श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबतलाने में जिन प्रमाणों की अपेक्षा होती है, वस्तु प्रतिपादन की स्थिति
में उन प्रमाणों की अपेक्षा नहीं होती ।
एवं तर्ह्यक्षर शब्द निर्दिष्टो जीवोऽस्तु, तस्यभूतसूक्ष्मपर्यन्त-
स्य कृत्स्नस्याचिद्वस्तुन आधारत्वोपपत्तेः, अस्थूलत्वादुच्यमान-
विशेषणोपपत्तेश्च “अव्यक्तमक्षरेलीयते”—“यस्याव्यक्तं शरीरम्—
यस्याक्षरं शरीरम्” “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते”
इत्यादिषु—प्रत्यगात्मन्यप्यक्षर शब्द प्रयोगदर्शनादित्यत्रोत्तरम्—
यदि प्रधान को, अक्षर नहीं मानते तो, जीव तो अक्षर शब्द से
अभिधेय है ही, उसे ही भूतसूक्ष्म पर्यन्त समस्त जड़ वस्तुओं का आधार
तथा अस्थूलता आदि विशेषताओं वाला कहा गया है जैसा कि- “अव्यक्त
जिसका शरीर है, अक्षर जिसका शरीर है;” ‘समस्त भूत क्षर हैं, अक्षर
कूटस्थ है” इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा के लिए किए गए, अक्षर शब्द
के प्रयोग से ज्ञात होता है । इस मत का ही उत्तर देते हैं—
सा च प्रशासनात् । १।३।१०॥
सा चाम्बरान्तधृतिरस्याक्षरस्य प्रशासनादेव भवतीत्युपदिश्यते
“एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः,
एतस्यवाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः,
एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्य-
र्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्ति” इत्यादिना ।
प्रशासनंप्रकृष्टं शासनं, न चेदृशं स्वशासनाधीनसर्ववस्तु विधरणं
बद्धमुक्तोभयावस्थस्यापि प्रत्यगात्मनः संभवति । अतः पुरुषोत्तम
एव प्रशाशित्रक्षरम् ।
वह अम्ब पर्यन्त समस्त वस्तुओं का आधार अक्षर के प्रशासन से
ही होता है, ऐसा उपदेश दिया गया है । जैसा कि—“हे गार्गि ! इस अक्षर
के प्रशासन में ही सूर्य और चन्द्र स्थित हैं, गार्गि ! इसी अक्षर के