जगत् तत्तत्कर्मानुरूपं दुःखं च परमित सुखं च
भवति । अतोब्रह्मणोऽन्यतया परिमित सुखत्वेन दुःखत्वेन च जगद-
नुभवस्य कर्मनिमित्तत्वात् कर्मरूपाविद्याविमुक्तस्य तदेव जगद्विभूति-
गुणविशिष्ट ब्रह्मानुभवान्तर्गतं सुखमेव भवति । यथा पित्तोपहतेन
पीयमानं पयः पित्ततारतम्येनाल्पसुखं विपरीतं च भवति तदेवपयः
पित्तानुपहतस्य सुखायैव भवति । यथैव राजपुत्रस्य पितुर्लीलोपक-
रणमतथात्वेनानुसंधीयमानं प्रियत्वमनुपगतं तथात्वानुसंधाने प्रियतमं
भवति । तथा निरतिशयानंद स्वरूपस्य ब्रह्मणोनवधिकातिशयासंख्ये-
यकल्याणगुणाकरस्य लीलोपकरणं तदात्मकं चानुसंधीयमानं
जगन्निरतिशय प्रीतये भवत्येव, अतो जगदैश्वर्यविशिष्टमनवधिका-
तिशय सुखरूपं ब्रह्मानुभवंस्ततोऽन्यत् किमपि न पश्यति, दुःखं च
न पश्यति ।
(प्रश्न)जब यह जगत् परिमित सुखवाला, दुःखरूप और ब्रह्म से
भिन्न बतलाया गया है तो उसे सुखरूप ब्रह्मात्मक, कैसे अनुभव किया जा
सकता है ?
(उत्तर) कर्माधीन जीवों के लिए ही, दृशमान सारा जगत्, ब्रह्म से
भिन्न है तथा वे ही निजकर्मों के अनुसार, जगत् को दुःखरूप और परिमित

४. तृतीयाध्याय व चतुर्थाध्याय: विद्या, उपासना, प्रपत्ति, कैवल्य व मुक्ति फल उपसंहार

( ४७४ )

सुखवाला अनुभव करते हैं। ब्रह्म से भिन्न, दुःखरूप और परिमित सुखरूप
जगत् की अनुभूति, कर्म निमित्तक ही है; जिसकी कर्मरूपा अविद्या छूट
गई है, उसे, सारा जगत्, विभूतिगुणविशिष्ट, ब्रह्मानुभवरूप सुखमय
प्रतीत होता है। जैसे कि-पित्तविकार ग्रस्त जीव को दूध पीना, रोग के
अनुसार कम सुखकर अथवा दुखकर ही लगता है, वही दूध पित्तविकार
रहित व्यक्ति को अति सुखकर प्रतीत होता है। जैसे कि-राजपुत्र को
बाल्यावस्था मे पिता के वैभव विलास का यथार्थ ज्ञान नही होता, पर
जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है उसे वैभव सुख की उत्तरोत्तर अनुभूति
होती जाती है; वैसे ही जब जीव को, निस्सीम आनन्दस्वरूप ब्रह्म की
असंख्येय अतिशय अगणित कल्याणमय गुणों वाली लीला के उपकरण
स्वरूप जगत की, ब्रह्मात्मकता का आभास होने लगता है, तो उसे, जगत्
मे ही, निस्सीम आनंद की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार वह,
जगत् में, ऐश्वर्यविशिष्ट निस्सीम अतिशय सुखरूप ब्रह्म की अनुभूति मे
निमग्न होकर, सुखरूपब्रह्म के अतिरिक्त, कुछ दूसरा नही देखता, और न
दुःख ही देखता है।
एतदेवोपपादयति वाक्यशेषः "स वा एष एवं पश्यन् एवं
मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानंद. स
स्वराड्भवति, तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति, अथ येऽन्य-
थाऽतो विदुरन्यराजानस्तेक्षय्यलोका भवंति तेषां सर्वेषु लोकेष्व
प्रकामचारो भवति" इति । स्वराट्-अकर्मवश्यः अन्यराजानः-
कर्मवश्याः । तथा--"न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्,
सर्वं हि पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वशः" इति च ।
निरतिशय सुखस्वरूपत्वं च ब्रह्मणः "आनन्दमयोऽभ्यासात्"
इत्यत्र प्रपंचितम् । अतः प्राणशब्दनिर्दिष्टात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तर-
भूतस्य सत्यशब्दाभिधेयस्य ब्रह्मणो भूमेत्युपदेशात् भूमा परं ब्रह्म ।
उक्त तथ्य की ही पुष्टि प्रकरण का अंतिम वाक्य इस प्रकार करता
है-"वह (उपासक) इस पुरुष का इस रूप से दर्शन करके, इस रूप से

( ४७५ )
मनन करके, इस प्रकार से जानकर, आत्मविद्-आत्मक्रीड-आत्ममिथुन
आत्मानंद एवं स्वच्छन्द हो जाता है, उसकी सभी लोकों में स्वेच्छगति
हो जाती है। इसके विपरीत जो जगत् को देखता है वह परतंत्र-लोकच्युत
और लोकों में बंधकर रह जाता है।" वाक्यस्थ स्वराड् का तात्पर्य है,
कर्मबंधन रहित स्वच्छन्द तथा अन्यराजानः का तात्पर्य है, कर्मों के
वशीभूत, कर्मानुसार फल भोगने के लिए बाध्य। जैसा कि-"यथोक्त
तत्त्वदर्शी मृत्यु को नहीं देखता, रोग तथा दुःखों का भी भोग नहीं करता,
वह सर्वदर्शी, सभी सुखों को प्राप्त करने वाला हो जाता है।" इत्यादि
से भी ज्ञात होता है।
ब्रह्म की निरतिशय सुखरूपता की व्याख्या "आनंदमयोभ्यासात्"
सूत्र में की गई है। इससे स्पष्ट है कि-प्राण शब्द वाची जीवात्मा से भिन्न
सत्य शब्दाभिधेय परमात्मा को ही भूमा शब्द से बतलाया गया है।
धर्मोपपत्तेश्च १।३।८॥
अस्य भूम्नो ये धर्माश्राम्नायंते, तेऽपि परस्मिन्नेवोपपद्यंते ।
"एत मृतम्" इति स्वाभाविक अमृतत्वम् "स्वेमहिम्नि" इत्यन्या-
धारत्वं "स एवाधस्ताद्" "इत्यादि" स एवेदं सर्वम्" इति सर्वा-
त्मकत्वम् "आत्मतःप्राणः" इत्यादि प्राण प्रभृति सर्वस्योत्पादकत्व-
मित्यादयोहि धर्माः परमात्मन एव ।
भूमा संबंधी जो विशेषतायें श्रुतियों में बतलाई गई हैं, वह पर-
मात्मा में ही हो सकती हैं। "एतदमृतम्" से स्वाभाविक अमरता,
"स्वे महिम्नि" से अनन्यधारकता, "स एवाधस्तात्" इत्यादि तथा "स
एवेदं सर्वम्" से सर्वात्मकता, "आत्मतः प्राणः" इत्यादि से प्राण आदि
सभी की उत्पादकता; इत्यादि जो विशेषतायें बतलाई गई हैं वह पर-
मात्मा में ही संभव हो सकती हैं।
यत्तु "अहमेवाधस्तात्" इत्यादिना सर्वात्मकत्वमुपदिष्टं, तद्-
भूमविशिष्टस्य ब्रह्मणोऽहंग्रहोपासनपमुद्दिश्यते "अथातोऽहंकारा-
देशः" इत्यहग्रहोपदेशोपक्रमात् । अहमर्थस्य प्रत्यगात्मनोऽपि ह्यात्मा
[email protected]

( ४७६ )
परमात्मेत्यन्तर्यामिब्राह्मणादिषूक्तम् । अतः प्रत्यगर्थस्य परमात्मपर्यव-
सानाद् अहंशब्दोऽपि परमात्मपर्यव सायीति प्रत्यगात्मशरीरकत्वेन
परमात्मानुसंधानार्थोऽयं अहंग्रहोपदेशः परमात्मनः सर्वशरीरतया
सर्वात्मत्वात् प्रत्यगानोऽप्यात्मा परमात्मा । तदेव “अथात आत्मो-
पदेशः” इत्यादिना” आत्मैवेदंसर्वम्” इत्यन्तेनोच्यते ।
“अहमेवाधस्तात्” इत्यादि मे जो सर्वात्मकता बतलाई गई है—
वह भूमाविशिष्ट ब्रह्म की अन्तर्यामी रूप अहं की उपासना की, द्योतिका
है । “अथातोऽहंकारादेशः” इत्यादि श्रुति मे, उक्त अहं क्या है ? इत्यादि
उपदेश का उपक्रम किया गया है । अन्तर्यामी (बृहदारण्यकोपनिषद के
प्रथम) ब्राह्मण मे, परमात्मा को, जीवान्तर्यामी कहा गया है, इसलिए,
जीवात्मा का पर्यवसान, परमात्मा मे होने से, अहं शब्द भी परमात्मा मे
ही, पर्यवसित होता है । जीवात्मा परमात्मा का शरीर है, इसलिए
शरीरी परमात्मा के अनुसंधान के लिए, अहं शब्द का प्रयोग किया गया
है । सारा जगत् परमात्मा का ही शरीर है, परमात्मा ही सबके आत्मा
हैं इस प्रकार जीवात्मा के आत्मा भी, परमात्मा ही हैं, ऐसा—“अथात
आत्मोपदेशः” से लेकर “आत्मैवेदं सर्वम्” तक बतलाया गया है ।
एतदेवोपपादयितुं प्रत्यगात्मनोऽप्यात्मभूतात् परमात्मनः सर्व-
स्योत्पत्तिरुच्यते “तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत् एवं मन्वानस्यैवं
विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आकाशः” इत्यादिना । उपासक-
स्यान्तर्यामितया अवास्थितात् परमात्मनः सर्वस्योत्पत्तिरित्यर्थः ।
अतः परमात्मनः प्रत्यगात्म शरीरत्वज्ञानप्रतिष्ठार्थमहंग्रहोपासनं
कर्त्तव्यम् । तस्माद् भूमविशिष्टः परमात्मेति सिद्धम् ।
उक्त तत्त्व के समर्थन के प्रसंग में-जीवात्मा के भी, आत्मरूप
परमात्मा से, समस्त की उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है-“इस प्रकार
दर्शन-श्रवण-मनन और विज्ञान संपन्न आत्मा से प्राण एवं आकाश हुए”
इत्यादि । अर्थात् उपासक के अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा से,
[email protected]

( ४७७ )
समस्त की उत्पत्ति होती है। जीवात्मा, परमात्मा का शरीर है, इस ज्ञान
को दृढ़ करने के लिए अहं ज्ञान पूर्वक उपासना करना आवश्यक है।
इससे सिद्ध होता है कि-भूमगुण विशिष्ट परमात्मा ही है।
३ अक्षराधिकरण
अक्षरमम्बरान्त धृतेः ।१।३।१०॥
वाजसनेमिनो गार्गीप्रश्ने समामनंति “सहोवाचैतद्वैतदक्षरं
गार्गि ब्राह्मणा अभिवदति अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेह-
मच्छायम्” इत्यादि तत्र संशयः, किमेतदक्षरं प्रधानम्-जीवो वा -
परमात्मा-इति, किं युक्तम् ? प्रधानमिति कुतः ? “अक्षरात्^परतः परः” इत्यादिष्वक्षर शब्दस्य प्रधाने प्रयोग दर्शनात् अस्थूलत्वा^देः
च तत्र समन्वयात् । “ययातदक्षरमधिगम्यते” इत्यादिषु परस्मिन्न-
प्यक्षरशब्दो दृश्यत इति चेत्-न, प्रमाणान्तर प्रसिद्ध श्रुति प्रसिद्धयोः
प्रमाणान्तर प्रसिद्धस्य प्रथम प्रतीतेः, प्रतीत परिग्रहे विरोधा
भावात् ।
वाजसनेय के गार्गी के प्रश्न के प्रसंग में-“उन्होंने कहा-हे गार्गि !
ब्राह्मण इस अक्षर को सूक्ष्म, स्थूल, दीर्घ, ह्रस्व, अलोहित, स्नेह और
छाया रहित बतलाते हैं ।” इत्यादि जो कहा गया उस पर संशय होता है
कि-उक्त गुणों वाला अक्षर कौन है ? प्रधान, जीव, या परमात्मा ? कह
सकते हैं कि-प्रधान है, क्योंकि-“अक्षरात् परतः परः” इत्यादि स्थलों में
अक्षर शब्द का प्रधान के अर्थ में प्रयोग देखा जाता है तथा स्थूल सूक्ष्म
आदि विषम गुणों का समन्वय भी उसी में हो सकता है ।” ययातदक्षर-
मधिगम्यते” इत्यादि में, परमात्मा के लिए भी, अक्षर शब्द का प्रयोग
देखा जाता है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि-प्रमाणान्तर प्रसिद्ध और
श्रुति प्रसिद्ध में प्रमाणान्तर प्रसिद्ध की, प्रथम प्रतीति होती है; प्रथम
प्रतीत अर्थ के ग्रहण में किसी प्रकार के विरोध की संभावना
नहीं रहती ।
“यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्याः” इत्यारभ्य सर्वस्य
कालत्रितय वर्तिनः कारणभूताकाशाधारत्वे प्रतिपादिते “कस्मिन्नु
[email protected]

( ४७८. )
खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च" इत्याकाशस्यापि कारणं तदाधारभूतं
किमिति पृष्टे प्रत्युच्यमानमक्षरं सर्वविकारकारणतया तदाधारभूतं
प्रमाणान्तर प्रसिद्धं प्रधानामिति प्रतीयते अतः अक्षरं प्रधानम् ।
तथा “गार्गि ! जो छायालोक से ऊपर और पृथिवी से भी नीचे
है" इत्यादि से लेकर कालत्रयवर्त्ती समस्त पदार्थों के आश्रयरूप कारण
आकाश के प्रतिपादन के बाद "आकाश किसमें ओत प्रोत है ?" ऐसे
६आकाश के भी आधारभूत कारण के विषय में प्रश्न किये जाने पर समस्त
है गतिक पदार्थों का आधारभूत कारण, अक्षर ही बतलाया गया है।
उपदेश-प्रमाणान्तर प्रसिद्ध प्रधान ही प्रतीत होता है, इसलिए अक्षर,
प्रधान ही है।
सिद्धान्तः-इति प्राप्ते उच्यते-अक्षरमम्बरान्तधृतेः-अक्षरं-
परंब्रह्म कुतः ? अम्बरान्त धृतेः, अम्बरस्य-आकाशस्य, अन्तः-
पारभूतम्, अव्याकृतमंबरान्तः, तस्य धृतेः तदाधारतयाऽस्याक्षर-
स्योपदेशादिति यावत् । अयमर्थः “कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च
प्रोतश्च" इत्यत्राकाश शब्दानिर्दिष्टं न वायुमदम्बरम्, अपितु तत्पार-
भूतमव्याकृतम्, अतस्तस्याव्याकृतस्याप्याधारत्वेनोच्यमानमक्षरं
नाव्याकृतं भवितुमर्हति इति ।
उक्त संशय पर सूत्रकार “अक्षरमम्बरान्त धृतेः” सूत्र सिद्धान्तरूप
से प्रस्तुत करते हैं। अर्थात् अक्षर परब्रह्म है क्योंकि-अम्बर अर्थात्
आकाश के अन्त में स्थित अव्याकृत रूप को, अक्षर के आश्रित बतलाया
गया है। "आकाश किसमें ओत प्रोत है ?" इत्यादि में, जिस आकाश
का उल्लेख किया गया है, वह वायुपूरित आकाश नहीं है, अपितु उससे
भी पार जो अव्याकृत आकाश है, उसी का उल्लेख है । उसी अव्याकृत
आकाश के आधार के रूप में, अक्षर बतलाया गया है। ऐसे अव्याकृत
आकाश का आधार विकृत प्रधान हो, ऐसा संभव नहीं है ।
नन्वाकाश शब्दानिर्दिष्टो न वायुमानिति कथमवगम्यते ?
उच्यते-“यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदंतराद्यावापृथिवी,
[email protected]

( ४७९ )
इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश एव तदोतं च
प्रोतं च'' इत्युक्ते त्रैकाल्यवर्त्तिनो विकारजातस्याधारतया निर्दिष्ट
आकाशो न वायुमदाकाशो भवितुमर्हति, तस्यापि विकारान्तर्गत-
त्वात् । अतोऽत्राकाशशब्दनिर्दिष्टं भूतसूक्ष्ममिति प्रतीयते । ततस्त-
स्यापि भूतसूक्ष्मस्याधारभूतं किमिति पृच्छ्यते “कस्मिन्नुखल्वाकाश-
ओतश्च प्रोतश्च” इति । अतस्तदाधारतया निर्दिश्यमानमक्षरं न
प्रधानं भवितुमर्हति ।
यदि कहो कि—उक्त प्रकरण में आकाश शब्द से अभिहित, परम्
पूरित भूताकाश नहीं है, यह कैसे जाना ? तो सुनो—'गार्गि ! जो
द्युलोक से ऊपर तथा पृथिवी से नीचे है तथा द्युलोक और पृथिवी जिसके
अभ्यन्तर में हैं, जिसे भूत, वर्त्तमान् और भविष्य कहा जाता है, वह
आकाश ही ओत प्रोत है” इत्यादि में कहा गया, त्रैलोक्यवर्त्ती, वैकारिक
पदार्थों का आधार. आकाश, वायुमान आकाश नहीं हो सकता, क्योंकि
वायुमान आकाश तो, विकृत है । इसलिए यहाँ, आकाश शब्द से निर्दिष्ट,
भूतसूक्ष्म ही प्रतीत होता है । “आकाश किससे ओत प्रोत है ?” यह
प्रश्न भूतसूक्ष्म आकाश के लिए ही पूछा गया है । इन सबसे ज्ञात होता
है कि-आधाररूप से निर्दिष्ट अक्षर तत्त्व, विकृत प्रधान नहीं हो
सकता ।
यत्तु श्रुतिप्रसिद्धात् प्रमाणान्तर प्रसिद्धं प्रथमं प्रतीयेत इति
तन्न, अक्षर शब्दस्यावयवशक्त्या स्वार्थ प्रतिपादने प्रमाणान्तरान-
पेक्षणात् संबंधग्रहणदशायामर्थस्वरूपं येन प्रमाणेनावगम्यते, न
तत्प्रतिपादनदशायामपेक्षणीयम् ।
जो यह कहा कि-श्रुति प्रसिद्ध से प्रमाणान्तर प्रसिद्ध अर्थ की
प्रतीति प्रथम होती है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि-अक्षर शब्द से सीधा
सीधा जो अर्थ प्रतीत होता है, उसके प्रतिपादन के लिए, अन्य प्रमाणों
की आवश्यकता ही नहीं है; शब्द और अर्थ के संबंध, में अर्थ के स्वरूप

बतलाने में जिन प्रमाणों की अपेक्षा होती है, वस्तु प्रतिपादन की स्थिति
में उन प्रमाणों की अपेक्षा नहीं होती ।
एवं तर्ह्यक्षर शब्द निर्दिष्टो जीवोऽस्तु, तस्यभूतसूक्ष्मपर्यन्त-
स्य कृत्स्नस्याचिद्वस्तुन आधारत्वोपपत्तेः, अस्थूलत्वादुच्यमान-
विशेषणोपपत्तेश्च “अव्यक्तमक्षरेलीयते”—“यस्याव्यक्तं शरीरम्—
यस्याक्षरं शरीरम्” “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते”
इत्यादिषु—प्रत्यगात्मन्यप्यक्षर शब्द प्रयोगदर्शनादित्यत्रोत्तरम्—
यदि प्रधान को, अक्षर नहीं मानते तो, जीव तो अक्षर शब्द से
अभिधेय है ही, उसे ही भूतसूक्ष्म पर्यन्त समस्त जड़ वस्तुओं का आधार
तथा अस्थूलता आदि विशेषताओं वाला कहा गया है जैसा कि- “अव्यक्त
जिसका शरीर है, अक्षर जिसका शरीर है;” ‘समस्त भूत क्षर हैं, अक्षर
कूटस्थ है” इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा के लिए किए गए, अक्षर शब्द
के प्रयोग से ज्ञात होता है । इस मत का ही उत्तर देते हैं—
सा च प्रशासनात् । १।३।१०॥
सा चाम्बरान्तधृतिरस्याक्षरस्य प्रशासनादेव भवतीत्युपदिश्यते
“एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः,
एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः,
एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्य-
र्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्ति” इत्यादिना ।
प्रशासनंप्रकृष्टं शासनं, न चेदृशं स्वशासनाधीनसर्ववस्तु विधरणं
बद्धमुक्तोभयावस्थस्यापि प्रत्यगात्मनः संभवति । अतः पुरुषोत्तम
एव प्रशाशित्रक्षरम् ।
वह अम्ब पर्यन्त समस्त वस्तुओं का आधार अक्षर के प्रशासन से
ही होता है, ऐसा उपदेश दिया गया है । जैसा कि—“हे गार्गि ! इस अक्षर
के प्रशासन में ही सूर्य और चन्द्र स्थित हैं, गार्गि ! इसी अक्षर के

प्रशासन में द्यु और भूलोक स्थित हैं, तथा गार्गि ! इसी अक्षर के
प्रशासन में, निमेष-मुहूर्त्त-अहोरात्र-अर्द्धमास-मास-ऋतु-संवत्सर आदि
भी स्थित हैं ' इत्यादि से ज्ञात होता है। प्रशासन का अर्थ है प्रकृष्ट
रूप से शासन करना अर्थात् नियमित रखना । बद्ध या मुक्त जीव, इस
प्रकार के प्रशासन से, समस्त पदार्थों को नियमित कर सकें, ऐसा संभव
नहीं है । इससे निश्चित होता है कि प्रशासक रूप से पुरुषोत्तम ही
अक्षर है ।
अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥१।३।१९॥
अन्य भावः अन्यत्वं प्रधानादिभावः । अस्याक्षरस्य परम्
पुरुषादन्यत्वं, वाक्यशेषे व्यावर्त्यते "तद् वा एतदक्षरं गार्गि, अदृष्टं
द्रष्टृ श्रुतं श्रोत्रमतम् मंतृविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदस्तोऽस्ति द्रष्टृ,
नान्यदस्तोऽस्ति श्रोतॄ, नान्यदस्तोऽस्ति मंतृ, नान्यदस्तोऽस्ति विज्ञातृ,
एतस्मिन्नुखल्वक्षरे गार्गि, आकाश ओ

( ४८२ )
एवं वाऽन्यभावव्यावृत्तिः, अन्यस्य सद्भावव्यावृत्तिरन्यभाव-
व्यावृत्तिः यथैतदक्षरमन्यैरदृष्टं सदन्येषां द्रष्टृ च सत् स्वव्यति-
रिक्तस्य समस्तस्याधारभूतम्, एवमनेनादृष्टमेतस्य द्रष्टृ च सदेत-
स्याधारभूतमन्यन्नास्तीति वदन् "नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट" इत्यादि-
वाक्यशेषो अन्यस्य सद्भावं व्यावर्त्तयन्नस्याक्षरस्य, प्रधानभावं,
प्रत्यगात्मभावं च प्रतिषेधति ।
अन्य की सद्भावना की व्यावृत्ति भी, इस सूत्र का तात्पर्य हो
सकता है। "इसके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नहीं है" इस वाक्यांश में,
अक्षर को अन्य से अदृष्ट तथा सभी का द्रष्टा बतलाकर, सभी का आश्रय
सिद्ध किया गया है, इससे निश्चित होता है कि इसके दर्शन और आश्रय
की, किसी भी अन्य से संभावना नहीं है। इस प्रकार, अन्यों की संभावना
के प्रतिषिद्ध हो जाने पर अक्षर के प्रधान या जीवात्मभाव का स्वतः
प्रतिषेध हो जाता है ।
किंच—"एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, ददतो मनुष्याः
प्रशंसंति यजमानो देवादर्वी पितरोऽन्वायत्ताः" इति श्रौतं स्मार्तं च
यागदान होमादिकं सर्वकर्म यस्याज्ञया प्रवर्त्तते, तदक्षरं परब्रह्मभूतः
पुरुषोत्तम एवेति विज्ञायते ।
तथा-"गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही, मनुष्य दाता की,
देवता यजमान की तथा पितर दर्वी ( चरुपात्र ) की प्रशंसा करते हैं ।"
इत्यादि से भी ज्ञात होता है कि-श्रौत स्मार्त, याग-दान-होमादि सब
कर्म जिनके प्रशासन में संपन्न होते हैं, वे अक्षर, परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हो
सकते हैं ।
अपि च—"यो वा एतदक्षरं गार्गि ! अविदित्वास्मिंल्लोके
जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद्-
भवति, यो वा एतदक्षरंगार्गि । अविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति
[email protected]

( ४८३ )
सकृपणः, अथ य एतदक्षरं गार्गि ! विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स
ब्राह्मणः ।” इति यदज्ञानात् संसार प्राप्ति यज्ज्ञानाच्चामृतत्व प्राप्ति
स्तदक्षरं परं ब्रह्मैवेति सिद्धम् ।
तथा--'गार्गि ! जो लोग इस लोक में इस अक्षर को न जानकर
होम यज्ञ करते हैं तथा हजारों वर्ष तपस्या करते हैं, उनका समस्त कर्म
( पुण्यभोग के बाद ) समाप्त हो जाता है, वे बेचारे दया के पात्र हैं ।
और जो अक्षर तत्त्व के ज्ञाता ( निष्काम भाव से उसका चिंतन करते
हैं ) वे ही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं ।' इत्यादि में, अक्षर को न जानने से
संसार प्राप्ति और अक्षर ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति बतलाई गई है, जिससे
सिद्ध होता है कि-अक्षर परब्रह्म ही है ।
४ ईक्षतिकर्माधिकरणः—
ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ।१।३।१२॥
आथर्वणिकास्सत्यकाम प्रश्नेऽधीयते-“यः पुनरेतं त्रिमात्रेणो-
मित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः यथा
पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः ससा-
मभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष-
मीक्षते” इति अत्र ध्यायतीक्षतिशब्दावेकविषयौ, ध्यानफलत्वादीक्ष-
णस्य, “यथाक्रतुरस्मिंल्लोके पुरुषः” इति न्यायेन ध्यान विषयस्यैव
प्राप्यत्वात् “परं पुरुषं” इत्युभयत्र कर्मभूतस्यार्थस्य प्रत्यभिज्ञानाच्च ।
अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् के सत्यकाम के प्रश्न के प्रसंग में कहा
गया कि-‘जो त्रिमात्रात्मक अक्षर रूप परंपुरुष का ध्यान करते हैं वह
तेज में सूर्य के समान होते हैं; जैसे कि सर्प अपना केंचुल छोड़ देता है,
वैसे ही वे भी पाप से छूट जाते हैं । वे सामगणों द्वारा, ब्रह्मलोक में ले
जाए जाते हैं, वे इन जीवों से श्रेष्ठ परम पुरुष को हृदय में देखते हैं ।'
यहाँ ध्यान और दर्शन दोनों को एक ही बतलाया गया है । वैसे दर्शन
[email protected]

( ४७४ )
या साक्षात्कार ध्यान का ही फल है "पुरुष इस लोक में जैसा चिन्तन
करता है' इत्यादि में ध्यान को ही, प्राप्य वस्तु का कारण बतलाया गया
है। ध्यान और दर्शन दोनों में "परंपुरुष' की प्राप्ति की अभिलाषा
रहती है इसीलिए उक्त वाक्य में दोनों को एक विषयक दिखलाया
गया है ।
तत्र संशय्यते—किमिह "परं पुरुषम्" इति निर्दिष्टो जीव-
समष्टिरूपोऽण्डाधिपतिश्चतुर्मुखः उत सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः इति
कियुक्तम् ? समष्टि क्षेत्रज्ञ इति, कुतः ? "स यो ह वैतद् भगवन्
मनुष्येषु प्रायणान्तमोंकारमभिध्यायीत कतमंवाव सतेन लोकं
जयति" इति प्रक्रम्यैकमात्रं प्रणवमुपासीनस्य मनुष्यलोक प्राप्ति-
मभिधाय, द्विमात्रमुपासीनस्य अंतरिक्ष लोक प्राप्तिमभिधाय,
त्रिमात्रमुपासीनस्य प्राप्यतयाऽभिधीयमानो ब्रह्मलोकोऽन्तरिक्षात्परो
जीवसमष्टि रूपस्य चतुर्मुखस्य लोक इति विज्ञायते तद्गतेन
चेक्ष्यमाणः तल्लोकाधिपतिश्चतुर्मुख एव । "एतस्माज्जीव घनात्परा-
त्परम्" इति च देहेन्द्रियादिभ्यः पराद् देहेन्द्रियादिभिः सह घनी-
भूताज्जीवव्यष्टिपुरुषाद् ब्रह्मलोकवासिनः समष्टि पुरुषस्य चतु-
र्मुखस्य परत्वेनोपपद्यते । अतोऽत्र निर्दिश्यमानः परः पुरुषः समष्टि-
पुरुषः चतुर्मुख एव । एवं चतुर्मुखत्वे निश्चिते सति अजरात्वादयो
यथाकथंचिन्नेतव्याः ।
अब संशय होता है कि-परं पुरुष पद से निर्दिष्ट, जीव समष्टि
रूप ब्रह्माण्डपति चतुर्मुख हैं अथवा सर्वेश्वर पुरुषोत्तम ? कह सकते हैं
कि समष्टि क्षेत्रज्ञ ब्रह्मा ही है-जैसा कि-‘हे भगवन् इस मनुष्य लोक
में जो मनुष्य आजीवन ओंकार का चिंतन करते हैं वो कौन सा लोक
जीत लेते हैं?’ ऐसा उपक्रम करके, एकमात्र का चिंतन मनुष्य लोक
की प्राप्ति कराता है, दो मात्रा का चिन्तन अंतरिक्ष लोक की प्राप्ति
कराता है तथा त्रिमात्रा का चिन्तन अंतरिक्ष से श्रेष्ठ ब्रह्मलोक की

( ४८५ )
प्राप्ति कराता है जो कि जीव समष्टि रूप चतुर्मुख ब्रह्मा का लोक है;
इत्यादि बतलाया गया है । उस ब्रह्मलोक में प्राप्त जीवों का दृश्यमान
पर पुरुष चतुर्मुख ही है । “श्रेष्ठ जीवों से भी श्रेष्ठ” इत्यादि में देह
इन्द्रिय आदि से श्रेष्ठ देह इन्द्रिय आदि सहित घनीभूत जीव पुरुष से,
ब्रह्मलोकवासी समष्टि पुरुष चतुर्मुख की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया
गया है । इससे ज्ञात होता है कि-उक्त प्रसंग में जिस परंपुरुष का व्या-
ख्यान किया गया है, वह समष्टि पुरुष चतुर्मुख ही है । इस प्रकार परं-
पुरुष की चतुर्मुखता निश्चित हो जाने पर, अजरत्व आदि गुणों का प्रति-
पादन भी उन्हीं के लिए किसी न किसी प्रकार करना होगा ।
सिद्धान्तः-इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे-“ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्तः” ईक्षति
कर्म सः परमात्मा । कुतः ? व्यपदेशात्-व्यपदिश्यते हीक्षतिकर्म
परमात्मत्वेन । तथाहि ईक्षतिकर्मविषयतोदाहृते श्लोके-“तमोङ्का-
रेणैवायनेनान्

से ही, शांत-अजर-अमर-अक्षय स्वरूप परमात्मा को प्राप्त करता है"
इत्यादि । ऐसा शांत अजर अमर रूप परमात्मा का ही है, ऐसा
“एतदमृत” इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। 'एतज्जीवघनात् परात्पर"
इत्यादि श्रुति में भी परमात्मा का ही निर्देश है, चतुर्मुख ब्रह्मा का
नहीं । ब्रह्मा को भी जीवघन ही बतलाया गया है। कर्मों के फलस्वरूप
देह प्राप्ति ही जीवघनत्व है। चतुर्मुख ब्रह्मा के जन्म की बात भी
“जिन्होने प्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न किया” इत्यादि में प्रसिद्ध है। जो
यही कि—अंतरिक्ष लोक के ऊपर जो ब्रह्मलोक है, वह ब्रह्मा का ही लोक
प्रतीत होता है, क्योंकि वहाँ के दर्शनीय पुरुष चतुर्मुख हैं; सो यह कथन
भी असंगत है, क्योंकि—जब “यच्छान्तमजर" इत्यादि से परमात्मा का
ईक्षण कर्म निश्चित हो चुका तब ब्रह्मलोक जो कि—ईक्षण कर्म वाले का
ही स्थान है, वह क्षयशील ब्रह्मा का लोक, कैसे हो सकता है ।
किं च—“यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना
विनिर्मुक्तः स सामाभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्” इति सर्वं पापविनिर्मुंक्त्य
प्राप्यतयोच्यमानं न चतुर्मुखस्थानम् । अतएव चोदाहरणश्लोके
इममेव ब्रह्मलोकमधिकृत्यश्रूयते—“यत्तत्कवयो वेदयन्ते” इति । कवयः
सूरयः । सूरिभिर्दृश्यं च वैष्णवं पदमेव “तद्विष्णोः परमं पदं सदा
पश्यंति सूरयः” इत्येवमादिभ्यः । न चान्तरिक्षात् परश्चतुर्मुखलोकः
मध्ये स्वर्गलोकादीनां बहूनां सद्भावात् ।
तथा—“जैसे सर्प केचुल छोड़ देता है, वैसे ही वह साधक भी
पापों को छोड़ देता है, सामगण उसे ब्रह्मलोक पहुँचाते हैं ।” इत्यादि में
उदाहृत निष्पाप पुरुष के लिए जिस प्राप्य लोक का वर्णन किया गया है
वह, चतुर्मुख का स्थान नहीं हो सकता । उदाहरणरूप से प्रस्तुत श्लोक
में इस लोक को ब्रह्मलोक कहा गया है “जिसे कवि ही जानते हैं,”
इत्यादि कवयः का अर्थ सूरयः (ज्ञानीभक्त) है। सूरियों के द्वारा दृष्ट
वैष्णव पद "तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यंति सूरयः” इत्यादि वाक्यों
में बतलाया गया है। अंतरिक्ष के बाद चतुर्मुख का लोक ही नहीं है,
मध्य में स्वर्ग आदि और भी बहुत से लोक हैं, इससे भी उक्त बात
कट जाती है।

( ४८७ )
अतः "एतद् वै सत्यकाम परं चापरं ब्रह्म यदोंकारः तस्माद्
विद्वानेतेनैवायनेनैकतरमन्वेति" इति प्रतिवचने यदपरं कार्यं ब्रह्म
निर्दिष्टं तदैहिकामुष्मिकत्वेन द्विधा विभज्यैकमात्रं प्रणवमुपासीनाना
मैहिकं मनुष्यलोकावाप्ति रूपं फलमभिधाय, द्विमात्रमुपासीनानामामु-
ष्मिक अन्तरिक्ष शब्दोपलक्षितं फलं चाभिधाय, त्रिमात्रेण परब्रह्म
वाचिना प्रणवेन परं पुरुषं ध्यायतां परमेव ब्रह्म प्राप्यतयोपदिशतीति
सर्वं समंजसम् । अत ईक्षति कर्म परमात्मा ।
"सत्यकाम ! जो यह ओंकार है, यही पर और अपर ब्रह्म है,
उपासक विद्वान् इसकी उपासना करके एक एक लोकों की प्राप्ति करते
हैं।" इस आचार्य द्वारा दिए गए उत्तर में, जिस अपर कार्यब्रह्म का
उल्लेख किया गया है, उसके ऐहिक और आमुष्मिक दो रूप दिखलाकर,
एकमात्रा के प्रणव के उपासकों की मनुष्य लोक प्राप्ति द्विमात्रा के उपा-
सकों की, अंतरिक्ष नाम वाली आमुष्मिक प्राप्ति बतलाकर, त्रिमात्रा
वाले पर ब्रह्म वाची प्रणव से, परंपुरुष के ध्यान करने वालों परब्रह्म की
ही प्राप्ति बतलाई है, इस प्रकार प्रासंगिक असंगति का सामंजस्य कर
दिया गया है । इससे निश्चित हो गया कि-ईक्षति कर्म परमात्मा का
ही है ।
५ दहराधिकरण :-
दहर उत्तरेभ्यः ।१।३।१३॥
इदमामनंति छंदोगाः "अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं
पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः तस्मिन्यदंतस्तदन्वेष्टव्यं
तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्" इति । तत्र संदेहः-किमसौ हृदय पुण्डरीक
मध्यवर्त्ती दहराकाशो महाभूत विशेषः उत प्रत्यगात्मा उत पर-
मात्मा इति किं" तावद्युक्तम् ? महाभूत विशेष इति, कुतः ?
आकाश शब्दस्य, भूताकाशे ब्रह्मणि च प्रसिद्धत्वेऽपि, भूताकाशे

( ४८८ )
प्रसिद्धि प्रकर्षात् । “तदस्मिन्यदंतः तदन्वेष्टव्यम्” इत्यन्वेष्टव्या-
न्तरस्याधारतया प्रतीतेश्च ।
छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि-“इस ब्रह्मपुर में जो सूक्ष्म-
पुण्डरीक गृह है जिसमे कि सूक्ष्म आकाश विद्यमान है, उसके भी अंदर जो
विद्यमान है, उसी के अन्वेषण और जानने की चेष्टा करनी चाहिए”
इस पर संशय होता है कि-उल्लेख्य हृदयपुण्डरीक मध्यवर्ती दहराकाश,
महाभूत विशेष आकाश है, अथवा जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह
सकते है कि-महाभूतविशेष आकाश ही है; आकाश शब्द, भूताकाश
और परमात्मा दोनो के लिए ही प्रयुक्त होता है, पर भूताकाशरूप मे
अधिक प्रसिद्ध है तथा “तदस्मिन्” इत्यादि में अन्वेष्टव्य का आन्तरिक
आधार के रूप में जो वर्णन किया गया है उससे भी, भूताकाश की ही
प्रतीति होती है ।
सिद्धान्तः-इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते-दहरउत्तरेभ्यः दहराकाशः
परं ब्रह्मः, कुतः ? उत्तरेभ्यो वाक्यगतेभ्यो हेतुभ्यः । “एष आत्माऽ-
पहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघित्सोऽपिपासः सत्यकामः
सत्यसंकल्प” इति निरुपाधिकात्मत्वमपह पाप्मत्वादिकं सत्य कामत्वं
सत्यसंकल्पत्वं चेति दहराकाशे श्रूयमाणा गुणाः, दहराकाशं परं
ब्रह्मेति ज्ञापयंति ।
उक्त संशश की निवृत्ति के लिए सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “दहर-
उत्तरेभ्यः” सूत्र प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् दहराकाश पर ब्रह्म है-क्योंकि-
उक्त वाक्य के परवर्त्ती वाक्य में जो दहर संबंधी हेतु प्रस्तुत किये गए हैं
उनसे यही निर्णय होता है । “यह आत्मा निष्पाप-अजर-अमर-; शोक-
भूख-प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है ।” इस परवर्त्ती वाक्य
मे, दहराकाश के जो गुण कहे गए है, वे दहराकाश में स्थित, स्वाभाविक
निष्पाप, सत्यकाम सत्यसंकल्प परब्रह्म की विशेषताओ के द्योतक है ।
“अथ ह इहात्मानमनुविद्य ब्रजंत्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां
सर्वेषुलोकेषु कामचारो भवति “इत्यादिना” यं कामं कामयते
[email protected]