श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४२४ )
निरुपाधिकानां तेष्वसंभवान्न परमात्मन इतरः छायादिः अक्षिपुरुषो
भवितुमर्हति । प्रतिबिम्बस्य तावत्पुरुषान्तर संनिधानायत्तत्वान्न
नियमेनावस्थानसंभवः । जीवस्यापि सर्वेन्द्रियव्यापारानुगुण्यत्वाय-
सर्वेन्द्रियकेन्द्रभूते स्थानविशेषे वृत्तिरिति चक्षुषि नावस्थानम् ।
देवतायाश्च ‘ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः' इति रश्मिद्वारेणा-
वस्थानवचनात् देशांतरावस्थितस्यापीन्द्रियाधिष्ठानोपपत्तेर्न चक्षु-
ष्यवस्थानं सर्वेषामेवैषां निरुपाधिकामृतत्वादयो न संभवन्त्येव ।
तस्मादक्षिपुरुषः परमात्मा ।
अमृतत्व आदि धर्म छायापुरुष आदि में संभव नहीं हैं, नेत्रों में
इन सबको नियमित स्थिति भी संभव नहीं है । परमात्मा के अतिरिक्त
ये सब अक्षिपुरुष नहीं हो सकते । सामने किसी व्यक्ति के हुए बिना
छाया तो पड़ नहीं सकती, इसलिए छायापुरुष की नेत्रों में नियमित
स्थिति संभव नहीं है । जीव की,