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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४१३ )
परमात्मानुभवेकरसस्य जीवस्यानादिकर्मरूपाविद्यातिरोहितस्वरूप-
स्याविद्योच्छेदपूर्वकं स्वाभाविक परमात्मानुभवमेव मोक्षमाचक्षते ।
तत्र मोक्षस्वरूपंतत्साधनं च त्वत्प्रसादात् विद्यामिति नचिकेतसा
पृष्टो मृत्युस्तस्यार्थस्य दुखबोधत्वप्रदर्शनेन विविधभोगवितरण
प्रलोभनेन चैनं परीक्ष्य योग्यतामभिज्ञाय परावरात्मतत्त्वविज्ञानं
परमात्मोपासनं तत्पदप्राप्तिलक्षणं मोक्षं च “तं दुर्दर्शं गूढमनु
प्रविष्टम्” इत्यारभ्य “सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं
पदम्” इत्यन्तेनोपदिश्य तदपेक्षितांश्च विशेषानुपदिदेशेति सर्वं
समञ्जसम् । अतः परमात्मैवात्तेति सिद्धम् ।
इस विषय मे अनेक मत प्रस्तुत किये जाते है कोई एकमात्र ज्ञान
स्वरूप आत्मा के स्वरूपोच्छेद को मोक्ष कहते है । दूसरे आत्मा को ज्ञान-
स्वरूप कहते हुए अविद्याध्वंस को मोक्ष कहते हैं । एक कहते है कि पाषाण
के सदृश अन्तःकरण के ज्ञान आदि विशेष गुणों का समुच्छेद ही मोक्ष
है । कोई परमात्मा को निष्पाप मानकर उनकी उपाधि के संसर्ग से जीव
भाव को प्र प्त करानेवाली उपाधियों के नष्ट हो जाने पर ब्रह्म भाव
प्राप्ति को मोक्ष कहते है । जिनकी बुद्धि वेदांत शास्त्र के अनुशीलन से
परिपक्व है, वे संपूर्ण जगत के एकमात्र कारण निर्दोष, आनंद स्वरूप,
स्वाभाविक अगणित असख्य कल्याणमय गुणों के आकर, सर्वथा विलक्षण,
सर्वान्तर्यामी परब्रह्म के शरीर स्थानीय, उन्ही के समान ज्ञानस्वरूप,
परमात्मानुभूति जन्य आनंदरस निमग्न जीव का जो, अनादि कर्म रूप
अविद्या से वास्तविक स्वरूप छिपा हुआ है, अविद्या के उच्छेद हो जाने
पर उसी वास्तविक स्वरूप की पुनः प्राप्ति और आत्मानुभवरस की
निमग्नता को ही मोक्ष मानते है ।
इन्ही विभिन्न मतों मे वस्तुतः मोक्ष का स्वरूप क्या है ? उसकी
प्राप्ति का माधन क्या है ? इसको मै तुम्हारे अनुग्रह से जानना चाहता
हूँ, नचिकेता के पूछे जाने पर यम ने पहिले जिज्ञासित विषय की दुर्गमता
फिर भोगों का प्रलोभन देकर उसकी पात्रता की परीक्षा की । उमकी
योग्यता की भली भाँति परीक्षा लेकर पर ( ब्रह्म ) और अवर ( जीव )
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४१४
आत्मतत्त्व विज्ञान, परमात्मोपासना तथा परमात्मपद प्राप्ति का “तंदुर्दर्शं
गूढमनुप्रविष्टम्' से प्रारंभ करके “सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः
परमं पदम्” तक उपदेश देते हुए मोक्ष प्राप्ति के विशेष साधनो का
उपदेश दिया जिससे कि सब सामंजस्य हो गया । इससे सिद्ध होता है
कि-उक्त प्रकरण में उपदिष्ट अत्ता परमात्मा ही है ।
३ अधिकरण—
अन्तर उपपत्तेः १।१।१३॥
इदमामनंति छंदोगाः “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते, एष
आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” इति । तत्र संदेहः किमयं-
मक्ष्याधारतया निर्दिश्यमानः पुरुषः प्रतिबिम्बात्मा, उत चक्षुरिन्द्रिया-
धिष्ठाता देवताविशेषः, उत जीवात्मा अथ परमात्मा इति । किं
युक्तम् ? प्रतिबिम्बात्मेति, कुतः ? प्रसिद्धवन्निर्देशात्, “दृश्यते”
इत्यपरोक्षाभिधानाच्च । जीवात्मा वा तस्यापि हि चक्षुषि विशेषेण
सन्निधानात् प्रसिद्धिरुपपद्यते उन्मीलितं हि चक्षुरुद्वीक्ष्य जीवात्मनः
शरीरेस्थितिगती निश्चिन्वन्ति । “रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः”
इति श्रुतिप्रसिद्ध्या चक्षुः प्रतिष्ठो देवताविशेषो वा, एष्वेव
प्रसिद्धवन्निर्देशोपपत्तेरेषामन्यतमः ।
छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि—“यह जो आंखों के बीच में पुरुष
दीखता है, यही आत्मा, अमृत और अभयरूप ब्रह्म है” इस पर विचार
होता है कि यह पुरुष है कौन, छायापुरुष अथवा नेत्रेन्द्रिय का अधिष्ठाता
देवता अथवा जीवात्मा या परमात्मा ? छाया पुरुष भी हो सकता है
क्योकि—“दृश्यते” ऐसा प्रत्यक्ष उल्लेख है। जीवात्मा भी हो सकता है
क्योंकि—नेत्रों में उसका सानिध्य रहता है, ऐसी प्रसिद्धि है। नेत्रों के
उन्मीलन से ही अनुमान होता है कि-जीव की उसमे स्थिति है । “वह
सूर्य रश्मियों द्वारा नेत्रों में स्थित है' इस श्रौत वाक्य से, नेत्र प्रतिष्ठित
प्रसिद्ध देवताविशेष का होना भी सिद्ध होता है। इन सभी की प्रसिद्धि
पाई जाती है, इन सब में कौन है ?
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( ४१५ )
इति प्राप्ति प्रचक्ष्महे-अन्तरउपपत्तेः-अक्ष्यन्तरः परमात्मा
कुतः ? “एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति एतं संयद्वाम
इत्याचक्षते, एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति एष उएववामनिः,
एषहि सर्वाणि वामानि नयति, एष उ एव भामनिः । एष हि
सर्वेषुलोकेषु भाति” इत्येषां गुणानां परमात्मन्येवोपपत्तेः ।
उक्त विचारो पर कहते है—कि—नेत्रों में परमात्मा है क्योंकि--
“उसने कहा कि यह आत्मा अमृत, अभय ब्रह्म है, इसे सयद्वाम कहते है,
क्योकि संपूर्ण सेवा वस्तुए सब ओर से इसे ही प्राप्त होती है, इसलिए
यही वामनी है, यही सपूर्ण वामो को वह न करता है, यह भामनी है,
यही संपूर्ण लोको में भासमान है ।” इत्यादि गुण परमात्मा मे ही उपपन्न
हो सकते है ।
: स्थानादिव्यपदेशाच्च १।२।१४॥
चक्षुषि स्थितिनियमनादय. परमात्मन् एव “यश्चक्षुषि
तिष्ठन्” इत्येवमादौ व्यपदिश्यन्ते । अतश्च” “य एषोऽक्षिणिपुरुषः”
इति स एव प्रतीयते । अतः प्रसिद्धवन्निर्देशश्च परमात्मन्युपपद्यते ।
तत एव “दृश्यते” इति साक्षात्कारव्यपदेशोऽपि योगिभिर्दृश्यमानत्वा-
दुपपद्यते ।
नेत्रों में स्थित, नियमन करने वाले परमात्मा ही हैं, 'जो नेत्रों में
अवस्थान करते है” इत्यादि से ज्ञात होता है । “यही नेत्र पुरुष है” इस
वाक्य में उन्ही का वर्णन है । इससे प्रसिद्ध निर्देश भी परमात्मा का ही
प्रतीत होता है । “दृश्यते” इत्यादि में योगियों के लिए दृश्य साक्षात् का
उल्लेख किया गया है ।
सुखविशिष्टाभिधानादेव १।२।१५॥
इतश्चाक्ष्याधारः पुरुषोत्तमः “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति प्रकृतस्य
सुखविशिष्टस्य ब्रह्मणः उपासनस्थानविधानार्थं संयद्वामत्वादि
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गुणविधानार्थं च "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" इत्यभिधानात् । एवकारो
नैरपेक्ष्यं हेतोद्योतयति ।
इसलिए भी नेत्रों में स्थिति पुरुषोत्तम हैं कि-- 'ब्रह्म क ( सुख-
विशिष्ट ) तथा ख ( आकाश ) स्वरूप हैं" इस वाक्य में जिस सुख-
विशिष्ट ब्रह्म को उपासना योग्य संयद्वाम आदि गुणों वाला बतलाया
गया है, उन्हें ही "य एषोऽक्षिणि" इत्यादि में नेत्रस्थानीय बतलाया गया
है । एकमात्र सुखविशिष्ट हेतु से ही अक्षि-पुरुष का परमपुरुषत्व प्रमा-
णित हो सकता है ।
नन्वग्निविद्याव्यवधानात् "कं ब्रह्म" इति प्रकृतंब्रह्म नेह
सन्निधत्ते । तथा हि-अग्नयः "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इति ब्रह्म
विद्यामुपदिश्य "अथहैनं गार्हपत्योऽनुशशास" इत्यारभ्याग्नीनामु-
पासनमुपदिदिशुः । न चाग्निविद्या ब्रह्मविद्यांगमिति शक्यं वक्तुम्;
ब्रह्मविद्याफलानन्तर्गततद्विरोधिसर्वायुः प्राप्ति संतत्यविच्छेदादिफल
श्रवणात् उच्यते— "प्राणो ब्रह्म"— "एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म"
इत्युभयत्र ब्रह्म संशब्दनात् । "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" इत्याग्नि-
वचनाच्च गत्युपदेशात् पूर्वं ब्रह्मविद्याया असमाप्तेस्तन्मध्यगताग्नि-
विद्या ब्रह्मविद्यांगमिति निश्चीयते । "अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास"
इति ब्रह्मविद्याधिकृतस्यैवाग्निविद्योपदेशाच्च ।
संशय होता है कि--अग्निविद्या का व्यवधान स्वरूप उपदेश "क
ब्रह्म" के प्रसंग में ठीक नहीं जचता । जैसा कि--तीन प्रकार की अग्नि
का "प्राण ब्रह्म, क ब्रह्म, ख ब्रह्म" ब्रह्म विद्यात्मक उपदेश देकर "उसके
बाद उसे गार्हपत्य अग्नि का उपदेश दिया" इस वाक्य से प्रारंभ करके
सभी अग्नियों की उपासना का उपदेश दिया गया है । यह नहीं कह
सकते कि--अग्निविद्या ब्रह्मविद्या का अंग है, क्योंकि-पूर्णायु और संतति
परम्परा की प्राप्ति ही अग्निविद्या का फल है जो कि ब्रह्मविद्या के फल
से सर्वथा विपरीत है । इसलिए विपरीत फलवाली विद्याओं का एक साथ
उपदेश अप्रासंगिक है ।
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( ४१७ )
उक्त शंका का समाधान करते हैं—"प्राण ब्रह्म"—"वह अमृत
और अभय स्वरूप है" इन दोनों वाक्यों में ब्रह्म शब्द का उल्लेख करके
"आचार्य तुम्हें गति ( ब्रह्म ) प्राप्ति के उपाय का उपदेश देंगे" अग्नि-
विषयक वाक्य के उल्लेख से ज्ञात होता है कि गति के उपदेश के पहिले
तक ब्रह्मविद्या का ही प्रसंग है। प्रसंग के मध्य में जो अग्निविद्या का
उपदेश दिया गया वह ब्रह्मविद्या का ही अंग है। "उसके बाद उसे
गार्हपत्याग्नि का उपदेश दिया गया" इस वाक्य में भी ब्रह्मविद्या के
अधिकारी रूप से ही अग्निविद्या का उपदेश दिया गया है।
किंच—"व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि" इति ब्रह्मप्राप्तिव्यतिरिक्त
नानाविधकामोपहतित्वपूर्वकगर्भजन्मजरामरणादिभवभयोपतप्तायोप-
कोसलाय "एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या च" इति समुच्चि-
तयोपदेशात् 'मोक्षैकफलात्मविद्यांगत्वमग्निविद्यायाः प्रतीयते । एवं
चांगत्वेऽवगते सति फलानुकीर्त्तनमर्थवाद इति गम्यते ।
तथा—ब्रह्म प्राप्ति के अभाव में अनेक प्रकार की कामनाओं से
आक्रान्त होने से गर्भ जन्म जरामरण आदि जन्य व्याधियों से भयभीत
उपकौशल ने जब कहा कि—"मैं व्याधियों से परिपूर्ण हूँ" तब उसे उप-
देश हुआ कि—"हे सौम्य ! तुझे अग्नि विद्या और आत्मविद्या का
उपदेश दिया गया" इस प्रकार एक साथ दो विद्याओं का उपदेश देकर
ब्रह्मविद्या की अंगरूप से, अग्निविद्या को मोक्षदायिनी सिद्ध किया गया
है। जिससे अग्निविद्या की, ब्रह्मविद्यांगता प्रतीत होती है। इस प्रकार
अग्निविद्या की अंगता सिद्ध हो जाने पर फलविपरीतता की बात औप-
चारिक कथनमात्र ज्ञात होती है।
न चात्र मोक्षविरोधिफलं किंचिच्छ्रूयते "अपहते पापकृत्यां
लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते
उपवयं तं भुंजामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च" इत्यमीषां फलानां
मोक्षाधिकृतस्यानुगुणत्वात् । अपहतेपापकृत्यां = ब्रह्मप्राप्ति विरोधी
पापकर्मपहंति । लोकी भवतितद्विरोधिनि पापे निरस्ते ब्रह्मलोकं
[email protected]

( ४१७ )
प्राप्नोति । सर्वमायुरेति = ब्रह्मोपासनसमासेर्याविदायुरपेक्षितम्,
तत्सर्वमेति । ज्योग्जीवति = व्याध्यादिभिरनुपहतो यावद्ब्रह्मप्राप्ति
जीवति । नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते = अस्यशिष्यप्रशिष्यादयः
पुत्रपौत्रादयोऽपि ब्रह्मविद एव भवंति । “नास्याब्रह्मवित्कुले भवति”
इति च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मविद्याफलत्वेन श्रूयते । उपवयन्तं भुंजामो-
ऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च = वयम् अग्नयस्तमेनमुपभुंजामः, यावद्
ब्रह्मप्राप्तिविघ्नेभ्यः परिपालयाम इति । अतोऽग्निविद्याया ब्रह्मविद्यां
गत्वेन तत् संन्निधान अविरोधात् सुखविशिष्टं प्राकृतमेव ब्रह्मो-
पासनस्थानविधानार्थं गुणविधानार्थं चोच्यते ।
अग्निविद्या के प्रसंग में कुछ भी मोक्ष विरोधी फल की बात नहीं
है--“अग्नि का उपासक, पाप कर्मों को नष्ट कर लोकवान पूर्णायु होकर
उज्वल जीवन व्यतीत करता है, उसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष क्षीण नहीं होते,
उसका हम लोग इस लोक और परलोक में पालन करते है ।’’ इस श्रुति
मे कहे गए सारे फल मोक्षाधिकारी पुरुष के अनुकूल ही हैं । “पापों
को नष्ट कर” अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति विरोधी पापों को नष्ट कर । “लोक
वान होता है” अर्थात् उन विरोधी पापो के नष्ट होने पर ब्रह्मलोक को
प्राप्त करता है । “पूर्णायु होता है” अर्थात् ब्रह्मोपासना मे अपेक्षित आयु
प्राप्त करता है । “उज्वल जीवन व्यतीत करता है “अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति
की अवधि तक रोगादिकों से मुक्त होकर सुखी जीवनयापन करता है ।”
इसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष नष्ट नहीं होते “अर्थात् उसके शिष्य, प्रशिष्य,
पुत्र पौत्र सभी ब्रह्मवेत्ता होते हैं ।” उसके कुल में कोई अब्रह्मविद नहीं
होता” इस अन्य श्रुति से भी ब्रह्मविद्या की फलरूप से ज्ञप्ति की गई
है । “उसका हम इस लोक और परलोक में पालन करते हैं” अर्थात् हम
अग्नियां ऐसे पुरुष का उपभोग करते हैं, जब तक उसे ब्रह्म प्राप्ति नहीं
हो जाती तब तक विघ्नों से उसका पालन करते है । इससे स्पष्ट है कि
अग्निविद्या, ब्रह्मविद्या की ही अंग है, इन दोनों का एक साथ किया गया
उपदेश विरोधी नहीं है अपितु उपयोगी ही है । उपासना के उपयुक्त
[email protected]

स्थान के विधान, तथा तदुपयोगी गुणविधान के लिए जो सुखविष्ट (क)
ब्रह्म की चर्चा की वह स्वाभाविक ही है (विरोधी नहीं) ।
ननु-“आचार्यस्तुतेगतिं वक्ता” इति गतिमात्रपरिशेषणादा-
चार्येण गतिरेवोपदेश्येति गम्यते, तत्कथं स्थानगुणविध्यर्थतोच्यते
तदभिधीयते “आचार्यस्तुते गतिवक्ता” इत्यस्यायमभिप्रायः ब्रह्मवि-
द्याम्रनुपदिश्य प्रोषुषिगुरौ तदलाभादनाश्वासमुपकोसलमुज्जीवयितुं
स्वपरिचरप्रणीता गार्हपत्यादयो गुरोरग्नयस्तस्मै ब्रह्मस्वरूपमात्रं
तदंगभूतां चाग्निविद्यामुपदिश्य “आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं
प्रापत्” इति श्रुत्यर्थमालोच्य साधुतमत्वप्राप्त्यर्थमाचार्यं एवास्य
संयद्वामत्वादि गुणकं ब्रह्म तदुपासनस्थानमर्चिरादिकां च गतिमुपदि-
शत्वितिमत्वा “आचार्यस्तु ते गतिवक्ता” इत्यवोचन् ।
(प्रश्न) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे” इस वाक्य से तो
ज्ञात होता है कि—एकमात्र गति विषयक उपदेश ही शेष रह गया था
आचार्य को केवल उसी का उपदेश करना था, फिर स्थान और गुण
विशेष के लिए सुखविशिष्ट का ब्रह्म की चर्चा कैसे स्वाभाविक है ?
( समाधान ) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देगे” का अभिप्राय
यह है कि—उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिये बिना ही आचार्य
प्रवास मे चले गए थे, ब्रह्मविद्या न पाकर उपकोसल बहुत निराश हुआ,
उसके द्वारा की गई परिचर्या से प्रसन्न होकर अग्नियों ने उसे, ब्रह्म के
स्वरूप और उसकी प्राप्ति की अंगस्वरूप अग्निविद्या का उपदेश देकर
“आचार्य से प्राप्त ब्रह्मविद्या ही अतिशय साधुता को प्राप्त होती है इस
श्रुत्यर्थ का विचार कर अतिशय सिद्धि प्राप्ति के लिए आचाय ही इसे
संयद्वामत्व आदि गुण युक्त ब्रह्म, ब्रह्मोपासना का स्थान एवं अर्चिरादि-
गति का उपदेश करें; ऐसा निश्चय कर उन्होने उपकोसल को आदेश
दिया कि—आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे।
गतिग्रहणमुपदेश्यविद्याशेषप्रदर्शनाथंम् । अतएव आचार्योऽपि
“अहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाशआपो न श्लिष्यन्ते एव-

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मेवंविदि पापंकर्म न श्लिष्यते” इत्युपक्रम्य संयद्वामत्वादिकल्याण
गुणविशिष्टं ब्रह्माक्षिस्थानोपास्यमर्चिरादिकां च गतिमुपदिदेश।
अतः “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति सुखविशिष्टस्य प्रकृतस्यैव ब्रह्मणो-
ऽत्राभिधानादयमक्ष्याधारः परमात्मा।
उपदेष्टव्य विद्या से सबंधित जो कुछ भी वक्तव्य है वह सभी
“गति” शब्द के प्रयोग में उल्लेख्य है। इसलिए आचार्य ने भी—“अब मैं
तुझे वह बतलाता हूं, जिसे जानकर पापकर्मों का उसी प्रकार संबंध
विच्छेद हो जाता है जैसे कि कमल पत्र में जल का आश्लेष नहीं रहता ।”
इस भूमिका के साथ संयदवामत्व आदि गुण विशिष्ट ब्रह्म की नेत्रस्थानीय
उपासना तथा अर्चिरादिगति का उपदेश दिया। इस प्रकरण की इस
प्रकार पर्यालोचना करने पर स्पष्ट हो जाता है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म”
सुखविशिष्ट नेत्र स्थानीय उपास्य का जो उल्लेख किया गया है, वह
स्वाभाविक ही है।
ननु च “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति परंब्रह्माभिहितमिति कथमव-
गम्यते, यस्येहाक्ष्याधारतयाऽभिधानंब्रूषे; यावता “कं ब्रह्म खं ब्रह्म”
इति प्रसिद्धाकाश लौकिकसुखयोरेव ब्रह्मदृष्टिर्विधीयत इति प्रति-
भाति “नाम ब्रह्म”-मनोब्रह्म” इत्यादि वचनसारूप्यात् । तत्राह-
शंका होती है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म” यह प्रयोग परंब्रह्म के लिए
ही किया गया है, तथा यही नेत्रस्थानीय है, यह कैसे जान गए ? “कं
ब्रह्म ख ब्रह्म” शब्द से तो प्रसिद्ध आकाश और लौकिक सुख को ही ब्रह्म
दृष्टि से प्रतिपादन किया गया है, यह तो “नाम ब्रह्म” “मन ब्रह्म” की
तरह ही वाक्य है। इसका समाधान करते हैं--
अत एव च स ब्रह्म १।२।१६॥
यतस्तत्र “यदेव कं तदेव खं” इति सुखविशिष्टस्याकाशस्याभि-
धानम् अतएव ख शब्दाभिधेय. सः आकाशः परंब्रह्म एतदुक्त भवति-
अग्निभिः “प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इत्युक्ते उपकोसल उवाच-
[email protected]

( ४२१ )
"विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामि" इति ।
अस्यान्यमभिप्रायः-न तावत्प्राणादिप्रतीकोपासनमग्निभिरभिहितम्
जन्मजरामरणादिभवभयभीतस्य मुमुक्षोर्ब्रह्मोपदेशाय प्रवृत्तत्वात्
अतो ब्रह्मैवोपास्यमुपदिष्टम् । तत्र प्रसिद्धैः प्राणादिभिः समाना-
धिकरणं ब्रह्म निर्दिष्टम् । तेषु च प्राण विशिष्टत्वं जगद्विधरण-
योगेन वा प्राणशरीर तया प्राणस्यनियंतृत्वेन वा ब्रह्मण उपपद्यत
इति "विजानाम्यहं यत्प्राणोब्रह्म" इत्युक्तवान् ।
विशेष प्रयोजन से ही वहां "जो क है वही ख है" ऐसा सुख
विशिष्ट आकाश का निरूपण किया गया है (अर्थात् आकाश के समान
अपार निर्दोष, सुख विशेष ही ब्राह्मसुख है) इसलिए ख शब्द से अभिधेय
आकाश भी परंब्रह्म है। तीनों अग्नियों के "प्राण ब्रह्म-कं ब्रह्म-ख ब्रह्म" '
कहने पर उपकोसल ने कहा-"मैं प्राण ब्रह्म को तो जानता हूं पर क और
ख कैसे ब्रह्म है यह नहीं समझ पाया।
इसका तात्पर्य है कि-अग्नियों ने प्राण आदि की प्रतीकोपासना
रूप से व्याख्या की हो, ऐसा नहीं है, अपितु जन्मजरामरण आदि
सांसारिक भयों से भीत मुमुक्षु को, ब्रह्मोपदेश देने के लिए ऐसा कहा
था। इससे ज्ञात होता है कि-ब्रह्म की उपासना का ही उपदेश दिया
गया है तथा उन वाक्यों में, प्रसिद्ध प्राण आदि के सामानाधिकरण्य से
ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। ब्रह्म ही जगत को धारण करते हैं
अथवा प्राण ब्रह्म का शरीर है अतएव वे ही प्राण के नियामक परि-
चालक हैं इत्यादि से ब्रह्म का प्राण विशिष्टत्व धर्म सिद्ध होता है-इसी
लिए-"प्राण ब्रह्म को तो मैं जानता हूँ" ऐसा (उपकोसल ने) कहा।
तथा सुखाकाशयोरपि ब्रह्मणः शरीरतया तन्नियाम्यत्वेन
विशेषणत्वम्,उतान्योन्यव्यवच्छेदकतया निरतिशयानंदरूपब्रह्मस्व-
रूपसमर्पणपरत्वेन वा तत्र पृथग्भूतयोः शरीरतया विशेषणत्वे
वैषयिकसुखभूताकाशयोर्नियामकत्वं ब्रह्मणः स्यादिति स्वरूपा-
[email protected]

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वगर्तिनस्यात्, अन्योन्यव्यवच्छेदकत्वेऽपरिच्छिन्नानन्दैकस्वरूपत्वं
ब्रह्मणः स्यादित्यन्यतरप्रकारनिर्दिधारयिषया 'कं च तु खं च न
विजानामि" इत्युक्तवान् ।
इसी प्रकार सुख और आकाश भी ब्रह्म के शरीर स्थानीय रूप से
उनके नियंत्रण में रहने से विशेषण स्वरूप है अथवा परस्पर एक दूसरे
से विशेषित होकर निरतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप का प्रकाश करते
हैं इसलिए वे ब्रह्म के विशेषण हैं ? इस विचारणीय प्रश्न पर-इन दोनों
(क और ख) को ब्रह्म का भिन्न-भिन्न शरीर मानकर यदि विशेषण
माना जावे तो ब्रह्म का नियंत्रण वैषयिक सुख और भूताकाश पर हो
सकता है, पर ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नही हो सकता [अर्थात्
सुख ही ब्रह्म है, आकाश ही ब्रह्म है ऐसा नहीं कहा जा सकता अपितु
वैषयिक सुख और भूताकाश को ब्रह्मसुख और दहराकाश का अंग कहा
जा सकता है] एक दूसरे से विशेषित होकर तो अतिशय आनंदमय ब्रह्म
के स्वरूप की अवगति हो सकती है [अर्थात् जो क है वही ख है और
जो ख है वही क है, इस व्याख्या के अनुसार सुख और आकाश की
पारस्परिक विशेषताओ से, आकाश के समान व्यापक स्वच्छ सुख है
अथवा सुख का सा सरल गंभीर आकाश है, ये दोनों ही विशेषतायें, ब्रह्म
की अखंड आनंदमयता का प्रकाश करती है] उपकोसल के समक्ष उपर्युक्त
संशयात्मक दो विचार थे, इसीलिए उसने गुरु से कहा था कि-“क और
ख कैसे ब्रह्म हैं यह मैं नहीं समझ सका।"
उपकोसलस्येममाशयं जानन्तोऽग्नयः “यद्वाव कं तदेव खं
यदेव खं तदेव कम् ” इत्यूचिरे । ब्रह्मणः सुखरूपत्वमेवापरिच्छिन्न
मित्यर्थः । अतः प्राणशरीरतया प्राणविशिष्टं यद् ब्रह्म तदेव
अपरिच्छिन्नं सुखरूपं चेति निगमितम् “प्राणं च हास्मैतदाकाशं
चोचुः” इति । अतः 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इत्यत्रापरिच्छिन्नं सुखं ब्रह्म
प्रतिपादितमिति परंब्रह्मैव तत्र प्रकृतम्, तदेव चात्राक्ष्याधारतयाऽ-
मिधीयत इत्यक्ष्याधारः परमात्मा ।

उपकोसल के उक्त आशय को समझ कर अग्नियों ने कहा कि—
"जो क है वही ख है, जो ख है वही क है" ब्रह्म निस्सीम सुख स्वरूप है
यही उनके कथन का तात्पर्यार्थ है। प्राण जिनका शरीर है, ऐसे प्राण से
विशिष्ट ब्रह्म, निस्सीम सुखस्वरूप भी है ऐसा "प्राण और उसके आश्रय-
भूत आकाश का उपदेश किया" इस वेदांत वाक्य से सिद्ध होता है।
इससे निश्चित होता है कि—"क ब्रह्म ख ब्रह्म" इत्यादि वाक्य में निस्सीम
सुख स्वरूप ब्रह्म का ही वर्णन है जो कि परब्रह्म का ही प्रतिपादक है,
वही उक्त प्रकरण का नेत्रस्थानीय नेत्राधार परमात्मा है।
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ।१।२।१७॥
श्रुतोपनिषत्कस्य—अधिगतपरमपुरुषयाथात्म्यस्यानुसंधेयतया
श्रुत्यंतरप्रतिपाद्यमाना अचिरादिका गतिर्या, तामपुनरावृत्तिलक्षण-
परं पुरुषप्राप्तिकरीमुपकोसलायाक्षिपुरुषं श्रुतवते "तेऽर्चिषमेवाभि-
संभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षम" इत्यारभ्य" चन्द्रमसोविद्युतम्
तत्पुरुषो मानव. स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन
प्रतिपद्यमानां इमं मानवमावर्त्तं नावत्र्त्तन्ते "इत्यन्तेनोपदिशति ।
अतोऽप्ययमक्षिपुरुषः परमात्मा ।
श्रुतोपनिषत्क अर्थात औपनिषद ज्ञातव्य परमपुरुष भगवान तथा
तत्संबंधी अन्यान्य श्रुतिवाक्यों से अपुनरावृति लक्षण वाली परंपुरुष को
प्राप्त कराने वाली अचिरादिगति, उपकोसल को—" वे अर्चिअभिमानी
देवता को ही प्राप्त होते है, अर्चि से दिवसाभिमानी देवता को दिवसा-
भिमानी देवता से शुक्लपक्षाभिमानी देवता को" इत्यादि से प्रारंभ करके
"चन्द्रमा से विद्युत को, वहाँ से अमानव पुरुष, ब्रह्म को प्राप्त करा देता
है, यह देवमार्ग ब्रह्मपथ है, इससे जाने वाले मानव, मानव मंडल में
कदापि नहीं लौटते" यहाँ तक बतलाई गई है. वह अक्षिपुरुष के लिए ही
है। इससे भी सिद्ध होता है कि अक्षिपुरुष परमात्मा ही है।
अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ।१।२।१८॥
प्रतिबिम्बादीनामक्षिणि नियमेनानवस्थानाद मृतत्वादीनां च

( ४२४ )
निरुपाधिकानां तेष्वसंभवान्न परमात्मन इतरः छायादिः अक्षिपुरुषो
भवितुमर्हति । प्रतिबिम्बस्य तावत्पुरुषान्तर संनिधानायत्तत्वान्न
नियमेनावस्थानसंभवः । जीवस्यापि सर्वेन्द्रियव्यापारानुगुण्यत्वाय-
सर्वेन्द्रियकेन्द्रभूते स्थानविशेषे वृत्तिरिति चक्षुषि नावस्थानम् ।
देवतायाश्च ‘ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः' इति रश्मिद्वारेणा-
वस्थानवचनात् देशांतरावस्थितस्यापीन्द्रियाधिष्ठानोपपत्तेर्न चक्षु-
ष्यवस्थानं सर्वेषामेवैषां निरुपाधिकामृतत्वादयो न संभवन्त्येव ।
तस्मादक्षिपुरुषः परमात्मा ।
अमृतत्व आदि धर्म छायापुरुष आदि में संभव नहीं हैं, नेत्रों में
इन सबको नियमित स्थिति भी संभव नहीं है । परमात्मा के अतिरिक्त
ये सब अक्षिपुरुष नहीं हो सकते । सामने किसी व्यक्ति के हुए बिना
छाया तो पड़ नहीं सकती, इसलिए छायापुरुष की नेत्रों में नियमित
स्थिति संभव नहीं है । जीव की,

( ४२५ )
धर्म हैं, “स्थानादिव्यपदेशाच्च” सूत्र में प्रमाणों द्वारा सिद्ध करके, अक्षि-
पुरुष की परमात्मकता सिद्ध की गई अब उसी का समर्थन करते हैं ।
अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषुतद्धर्मव्यपदेशाच्च ॥ १।२।१८॥
काण्वा-माध्यन्दिनाश्च-वाजसनेयिनः समामनंति-“यः पृथिव्यां
तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः
पृथिवीमन्तरो यमयत्येषत आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति । एवम्
अम्ब्वग्न्यन्तरिक्षवाय्वादित्यदिक्चंद्रतारकाकाशतमस्तेजस्सुदैवेषु च
सर्वेषु भूतेषु प्राणवाक्चक्षुश्श्रोत्रमनस्त्वग्विज्ञानरेतः स्वात्मात्मीयेषु
च तिष्ठंतं तत्तदन्तरभूतं तत्तदवेद्यं तत्तच्छरीरकं तत्तद्यमयन्तं
कंचिन्निर्दिश्य “एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्युपदिश्यते ।
माध्यन्दिन पाठे तु ‘यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन्’ ‘यः सर्वेषु वेदेषु’—
यः सर्वेषु यज्ञेषु “इति च पर्यायाः ।” यो विज्ञाने तिष्ठन् “इत्यस्य
पर्यायस्य स्थाने” य आत्मनितिष्ठन् “इति पर्यायः । “सत
आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति विशेषः । तत्र संशय्यते-किमयमन्तर्यामी
प्रत्यगात्मा उत परमात्मा-इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ।
वाक्यशेषे “द्रष्टाश्रोता” इतिकरणायत ज्ञानताश्रुतेः । एवं द्रष्टुरे-
वान्तर्यामित्वोपदेशात् । ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इति द्रष्ट्रन्तर
निषेधाच्चेति ।
यजुर्वेदीय काण्वशाखा और माध्यन्दिन वाजसनेयी शाखा में
ऐसा वर्णन मिलता है कि— “जो पृथिवी में होते हुए भी पृथिवी से भिन्न
हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पर पृथिवी उनका शरीर है, वह पृथिवी में
अन्तर्यामी रूप से उसका संयमन करते है, वे अन्तर्यामी अमृत परमात्मा
ही तुम्हारे आत्मा हैं ।” इत्यादि— इसी प्रकार जल-अग्नि-अंतरिक्ष-
वायु-आदित्य-दिक्-चंद्र-तारा-आकाश-तम और तेज रूप देवताओं में,
समस्त भूतों में, प्राण-वाक्-चक्षु-श्रोत्र-मन-त्वग्-बुद्धि और शुक्र आदि
आत्मा और आत्मियों में अवस्थित उनके अन्तर्यामी उनसे अज्ञेय, उनके
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( ४२६ )
ही शरीर वाले, उनके नियंता आदि रूप से उन्हे बतलाकर “वे ही अमृत
स्वरूप अन्तर्यामी तुम्हारे आत्मा हैं।” ऐसा उपदेश दिया गया है।
माध्यन्दिन के पाठ में—“जो समस्त लोको में स्थित हैं, जो समस्त वेदों
में स्थित हैं, जो समस्त यज्ञों में स्थित हैं” इत्यादि पर्याय विशेष है।
“जो विज्ञान में स्थित है” के स्थान पर “जो आत्मा में स्थित है” ऐसा
पर्यायवाची वाक्य प्रयोग किया गया है। “वह अमृत स्वरूप अन्तर्यामी
तुम्हारे आत्मा हैं” यह विशेष वाक्य दोनों में ही मिलता है।
इस पर संशय होता है कि–यह अन्तर्यामी, जीव है या परमात्मा ?
कह सकते हैं कि–जीवात्मा है, क्यों कि–उक्त वाक्य के अंत में अन्तर्यामी
का ज्ञान इन्द्रियाधीन है, ऐसा “द्रष्टा श्रोता” इत्यादि विशेषणों से ज्ञात
होता है। द्रष्टा को ही अन्तर्यामी कहा गया है तथा उसके अतिरिक्त
कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है।” ऐसा निषेध किया गया है इत्यादि से
जीवात्मा ही सिद्ध होता है।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषु तद्धर्म-
व्यपदेशात् अधिदैवाधिलोकादिपदचिह्नितेषु वाक्येषु श्रूयमाणोऽन्त-
र्याम्यपहतपाप्मा परमात्मा नारायणः। काण्वपाठसिद्धेभ्योऽधिदै-
वादिमद्भ्यो वाक्येभ्योऽधिकान्यधिलोकादिमन्ति वाक्यानि माध्य-
न्दिनपाठे सन्तीति ज्ञापनार्थमधिदैवाधिलोकादिष्वित्युभयोरुपादानम्।
तदेवमुभयेष्वपि वाक्येष्वन्तर्यामी परमात्मेत्यर्थः। कुतः ? तद्धर्म-
व्यपदेशात् परमात्मधर्मोह्ययम्, यदेक एव सन् सर्वलोकसर्वभूत
सर्वदेवादीन् नियमयति इति।
उस संशय पर कहते हैं कि–अधिदैव और अधिलोक आदि वाक्यों
में कहे गए अन्तर्यामी, निष्पाप परमात्मा नारायण ही हैं। काण्वशाखा
के पाठ के अनुसार अधिदैवादि युक्त वाक्य की अपेक्षा माध्यन्दिन पाठ में
अधिलोकादि युक्त पाठ अधिक है, इसके ज्ञापन के लिए ही सूत्र में
अधिदेव के बाद अधिलोक शब्द का उल्लेख किया गया है। इन दोनों
ही स्थानों के अन्तर्यामी परमात्मा ही हैं। उनके ही धर्मों का, दोनों
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स्थानों पर उल्लेख किया गया है। जो स्वयं एक होकर भी, समस्त लोक,
समस्त भूत और समस्त देवताओं का नियमन करते हैं। इत्यादि ।
तथा उद्दालक प्रश्नः “इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च
भूतानि योऽन्तरो यमयति” इत्युपक्रम्य “तमन्तर्यामिणंब्रूहि” इति
तस्य चोत्तरम् “यः पृथिव्यां तिष्ठन्” इत्यारभ्योक्तम्। तदेतत्
सर्वांल्लोकान्, सर्वाणि च भूतानि, सर्वान् देवान्, सर्वान् वेदान्,
सर्वांश्चयज्ञानन्तः प्रविश्य, सर्वंप्रकारनियमनम्, सर्वशरीरतया
सर्वस्यात्मत्वं च सर्वज्ञात् सत्यसंकल्पात् पुरुषोत्तमादन्यस्य न
संभवति।
इसी प्रकार उद्दालक प्रश्न के प्रकरण में जैसे-“जो अन्तर्यामी होकर
इहलोक परलोक और समस्त भूतों का संयमन करते है” ऐसा उपक्रम
करके “उन अन्तर्यामी के विषय में बतलावें” ऐसा प्रश्न करने पर “जो
पृथिवी में है” इत्यादि उत्तर दिया गया। इससे ज्ञात होता है कि-समस्त
लोक, समस्त भूत समुदाय, समस्त देवता, समस्त वेद, समस्त यज्ञ के
अन्तर्यामी, हर प्रकार से सबका नियमन करने वाले, सर्व शरीर, सर्वात्मा
सर्वज्ञ सत्य संकल्प, एक मात्र पुरुषोत्तम ही हो सकते हैं।
तथाहि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा”-“तत्सृष्ट्वा
तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य, सच्चत्यच्चाभवत्” इत्यादीन्यौप-
निषदानि वाक्यानि परमात्मन एव, सर्वस्य प्रशासितृत्वं सर्वस्या-
त्मत्वं इत्यादीनि वदंति ।
इसी प्रकार-“सर्वात्मभूत परमेश्वर अभ्यंतर में प्रवेश कर समस्त
जनों का शासन करते हैं”-“वे सृष्टि करके उसी में प्रविष्ट हो गए,
प्रविष्ट होकर वे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप वाले हुए” इत्यादि औपनिषद्
वाक्य, परमात्मा की ही सर्वशासकता और सर्वान्तर्यामिता इत्यादि
बतलाते हैं।
तथा सुबालोपनिषदि-“नैवेह किंचनाग्र आसीदभूतमनाधारं-
मिमाः प्रजाः प्रजायंते दिव्योदेव एको नारायणः, चक्षुश्च द्रष्टव्यं

च नारायणः, श्रोत्रं च श्रोतव्यं च नारायणः" इत्यारम्भ "अन्तः
शरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यः यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी-
मन्तरे संचरन् यं पृथिवी न वेद यस्यापश्शरीरम्" इत्यादि "यस्य
मृत्युः शरीरम् यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूतान्त-
रात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः" इति परस्यैव
ब्रह्मणः सर्वात्मत्वं सर्वशरीरत्वं सर्वस्य नियंतृत्वं च प्रतिपाद्यते ।
तथा सुबालोपनिषद में भी जैसे—"सृष्टि के पूर्व कुछ नहीं था,
ये सारी प्रजा अर्थात् जायमान वस्तुएं, निर्मूल और निराधार रूप से
जन्मती हैं, उस समय अलौकिक प्रकाश वाले एकमात्र नारायण ही थे,
नारायण ही चक्षु और द्रष्टव्य तथा नारायण ही श्रोत्र और श्रोतव्य
थे ।" इत्यादि उपक्रम वाक्य से लेकर "जन्म रहित एक नित्यवस्तु शरीर
के अंदर बुद्धि की गुहा मे निहित है, पृथिवी जिनका शरीर है, जो पृथिवी
में संचरण करते है पृथिवी जिनको नहीं जानती, जल जिनका शरीर है।"
इत्यादि तथा 'मृत्यु जिनका शरीर है, जो मृत्यु मे संचरित हैं, मृत्यु
जिन्हें नही जानता, ऐसे समस्त भूतों के अन्तरात्मा, निष्पाप दिव्य देव
एकमात्र नारायण ही है।" यहाँ तक परब्रह्म को सर्वात्मक, सर्व शरीरी
सर्वनियंता, बतलाया गया है ।
स्वाभाविकंचामृतत्वं परमात्मन एव धर्मः । न च परस्या-
त्मनः करणायत्तद्रष्टृत्वादिकं, अपितु स्वभावत एव सर्वज्ञत्वात्
सत्यसंकल्पत्वाच्च स्वत एव । यथा च श्रुतिः—"पश्यत्यचक्षुः स
शृणोत्यकर्णः अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" इति । न च दर्शन
श्रवणादिशब्दाः चक्षुरादिकरणजन्मनो ज्ञानस्य वाचकाः अपितु
रूपादिसाक्षात्कारस्य । स च रूपादिसाक्षात्कारः कर्मतिरोहित
स्वाभाविकज्ञानस्य जीवस्य चक्षुरादिकरण जन्माः, परस्यतु स्वत
एव । 'नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा" इत्येतदपि पूर्ववाक्योदितात् नियतुः
दृष्टुः, अन्योद्रष्टा नास्ति इति वदति ।

( ४२६ )
स्वाभाविक अमरता, परमात्मा की ही विशेषता है। परमात्मा में,
देखना सुनना इत्यादि क्षमतायें इन्द्रियाधीन नहीं हैं अपितु सर्वज्ञ और
सत्यसंकल्प होने से ये सारी क्षमतायें उनमें स्वाभाविक रूप से रहती हैं।
जैसा कि-‘बिना नेत्र के ही देखते है, बिना कान के ही सुनते हैं' बिना हाथ
और पैर के ही पकड़ते और चलते हैं" इस श्रुति वाक्य से भी सिद्ध है।
देखना सुनना इत्यादि शब्द एकमात्र आँख कान इत्यादि इन्द्रिय जन्य
ज्ञान के ही बोधक हों, ऐसा नहीं है, अपितु रूपादि विषयक साक्षात्कार
के बोधक भी हैं। जीव की स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, स्वीय कर्म संस्कारों
से आवृत्त रहती है इसीलिए उसे इन्द्रियों की अपेक्षा होती है। किन्तु
परमात्मा स्वभाव से ही कर्मादिजन्य दोषों से रहित है, इसलिए उन्हें
सदा स्वाभाविक ज्ञान रहता है। “इनसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है"
इत्यादि श्रुति भी पूर्व वाक्योक्त-नियंता द्रष्टा को कोई दूसरा द्रष्टा नहीं
है इसी का समर्थन करती है।
“यं पृथिवी न वेद" यमात्मा न वेद “इत्येवमादिभिर्वाक्यैः
पृथिव्यात्मादिनियाम्यैरनुपलाभ्यमान एव नियमयतीहि यत्पूर्वमुक्तम्
तदेव” अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता “इति निगमय्य” नान्योऽतो-
ऽस्ति द्रष्टा “इत्यादिना तस्य नियन्तुर्नियन्त्रन्तरं निषिध्यते ।”
एष त आत्मा—“सत आत्मा” इति च त इति व्यतिरेकविभक्ति-
निर्दिष्टस्य जीवस्यात्मतयोपदिश्यमानोऽन्तर्यामी न प्रत्यगात्मा
भवितुमर्हति ।
“पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती" आत्मा जिन्हें नही जानता “इत्यादि
वाक्यों से उन्हीं का उल्लेख है जिन्हें पूर्व वाक्यो में पृथ्वी आत्मा आदि
का नियामक कहा गया है, उन्हें ही आगे “स्वयं अदृश्य होकर देखते है
तथा अश्रुत होकर सुनते है” इत्यादि में अलौकिक बतलाकर “उनके
अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नही है” इत्यादि से उनकी अनन्य नियंतृता
सिद्ध की गई है । ‘यह तुम्हारा आत्मा है—वह तुम्हारा, आत्मा है”
इत्यादि में आत्मा से भिन्न विभक्ति का प्रयोग करके जीवात्मा की
भिन्नता स्पष्ट कर दी गई है इसलिए जीवात्मा कदापि अन्तर्यामी नहीं
हो सकता ।
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( ४३० )
न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापाच्छारीरश्च ।१।२।२०॥
स्मार्त्तं प्रधानम्, शारीरः जीवः स्मार्त्तं च शारीरश्च नान्तर्यामी,
अतद्धर्माभिलापात्—तयोरसंभावितधर्माभिलापात् । स्वभावत एव
सर्वस्य द्रष्टृत्वम्, सर्वस्य नियन्तृत्वं, सर्वस्यात्मत्वं, स्वतएवामृत-
त्वम् च तयोर्नसंभावनागंधमर्हति । एतदुक्तं भवति, यथास्मार्तम-
चेतनं, सर्वज्ञत्वनियंतृत्वसर्वात्मत्वादिकं नार्हति, तथा जीवोऽपि;
अतद्धर्मत्वादिति ।
सांख्य स्मृति प्रतिपाद्य प्रधान (माया) और शारीर जीवात्मा,
अन्तर्यामी नहीं हैं क्यों कि उन दोनों में वे विशेषतायें नहीं हैं जो कि
अन्तर्यामी के लिए वेदांत वाक्यों में कही गई हैं। स्वाभाविक ही सर्व-
दर्शन शक्ति, सर्व नियंत्रण शक्ति, सर्वात्मकता, और स्वाभाविक अमरता
का इन दोनों में नितान्त अभाव है । कथन यह है कि-जैसे कि प्रधान
अचेतन प्रकृति में सर्वज्ञत्व, नियंतृत्व सर्वात्मत्व आदि की अर्हता नहीं है
वैसे ही चैतन्य जीव में भी नहीं है, ये विशेषतायें उसमें भी नहीं हैं ।
अमीषां गुणानां परमान्वयः, प्रत्यगात्मनिव्यतिरेकश्च
सूत्रद्वयेन दर्शितः ।
उक्त विशेषताओं का परमात्मा में अन्वय तथा जीवात्मा में अभाव
दो सूत्रों में दिखलाया गया है ।
उभयेऽपिहिभेदेनैनमभिधीयते ।१।२।२१॥
उभये माध्यन्दिनाः काण्वाश्च, अन्तर्यामिणोनियम्यत्वेन
वागादिभिरचेतनैः समम् एनं, शारीरमपि विभज्याधीयते—“य
आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरोयमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य
आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति माध्य-
न्दिनाः; ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यादि काण्वाः परमात्मनियाम्य-
तया तस्माद् विलक्षणत्वेनैनमभिधीयत इत्यर्थः । अतोऽन्तर्यामी
[email protected]

"अक्षरात्परतः परः"

  • इति च सर्वस्मात्

Line 22:
विकारात् परभूतादक्षरादस्मात्परः क्षेत्रज्ञ समष्टि पुरुषः प्रति-
Let's check:

  • विकारात्
  • परभूतादक्षरादस्मात्परः
  • क्षेत्रज्ञ समष्टि पुरुषः प्रति-

Line 23:
पाद्यते ।

Line 24:
आथर्वणिक शाखा में कहा गया कि—"अब पराविद्या का व्याख्यान
Wait, look at line 24:
आथर्वणिक or आथर्वाणिक?
There is no aa-matra on थ. But on व: आथर्वणिक or आथर्वाणिक?
Wait, there is a dot or aa-matra?
Let's look: आ थ र्व णि क - no, wait, is there an aa-matra on थ or व?
Wait, look at line 24:
आ, थ, र्वा, णि, क - wait, look at 'र्वा': it has a vertical bar! So आथर्वाणिक!
Wait, in line 4: माध्यन्दिन
In line 9: माध्यन्दिन
In line 24: आथर्वाणिक

( ४३२ )
अतिसूक्ष्म और अव्यय है, उस भूतयोनि का धीर लोग दर्शन करते हैं।”
इसके बाद कहा गया कि-‘वह अक्षर से भी पर है।’
इस पर संशय होता है कि-अदृश्यत्व आदि गुण वाला पर अक्षर
से परतत्त्व कौन है, प्रकृति पुरुष अथवा परमात्मा? कह सकते हैं कि
प्रकृति पुरुष है, क्यों कि-“वह दीखते नहीं पर द्रष्टा है” इत्यादि में
चेतन धर्म सापेक्ष है पर यहाँ तो चेनन धर्म सापेक्ष नहीं है अपितु-
“पर अक्षर से भी पर है” इत्यादि में समस्त विकारों से परभूत अक्षर से
श्रेष्ठ देहाधिपति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है।
एतदुक्तं भवति रूपादिमत्स्थूलरूपाचेतनपृथिव्यादिभूतीश्रय
दृश्यत्वादिकं प्रतिषिध्यमानं पृथिव्यादि सजातीय सूक्ष्मरूपाचेतन-
मेवस्थापयति, तच्च प्रधानमेव। तस्मात्परत्वं च समष्टि पुरुषस्यैव
प्रसिद्धम्। तदधिष्ठितं च प्रधानं महदादि विशेषपर्यन्तं विकारजातं
प्रसूत इति तत्र दृष्टान्ता उपन्यस्यते “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च
यथापृथिव्यामोषधयः संभवंति, यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि
तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम्” इति ।
अ्रतोऽस्मिन्प्रकरणे प्रधान पुरुषानेव प्रतिपाद्येते इति ।
कथन यह है कि-रूपादिगुण विशिष्ठ स्थूल अचेतन पृथिव्यादि
भूतविषयक दृश्यत्वादि धर्म का प्रतिषेध कर पृथिव्यादि के समान सूक्ष्म
रूप जिस अचेतन का प्रतिपादन किया गया है, वह प्रधान (प्रकृति) का
ही प्रतिपादन है। उस प्रधान से पर समष्टि पुरुष ही प्रसिद्ध है। प्रधान,
उस पुरुष से अधिष्ठित होकर महत्तत्व से लेकर विशेष (स्थूल) तक
समस्त विकारो का प्रसव करती है। इस विषय मे दृष्टान्त भी दिया
गया है-‘जैसे ऊर्णनाभि (मकड़ी) स्वतः ही जाल की सृष्टि और सहार
करती है, वैसे ही पृथ्विी में वृक्षादिको की स्वाभाविक सृष्टि होती है तथा
जैसे पुरुष के शरीर में लोभ नख आदि स्वतः होते है, वैसे ही अक्षर से
विश्व होता है।’ इस दृष्टान्त से ज्ञात है कि-इस प्रकरण में प्रकृति
पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है।
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