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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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। व-विषय (शुक्ति) का ही आवरण कर सकता है। विवादास्पद
अज्ञान, ज्ञान से निवत्र्त्य भी नहीं है, क्योंकि वह ज्ञान के विषय (ज्ञेय)
का आवरण नहीं करता। जो अज्ञान, ज्ञान द्वारा निवर्त्य होता है, वह
ज्ञान के विषय का आवरक होता है, जैसे शुक्ति आदि का अज्ञान।
घट आदि पदार्थों में जैसे ज्ञातृता नहीं रहती, वैसे ही ब्रह्म में भी ज्ञातृता
का अभाव है, इसलिये वह अज्ञान का आश्रय नहीं हो सकता। अज्ञान
कभी ब्रह्म को आवृत नहीं कर सकता, क्योंकि वह ज्ञान का विषय (ज्ञेय)
नहीं है। जो अज्ञान से आवृत होता है, वह निश्चित ही ज्ञान का विषय
होता है जैसे कि-शुक्ति। ब्रह्मविषयक अज्ञान ज्ञान से निवर्त्य नहीं है,
क्योंकि वह ज्ञान का विषय नहीं है जो अज्ञान, ज्ञान से निवर्त्य होता है,
वह निश्चित ही ज्ञान का विषय होता है जैसे कि शुक्ति। विवादास्पद
प्रमाणरूप ज्ञान कभी अपने प्रागभाव के अतिरिक्त, अज्ञानपूर्वक नहीं हो
सकता, क्यों कि वह, आपके अभिमत अज्ञान साधक, प्रमाण ज्ञान की
तरह, प्रमाण जन्य होता है।
ज्ञानं न वस्तुनो विनाशकम्, शक्तिविशेषोपबृंहण विरहे सति
ज्ञानत्वात् । यद्वस्तुनो विनाशकं तत् शक्ति विशेषोपबृंहितं ज्ञान-
मज्ञानं च दृष्टम्, यथेश्वरयोगिप्रभृतिज्ञानं, यथा च मुद्गरादि ।
भावरूपमज्ञानं न ज्ञानविनाश्यम्, भावरूपत्वात् घटादिवदिति ।
अथोच्येत-बाधक ज्ञानेन पूर्वज्ञानोत्पन्नानां भयादीनां विनाशो दृश्यते
इति । नैवम् नहि ज्ञानेन तेषां विनाशः क्षणिकत्वेन तेषां स्वयमेव
विनाशात् । कारणनिवृत्या च पश्चादनुत्पत्तेः । क्षणिकत्वं च तेषां
ज्ञानवदुत्पत्तिकारणसन्निधानएवोपलब्धेः अन्यथानुपलब्धेश्चाव-
गम्यते । अक्षणिकत्वे च भयादीनां भयादि हेतुभूतज्ञानसन्तताव-
विशेषेण सर्वेषां ज्ञानानां भयादुत्पत्ति हेतुत्वेनानेकभयोपलब्धि
प्रसंगाच्च ।
ज्ञान स्वभावतः किसी वस्तु का विनाशक नहीं होता, क्यों कि-
वह अन्यशक्ति की सहायता से रहित स्वतः सिद्ध है। जिससे वस्तु का
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विनाश होता है, वह चाहे ज्ञान हो या अज्ञान, निश्चित ही वह शक्ति
विशेष से उपबृंहित (बलप्राप्त) होता है, जैसे ईश्वर और योगियों का
ज्ञान या मुद्गर आदि। भाव पदार्थ घट आदि जैसे ज्ञान से विनाश्य
नहीं हैं, वैसे ही भावरूप अज्ञान भी, ज्ञान से विनाश्य नहीं है। यदि
कहो कि-बाधक ज्ञान की उपस्थिति में, बाधक ज्ञान की उत्पत्ति पूर्व के
भ्रम जन्य भय कम्पन आदि का विनाश देखा जाता है; सो ऐसी बात
नहीं है कि ज्ञान से भय आदि का विनाश होता है अपितु भय आदि तो
क्षणिक होते हैं, वे स्वतः ही विनष्ट हो जाते हैं, भय के कारण की निवृत्ति
हो जाने पर फिर भय आदि की उत्पति होती ही नहीं। ज्ञान की तरह
भय आदि भी, उत्पत्ति के कारण की स्थिति में ही रहते हैं, अनुपस्थिति
में नही, इसलिए उनकी क्षणिकता सहज ही अवगत हो जाती है। भय
आदि को यदि क्षणिक नहीं मानेंगे तो भय आदि का कारण मिथ्या ज्ञान
जब धारावाहिक रूप से चलता रहता है, तो सभी ज्ञानों को भय आदि
का हेतु मानना होगा, जिससे अनेक भय उपस्थित हो जावेंगे।
स्वप्रागभावव्यतिरिक्तवस्त्वन्तरपूर्वकमिति व्यर्थविशेषणो-
पादानेन प्रयोगकुशलताचाविष्कृता। अतोऽनुमानेनापि न भावरूपा-
ज्ञान सिद्धिः। श्रुतितदर्थापत्तिभ्यामज्ञानासिद्धिरनन्तरमेव वक्ष्येत।
मिथ्यार्थस्य हि मिथ्यैवोपादानं भवितुमर्हतीत्येतदपि “न विलक्षण-
त्वात् इत्यधिकरणन्यायेन परिह्रियते। अतोऽनिर्वचनीयाज्ञानविषया
न काचिदपि प्रतीतिरस्ति। प्रतीतिभ्रांतिबाधैरपि न तथाऽभ्यु-
पगमनीयम्। प्रतीयमानमेव हि प्रतीतिभ्रांति बाधविषयः। आभिः
प्रतीतिभिः प्रतीत्यन्तरेण चानुपलब्धामासां विषय इति न युज्यते
कल्पयितुम्।
भय को क्षणिक न मानने से अज्ञान के लिए किया गया “स्व
प्रागभाव वरत्वन्तर पूर्वक” यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा, केवल प्रयोग
कुशलता का नमूना मात्र रह जायगा इससे सिद्ध होता है कि, अनुमान
से अज्ञान के अस्तित्व की सिद्धि नहीं हो सकती। श्रुति और अर्थापत्ति
प्रमाण भी उसे सिद्ध नहीं कर सकते, इसे आगे बतलावेंगे। मिथ्या पदार्थ
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के उपादान भी मिथ्या होते हैं, इस कथन को भी "न विलक्षणत्वात्" सूत्र
के अनुसार परिष्कृत करेगे अनिर्वचनीय अज्ञान की प्रतीति किसी भी
प्रकार नही हो सकती। केवल प्रतीति या भ्रांति की बाधा से भी अज्ञान
को स्वीकारा नही जा सकता क्यों कि जो वस्तु, प्रतीति या भ्रांति की
बाधा के योग्य होती है, वह प्रतीयमान और विशेषोल्लेखनीय होती है।
प्रतीति, भ्रांति या और भी किसी भी प्रकार की प्रतीति से, किसी ऐसी
वस्तु की कल्पना नही की जा सकती जिसके प्रकाश की उपलब्धि न
होती हो।
शुक्त्यादिषु रजतादि प्रतीतेः, प्रतीतिकालेऽपि तन्नास्तीति
बाधेन चान्यस्यान्यथामानायोगाच्च सदसदनिर्वचनीयमपूर्वमेवेदं
रजतं दोषवशात् प्रतीयत इति, कल्पनीयमितिचेन्न, तत्कल्पनायमपि
अन्यस्य अन्यथा भानस्य अवर्जनीयत्वात् अन्यथाभानाभ्युपगमादेव
ख्यातिप्रवृत्तिबाधभ्रमत्वानां उपपत्ते रत्यन्तापरिदृष्टाकारणकवस्तु
कल्पनायोगात् कल्प्यमानं हि इदमनिर्वचनीयम् । न तावदनिर्वनीय
मिति प्रतीयते, अपितु परमार्थ रजतमित्येव । अनिर्वचनीयमित्येव
चेत्, भ्रांतिबाधयोः प्रवृत्ते रप्यसंभवः । अतोऽन्यस्यान्यथाभानविरहे
प्रतीतिवृत्तिबाधभ्रमत्वानाम्रनुपपत्ते`स्तस्यापरिहार्यत्वाच्च, शुक्त्या-
दिरेव रजताद्याकारेण अवभासते, इति भवताभ्युपगंतव्यम् ।
शुक्ति आदि में रजत आदि की प्रतीति के समय ही "यह वह नहीं
है" ऐसा बाधक ज्ञान हो जाता है, क्योकि-अन्य वस्तु का अन्य वस्तु में
अन्य प्रकार का ज्ञान हुआ नहीं करता। सद् असद् अनिर्वचनीय अपूर्व को,
रजत माना जाता हो अथवा रजत के रूप में इसकी कल्पना की जाती
हो, सो बात नहीं है; अनिर्वचनीय कल्पना में भी अन्य वस्तु में अन्यथा
ज्ञान अनिवार्य होता है; अन्यथा ज्ञान के स्वीकारने से ही, ख्याति,
प्रवृत्ति, बाध, भ्रम आदि की उपपत्ति होती है, जिससे नितान्त अदृष्ट
वस्तु की कल्पना होती है जिसके फलस्वरूप ही यह कल्पित अनिर्वचनी
यता होती है। उस समय वह अनिर्वचनीय रूप से प्रतीत नही होती
अपितु वास्तविक रजत के रूप में ही उसकी प्रतीति होती है। यदि
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अनिर्वचनीय प्रतीति हो तो, भ्रांति और बाधा का प्रश्न ही नहीं उठता ।
भ्रमस्थल में अन्यथा भान न होने से तथा प्रतीति, वृत्ति, बाधा, भ्रम
आदि की अनुपपत्ति से अनिवार्य शुक्ति ही, रजत की आकृति में अवभा-
सित होती है, यह तो आपको भी मानना पड़ेगा ।
ख्यात्यन्तरवादिनां च सुदूरमपि गत्वाऽन्यथाभासोऽवश्याश्र-
णीयः, असत्ख्याति पक्षे सदात्मना, आत्मख्यातिपक्षे अर्थात्मना,
अख्यातिपक्षेऽपि अन्यविशेषणं अन्यविशेषणत्वेन, ज्ञानद्वयमेकत्वेन
च, विषयासद्भावपक्षेऽपि विद्यमानत्वेन ।
अन्यान्य ख्याति वादियों को भी अनेक तर्कवितर्कों के बाद अन्त में
अन्यथावभास (अन्यथा ख्याति) का आश्रय लेना पड़ता है । वह अवभास
असत् ख्याति के पक्ष में सत् स्वरूप, आत्म ख्याति के पक्ष में ज्ञेय पदार्थ
स्वरूप, अख्याति के पक्ष में भी अन्यविशेषण का अन्यविशेषण के रूप तथा
दो ज्ञानों की एकता के रूप, एवं ज्ञेयविषय का अस्तित्व न स्वीकारने
वालों के पक्ष में ज्ञेयवस्तु की विद्यमानता के रूप से होता है ।
किंच अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्रजातमिति वदता तस्य जन्म-
कारणं वक्तव्यम् , न तावत् प्रतीतिः, तस्यास्तद् विषयत्वेन तदुत्पत्तेः
प्रागात्मलाभायोगात् । निर्विषया जाता तदुत्पाद्य तदेव विषयी
करोतीति महतामिदमुपपादनम् । अथेन्द्रियादिगतो दोषः, तन्न
तस्य पुरुषाश्रयत्वेनार्थगतकार्यस्योत्पादकत्वायोगात् । नापीन्द्रियाणि
तेषां ज्ञानकारणत्वात् । नापि दुष्टानीन्द्रियाणि, तेषामपि स्वकार्यभूते
ज्ञान एवहि विशेषकरत्वम् , अनादिमिथ्याज्ञानोपादानत्वं तु
पूर्वमेव निरस्तम् ।
जो लोग “अनिर्वचनीयमपूर्वरजतमत्र जातम्” ऐसा कहते हैं उन्हें
वैसी रजतोत्पत्ति का कारण बतलाना होगा । वे रजत की प्रतीति को
तो रजतोत्पादक कही नहीं सकते, क्योंकि-उत्पत्ति की पूर्व उसकी प्रतीति
संभव नहीं है । प्रतीति पहले निर्विषयक होती है, बाद में रजतोत्पत्ति
करके उस रजत को अपना विषय बनाती है ऐसा तो बड़े लोग ही कह

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सकते है। चक्षु आदि इन्द्रियगत दोष, रजतोत्पादक हों, ऐसा भी समझ
में नहीं आता, क्योंकि वह द्रष्टा पुरुष के आश्रय से ही हो सकता है, किसी
वस्तु में किसी अन्य वस्तु को पैदा कर देने की सामर्थ्य दृष्टा पुरुष में तो
होती नहीं। केवल इन्द्रियों में भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है, वे तो केवल
ज्ञानोत्पादक हो होती है। विकृत इन्द्रियाँ भी नई वस्तु पैदा नहीं कर
सकती, वे तो अपने कार्य (ज्ञान) में ही वैचित्र्य प्रतीति कराती हैं।
अनादिमिथ्या ज्ञान तो ऐसे उत्पादन का उपादान हो नहीं सकता, ऐसा
पहिले भी कह चुके हैं।
किञ्च—अपूर्वमनिर्वचनीयमिदंवस्तुजातं रजतादिबुद्धि शब्दा-
भ्यां कथमिव विषयी क्रियते, न घटादि बुद्धिशब्दाभ्याम् ? रजता-
दिसादृश्यादिति चेत् तर्हि तत्सदृशमित्येवप्रतीति शब्दौस्याताम् ।
रजतादिजातियोगादिति चेत्, सा किं परमार्थ,भूता अपरमार्थभूता
वा ? न तावत् परमार्थभूता, तस्या अपरमार्थान्वयायोगात् ।
नाप्यपरमार्थभूता, परमार्थान्वियायोगात् । अपरमार्थे परमार्थबुद्धि
शब्दयो र्निर्वाहकत्वायोगाच्चेत्यलमपरिणत कुतर्क निरसनेन ।
एकबात और हे – जब जागतिक सभी वस्तुएं अनिर्वचनीय हैं तो
सीप मे रजत शब्द का ही प्रयोग क्यों किया जाता है तथा रजत प्रतीति
ही क्यों होती है सीप को घट, प्याला आदि क्यों नहीं कहा जाता, घट
क्यों नहीं समझा जाता ? यदि कहो कि – रजत आदि के सादृश्य से
ऐसा होता है; तो यह कहना चाहिए कि “यह उसके समान है”
यदि रजत आदि जाति के योग से उक्त प्रकार की प्रतीति होती है, तो
वह वास्तविक होती है या अवास्तविक ? वास्तविक तो हो नहीं सकती
क्योंकि – उसे असत्य नहीं कहा जा सकता। अवास्तविक भी नहीं हो
सकती, क्योकि – उसे फिर सत्य नहीं कहा जा सकता । अयथार्थ वस्तु
में यथार्थ साधन की क्षमता भी नहीं होती । अस्तु तत्त्वहीन कुतर्कों के
निराकरण से अब विरत होते हैं ।
अथवा—यथार्थ सर्वविज्ञानमिति वेदविदांमतम्, श्रुतिस्मृ-
तिभ्यः सर्वस्य सर्वात्मत्वप्रतीतिः । बहुस्यामिति संकल्प पूर्वसृष्ट्-
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यदि उपक्रमे, तासां त्रिवृतमेकैकामिति श्रुत्यैव चोदितम्। त्रिवृत्-
करणमेवंहि प्रत्यक्षेणोपलभ्यते, यदग्नेरोहितं रूपं तेजसस्तद
पामपि शुक्लं कृष्णं पृथिव्याश्चेत् अग्नावेव त्रिरूपता, श्रुत्यैव
दर्शितात्तस्मात् सर्वे सर्वत्र संगताः पुराणे चैवमेवोक्तं वैष्णवे सृष्ट्-
युपक्रमे। नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं बिना, नाशक्नुवन्
प्रजास्स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः। समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्पर
समाश्रयः, “महदाद्या विशेषान्ता हि अण्डम्” इत्यादिना
ततः। सूत्रकारोऽपिभूतानां त्रिरूपत्वं तथाऽवदत् , “त्र्यात्मकत्वात्तु
भूयस्त्वात् ” इति तेनाभिधाभिदा। सोमाभावे च पूतीक ग्रहणं
श्रुति चोदितम्, सोमावयवसद्भावाद इति न्यायविदो विदुः।
ब्रीह्यभावे च नीवार ग्रहणं व्रीहिभावतः, तदेव सदृशं तस्य,
यत्तद्द्रव्यैकदेशभाक्। शुक्त्यादौ रजतादेश्च भावः श्रुत्यैव बोधितः
रूप्यशुक्त्यादि निर्देशभेदो भूयस्त्वहेतुकः। रूप्यादिसदृशश्चायं
शुक्त्यादिरुपलभ्यते, अतस्तस्यात्र सद्भावः प्रतीतिरपि निश्चितः।
कदाचिच्चक्षुरादेस्तु दोषाच्छुक्त्यंशवर्जितः, रजतांशो गृहीतोऽतो
रजतार्थी प्रवर्त्तते। दोषहानौतु शुक्त्यंशे गृहीते तन्निवर्त्तते, अतोयथार्थं
रूप्यादिविज्ञानं शुक्तिकादिषु। बाध्यबाधकभावोऽपि भूयस्त्वेनो-
पपद्यते, शुक्तिभूयस्त्ववैकल्यसाकल्य ग्रहरूपतः। नातो मिथ्यार्थं
सत्यार्थविषयत्वनिबन्धनः एवं सर्वस्य सर्वत्वे व्यवहार
व्यवस्थितिः।
वेदवेत्ता विद्वानों (बोधायन, नाथमुनि, यामुनाचार्य और द्रविडा
चार्य) का मत है कि—श्रुति स्मृति शास्त्रानुसार सभी वस्तुएं ब्रह्मात्मक
होने से यथार्थ सत्य हैं। सृष्टि के उपक्रम में सृष्टा ने जो “बहुस्यां” और
“तासांत्रिवृतमेकैकाम्” का संकल्प किया था उसी से जगत् की ब्रह्मात्म-
कता की पुष्टि होती है। त्रिवृत्करण और परस्पर मिश्रण का भाव
प्रत्यक्ष दीखता है, अग्नि की रक्तिमा, जल की शुभ्रता तथा पृथिवी की

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श्यामता उसी के उदाहरण हैं। इसी प्रकार एक ही अग्नि में भी तीन रूप
देखें जाते है। श्रुति ने बतलाया है, कि सारे भूत सभी में मिश्रित है।
विष्णु पुराण के सृष्टि प्रकरण मे भी बतलाया गया कि विभिन्न शक्ति
वाले भूत बिना एक साथ मिले प्रजा की सृष्टि करने मे असमर्थ है।
सारे ही भूत परस्पर मिलकर एक दूसरे के आश्रय से, महत्तत्व से लेकर
अंतिम स्थूल ब्रह्माण्ड तक की सृष्टि करते है। “त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वाद्”
सूत्र में सूत्रकार भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।
वेदों में सोमलता के अभाव में पुतीक ग्रहण का विधान बतलाया
गया है, मीमांसको का मत है कि, पुतीक में सोमलता अंश विद्यमान
है इसीलिए उसके ग्रहण का विधान है। इसी प्रकार व्रीहि के अभाव में,
व्रीहि अंश युक्त नीवार के ग्रहण का विधान है।
शुक्ति आदि पदार्थ मे जो रजत आदि का भ्रम होता है, वह भी
रजतांश के सद्भाव के कारण ही है, यह श्रुतिसम्मत विचार है। बाहुल्य
के कारण रजत की, शुक्ति से पृथक प्रतीति होती है। शुक्ति में जो रजत
की सदृशता दीखती है, उससे ही शुक्ति मे रजतांश का सद्भाव निश्चित
होता है। कभी चक्षु इन्द्रिय के दोष के कारण शुक्ति का शुक्तिभाव
तिरोहित हो जाता है, चक्षु केवल रजतांश को ग्रहण करते है, जिसके
फलस्वरूप हम उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उद्यत होते हैं। उक्त
दृष्टि दोष के नष्ट हो जाने पर शुक्ति का शुक्तित्व सुस्पष्ट परिलक्षित
होने लगता है, तब हताश होकर लौट आते है। इस प्रकार रजत की
होने वाली प्रतीति यथार्थ ही है, केवल शुक्ति अंश के आधिक्य के कारण
बाध्य बाधक व्यवस्था होती है। जब शुक्ति के लघु अंश रजतभाव का
ग्रहण होता है उसे ही भ्रम कहना चाहिए, जब उसके बहुलांश का ग्रहण
होता है, उसे सत्य कहते है, प्रथम ज्ञान बाध्य और द्वितीय ज्ञान बाधक
है। मिथ्या या असत्य की प्रतीति से बाध्य बाधक भाव होता हो सो
बात नहीं है। हर वस्तु हर में मिश्रित है ऐसी व्यवहार की व्यवस्था
करना समीचीन है।
स्वप्ने च प्राणिनां पुण्यपापानुगुणं भगवतैव तत्तत्पुरुषमात्रा-
नुभाव्याः तत्तत्कालावसानाः तथाभूताश्चार्थाः सृज्यन्ते तथा हि
श्रुति स्वप्न विषय “न तत्र रथाःन रथयोगाः न पंथानो भवंति,
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अथ रथान् रथयोगान्पथः सृजते । न तत्राऽनंदा मुदः प्रमुदो भवंति,
अथानन्दान्मुदः प्रमुदः सृजते । न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो
भवंति, अथ वेशांतान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते । सहि कर्त्ता ”
इति यद्यपि सकलेतरपुरुषानुभाव्यतया तदानीं न भवंति, तथाऽपि
तत्तत्पुरुषमात्रानुभाव्यतया तथाविधानर्थान् ईश्वरः सृजति, सहि
कर्त्ता । तस्य संकल्पस्याश्चर्यशक्तेस्तथाविधं कर्तृत्वं संभवतीत्यर्थः ।
स्वप्नावस्था में जगत्पति भगवान् ही प्राणियों के पुण्यपाप के
अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के भोगोपयोगी विषयों और तात्कालिक पदार्थों
की सृष्टि करते हैं । वैसी ही स्वप्न विषयक श्रुति भी है—"न वहाँ रथ,
न घोड़ा, न मार्ग ही रहता है, रथ घोड़े आदि की सृष्टि करते हैं, वहाँ
आनन्द, मोद, प्रमोद नहीं रहता, आनन्द आदि की सृष्टि करते हैं, वहाँ
तालाब, तलैया, बावली नहीं होते, तालाब आदि की सृष्टि करते हैं,
वही संसार के कर्त्ता हैं ।" यद्यपि मनुष्य के सारे ही अनुभाव्य पदार्थ
उस समय नहीं रहते, परन्तु पुरुष की अर्हतानुसार अनुभाव्य पदार्थों को
जो सृष्टि करते हैं, वही जगत के स्वामी हैं, वे ही सत्यसंकल्प, अनन्त-
शक्ति सम्पन्न हैं, उन्हीं से ऐसी आश्चर्यमयी क्रिया संभव भी है।
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः तदेव
शुक्रं तद्ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते, तस्मिंल्लोकाश्रिताः सर्वे तदु
नात्येति कश्चन" इति च । सूत्रकारोऽपि “संध्ये सृष्टिराह हि”—
“निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च" इति सूत्रद्वयेन स्वाप्नेष्वर्थेषु जीवस्य
स्रष्टृत्वमाशंक्य, “मायामात्रं तु कात्स्न्येनानभिव्यक्त स्वरूपत्वात् ”
इत्यादिना न जीवस्य संकल्पमात्रेण स्रष्टृत्वमुत्पद्यते । जीवस्य
स्वाभाविकसत्यसंकल्पत्वादेः कृत्स्नस्य संसारदशायामनभिव्यक्त-
स्वरूपत्वात् , ईश्वरस्यैव तत्तद् पुरुष मात्रानुभाव्यतया आश्चर्यं भूता
सृष्टिरयम् । “तस्मिंल्लोकाश्रितास्सर्वे तदुनात्येति कश्चन् ” इति
परमात्मैव तत्र स्रष्टेत्यवगम्यते, इति परिहरति। अपवलग्वादिषु

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शयानस्य स्वप्नसद्दशः स्वदेहेनैव देशान्तरगमनराज्याभिषेकशिरश्छे-
दादयश्च पुण्यपापफलभूताश्शयान देहसरूपसंस्थान देहान्तर
सृष्ट्योपपद्यन्ते ।
"मनुष्य के सोने पर वह जागता हुआ, पर्याप्त रूप से काम्यपदार्थों
का निर्माण करता है, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही अमृत है, साराजगत
उसी के आश्रित है, कोई भी उसे अतिक्रमण नहीं कर सकता ।" इत्यादि
भी उक्तमत की ही पुष्टि करते हैं । सूत्रकार भी "संध्ये सृष्टिराहहि"
निर्मातारंपुत्रादयश्चैके" इत्यादि दो सूत्रों से स्वप्न पदार्थों की सृष्टि में
जीव विषयक आशंका करके— "मायामात्र" इत्यादि सूत्र से जीव की
संकल्प रहित सृष्टि क्रिया का निराकरण करते है। संसार दशा में जीव
की सत्य संकल्पता आदि विशेषताये जब अव्यक्त रहती है, तब स्वप्न
सृष्टि कैसे संभव है यह आश्चर्यमयी सृष्टि तो सत्य सकल्प ईश्वर की ही
कृति है "सारे लोक इसी के आश्रित रहते है, इसका अतिक्रमण नहीं कर
सकते इस वाक्य से स्वप्न सृष्टि परमात्मा की ही निश्चित होती है। इस
दृष्टान्त से सूत्रकार जीव संबंधी आशका का समाधान करते हैं घर में
सोया हुआ व्यक्ति, देशांतरगमन, राज्याभिषेक, शिरच्छेदन आदि
विचित्रताओं की प्रतीति करता है। पाप पुण्य के फल भोग के लिए,
तात्कालिक एक विशेष निर्मित देह से सारी क्रियायें होती हैं ।
पीतशंखादौ तु नयनवर्तिपित्तद्रव्यसंभिन्ना नायनरश्मयः शंखादि
भिः संयुज्यन्ते । तत्र पित्तगत पीतिमाभिभूतः शंखगत शुक्लिमा न
गृह्यते । अतः सुवर्णानुलिप्तशंखवत् पीतः शंख इति प्रतीयते । पित्त
द्रव्यं तद्गत पीतिमा चातिसौक्ष्म्यात् पार्श्वस्थैः न गृह्यते । पित्तो-
पहतेन तु स्वनयन निष्क्रान्ततयाऽतिसमीप्यात् सूक्ष्मपि गृह्यते । तद्
ग्रहण जनितसंस्कार सचिव नायनरश्मिभिः दूरस्थमपि गृह्यते ।
पीतशंख की जो प्रतीति होती है, उसमें नयनगत पित्त से नयन रश्मि
याँ मिश्रित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप श्वेतशंख पीला दीखता है,
वहाँ पित्तजन्य पीतिमा से अभिभूत शखगत शुक्लिमा की प्रतीति नहीं
हो पाती। इसलिए सुवर्ण रंजित शंख सा वह शंख पीला दीखता है।
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( १७३ )
अतिसूक्ष्म नयनगत पित्तजन्य पीतिमा निकटस्थ व्यक्ति को भी नहीं
दीखती, परंतु पित्ताक्रान्त व्यक्ति को वह अति निकट से परिलक्षित हो
जाती है, क्योंकि उसके नेत्रों से ही वह सदा निकलती रहती है । इसी
प्रकार दूरस्थ शंख भी नयन की पीत रश्मियों के द्वारा पीला अवभासित
होता है ।
जपाकुसुम समीपवर्तिस्फटिकमणिरपितत्प्रभाभिभूततया रक्त
इति गृह्यते । जपाकुसुमप्रभाविततापिस्वच्छद्रव्य संयुक्ततया स्फुटत-
रमुपलभ्यते, इत्युपलब्धिव्यवस्थाप्यमिदम् ।
मरीचिका जलज्ञानेऽपि तेजः पृथिव्योरप्यम्बुनोविद्यमानत्वात्
इन्द्रियदोषेण तेजः पृथिव्योरग्रहणादृष्टवशाच्चाम्बुनोग्रहणा-
द्यथार्थत्वम् ।
अलातचक्रेऽप्यलातस्यद्रुततरगमनेन सर्वदेशसंयोगादंतराला
ग्रहणात्तथा प्रतीतिरूपपद्यते । चक्रप्रतीतावप्यन्तरालाग्रहणपूर्वकतत्त-
द्देशसंयुक्ततद्वस्तु ग्रहणमेव । क्वचिदंतरालाभावात् अन्तराला-
ग्रहणम् क्वचिच्छैघ्यादग्रहणमिति विशेषः । अतस्तदपि यथार्थम् ।
दर्पणादिषु निजमुखादि प्रतीतिरपि यथार्था । दर्पणादि प्रति-
हतगतयो हि नायनरश्मयो दर्पणादिदेशग्रहणपूर्वकं निजमुखादिगृह्णं-
ति तत्रापि अतिशैघ्यादन्तरालाग्रहणात्तथा प्रतीतिः ।
जपाकुसुम की निकस्थ स्फटिकमणि, उसकी कांति से अभिभूत होकर
रक्तवर्ण की दिखलाई देती है । जपाकुसुम की प्रभा चारों ओर फैलती
हुई, स्वच्छ द्रव्य से मिश्रित होकर स्पष्ट रूप से देखी जाती है, इसकी
प्रतीति का यही स्वरूप है, जो कि यथार्थ है ।
मरीचिका में जो जल की प्रतीति होती है, वह भी तेज और पृथ्वी
में जो जलीय अंश है उसी का भान होने से होती है, इन्द्रियगत दोष के
कारण उस समय पृथिवी और तेजीय अंशों की प्रतोति नहीं हो पाती
इसलिए यह ज्ञान भी यथार्थ है ।
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अलातचक्र की जो चक्राकार प्रतीति होती है, उससे मध्यवर्ती अवकाश
की प्रतीत न होने का कारण, चक्र की तेज चाल है, इसलिए चक्राकार
प्रतीति भी असत्य नहीं है।
दर्पण, जल आदि में अपने मुख आदि की प्रतीति भी यथार्थ है।
दर्पण पर पड़ने वाली नयन रश्मियों के प्रकाश से मुखाकृति की प्रतीति
होती है; मुख और दर्पण के मध्यवर्ती अन्तराल और रश्मियों के त्वरित
विक्षेप के कारण कभी-कभी वैसी प्रतीति नहीं भी होती ।
दिङ्मोहे अपिदिगन्तरस्यास्यां दिशि विद्यमानत्वात् अदृष्टवशे-
नैतद्दिगंश वियुक्तो दिगन्तरांशो गृह्यते । अतो दिगन्तरप्रतीतिर्य
थार्थैव ।
द्विचन्द्रज्ञानादावपि अंगुल्यवष्टम्भ तिमिरादिभिः नयनतेजो-
गतिभेदेन सामाग्री भेदात् सामग्रीद्वयमन्योन्यानिरपेक्षं चन्द्रग्रहण
द्वयहेतुर्भवति । तत्रैका सामग्री स्वदेशविशिष्टं चन्द्रं गृह्णति
द्वितीयातु किञ्चित् वक्रगतिश्चन्द्र समीपदेशग्रहणपूर्वकं चन्द्रं स्वदेश
वियुक्तं गृह्णाति । अतः सामग्रीद्वयेन युगपद्देशद्वयविशिष्ट चन्द्रं
ग्रहणे ग्रहणभेदेन ग्राह्याकारभेदादेकत्वग्रहणाभावाच्च द्वौ चन्द्राविति
भवति प्रतीतिविशेषः । देशान्तरस्य तद्विशेषणत्वं, देशान्तरस्य
च, अगृहीत स्वदेशचंद्रस्य च निरन्तर ग्रहणेन भवति । तत्र सामग्री
द्वित्वं पारमार्थिकम् । तेन देशद्वयविशिष्ट चन्द्रग्रहणद्वयं च पारमा-
र्थिकं । ग्रहणद्वित्वेन चन्द्रस्यैव ग्राह्याकार द्वित्वं च पारमार्थिकम् ।
तत्रविशेषणद्वयविशिष्ट चन्द्रग्रहणद्वयस्यैक एव चन्द्रोग्राह्य इति
ग्रहणे प्रतिज्ञानवत् केवल चक्षुः सामर्थ्याभावात् चाक्षुषज्ञानं तथै-
वावतिष्ठते । द्वयोश्चक्षुषोरेक सामग्र्यन्तर्भावेऽपि तिमिरादिदोष-
भिन्नं चाक्षुषं तेजः सामग्रीद्वयं भवति इति कार्यकल्प्यम्। अपगते

( १७५ )
तु दोषे स्वदेशविशिष्टस्य चन्द्रस्यैकग्रहण वेद्यत्वादेकश्चन्द्रः इति
भवति प्रत्ययः। दोषकृतं तु सामग्री द्वित्वं तत्कृतं ग्रहणद्वित्वं; तत्कृतं
ग्राह्याकार द्वित्वं चेति निरवद्यम् ।
दिग्भ्रम में भी, भ्रांत दिशा का, अन्यान्य दिशाओं से संबंध होने के
कारण, केवल मात्र एक ही दिशा का जो ज्ञान होता है, वह भी यथार्थ
ही है, क्योंकि ठीक से न देख पाने के कारण गन्तव्य दिशा की ओर न
जाकर दूमरी दिशा की ओर भटकना हो जाता है ।
आँख पर अंगुली रखने से चाक्षुष रश्मियाँ दो भागों में विभक्त हो
जाती हैं, जिससे दो चन्द्रो का भान होता है, रश्मियों का एक भाग तो
ठीक चन्द्रमा के सामने पड़ता है, दूसरा भाग तिरछा होकर कुछ दूर
दूसरे चन्द्र को देखता है, इस प्रकार दो चन्द्रों की प्रतीति होती है।
नेत्र रश्मियाँ हैं तो सत्य ही, इसलिए उनके द्वारा स्वतंत्र रूप से जो दो
चन्द्र देखे जाते हैं, वह प्रतीति भी यथार्थ ही है प्रत्यभिज्ञा में केवल नेत्र
ही ज्ञान के साधन नहीं होते, अपितु पूर्व संस्कार भी अपेक्षित होता है ।
दो चन्द्रों की भिन्न प्रतीति करते हुए भी, जो एक चन्द्र का निश्चित ज्ञान
बना रहता है, वह पूर्वसंस्कारजन्य ही रहता है । दोनों नेत्र एक ही कार्य
करते है, फिर भी चाक्षुष तेज में तिमिरादि (रोगविशेष) के दोष से
'त्रों के कार्य में विभिन्नता आ जाने के कारण भी दो चन्द्रों की प्रतीति
होती है, दोष के ज्ञान हो जाने पर सही अवगति होती है, तब दो के बजाय
एक ही चन्द्र प्रतीत होने लगता है । दोष के कारण ही, साधन मैं द्वैत
होता है, साधन द्वैत से ज्ञान में द्वैत होता है और उनके अनुसार चन्द्र
दो प्रतीत होते हैं । इनसे ज्ञात होता है, कि उक्त द्वैत प्रतीति यथार्थ है ।
अतः सर्वविज्ञानजातं यथार्थमिति सिद्धम्। ख्यात्यंतराणां
दूषणानि तैस्तैर्वादिभिरेव प्रपंचितानीति न तत्र यत्नः क्रियते ।
अथवा किमनेन बहुनोपपादनप्रकारेण । प्रत्यक्षानुमानागमाख्यं
प्रमाणजातमागम्यं च निरस्तनिखिलदोषगंधमनवधिकातिशयसंख्ये-
यकल्याणगुणगणं सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं परंब्रह्माभ्युपगच्छतां किं
न सेत्स्यति । किं नोपपद्यते । भगवताहि परेणब्रह्मणा क्षेत्रज्ञपुण्य-
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( १७६ )
प.पानुगु तद् ग्यतयायाखिल जा त् सृजता सुखदु.खोपेक्षाफलानु-
भवानुभाव्याः पदार्थाः सर्वसाधारणानु..व विषयाः, केचन तत्पुरुष-
मात्रानुभवविषयाः तत्तत्कालावसानाः तथातथाऽनुभाव्याः सृज्यन्ते ।
तत्र बाध्यबाधकभावः सर्वानुभवविषयतया तद्रहिततया चोपपद्-
यत इति सर्वं समंजसम् ।
उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध हो चुका कि प्रतीयमान समस्त जगत यथार्थ
है। ख्यातियों में जो दोष है, वे स्वयं ख्यातिवादियों द्वारा परस्पर निरा-
कृत हो चुके है, उसके लिए हमने प्रयास नही किया। बहुत अधिक
समर्थन की चेष्टा से कोई विशेष लाभ भी नही है। जो लोग, प्रत्यक्ष,
अनुमान और आगम (शास्त्र) प्रमाण मानते है तथा समस्त दोषों से
रहित—, न्यूनाधिक भावरहित—असंख्य-कल्याणमयगुण विभूषित—सत्य-
संकल्प—सर्वज्ञ-आदि गुण विशिष्ट परब्रह्म का अस्तित्व भी स्वीकारते हैं,
उनकी दृष्टि में तो कुछ भी परिहार्य और असंगत नहीं है। परब्रह्म
भगवान्—जीव के पाप पुण्य के अनुसार, सुख दुःखों से अपेक्षित फलवाले
जिन जीवोपभोग्य पदार्थों का सर्जन करते हैं; उनमें कुछ सर्वसाधारण के
अनुभव के योग्य, कुछ व्यक्ति विशेष के अनुभव के योग्य, एवं कुछ विशेष
समय में अनुभव योग्य होते हैं। वे सृष्ट पदार्थ परस्पर बाध्य बाधक
भाव से सर्वानुभूतविषयक और व्यक्ति विशेष के अनुभव विषयक होने से
उपपन्न और सुसंगत होते हैं।
यत् पुनः सदसदनिर्वचनीयमज्ञानं श्रुतिसिद्धमिति, तदसत् ।
“अनृतेन हि प्रत्यूढाः” इत्यादिश्वनृतशब्दस्यानिवर्चनीयानभिधा-
यित्वात् । ऋतेतरविषयो हि अनृत शब्दः । ऋतमिति कर्म वाचि ।
“ऋतं पिबन्तौ ” इति वचनात् । ऋतं कर्मफलाभिसंधिरहितं, परं
पुरुषााराधानवेषं तत्प्राप्तिफलम् । अत्र तद्व्यतिरिक्तं संसारिकफलं
कर्मानृतं ब्रह्म प्राप्ति विरोधि” एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति अनृतेन
हि प्रत्यूढाः” इति वचनात् ।
और जो—सदसद् अनिर्वचनीय अज्ञान को श्रुति संम्मत बतलाया,
वह भी असंगत बात है। “अनृतेन हि प्रत्यूढा.” वाक्य में प्रयुक्त “अनृत”

( १७७ )
शब्द अनिर्वचनीयता का बोधक नहीं हैं। “अनृत” शब्द तो “ऋत” से
अतिरिक्त विषय का बोधक है। “ऋत” शब्द कर्मवाची है, “ऋतं-
पिबन्तौ” वाक्य से इस अर्थ की प्रतीति होती है “ऋत” अर्थात् कर्मफल
की अभिसंधि (शर्त) रहित, भगवत् प्राप्ति साधक, भगवदाराधन रूप
कर्म भी “ऋत” शब्द का वाच्यार्थ है। उससे भिन्न, सकाम सांसारिक
फल वाला कर्म “अनृत” है, जो कि--ब्रह्मप्राप्ति में बाधक है। “इस
ब्रह्मलोक को प्राप्त नहीं करते, जो कि--अनृत (सकाम कर्म) से आवृत
हैं “इस वाक्य से उक्त अर्थ की ही प्रतीति होती है।
“नासदासीन्नोसदासीत्” इत्यत्रापि सदसच्छब्दौ चिदचिद्
व्यष्टि विषयौ। उत्पत्तिवेलायां सत्यच्छब्दाभिहितयोश्चिदचिद्
व्यष्टिभूतयोः वस्तुनोऽपि अकाले अचित्समष्टिभूते तमः शब्दाभि-
धेये वस्तुनि प्रलय प्रतिपादनपरत्वात् अस्य वाक्यस्य। नात्र
कस्यचित् सदसदनिर्वचनीयतोच्यते, सदसतोः कालविशेषे असद्-
भावमात्र वचनात्। अत्रतमः शब्दाभिहितस्य अचित्समष्टित्वं
श्रुत्यन्तरादवगम्यते– “अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरं तमसि लीयते”
इति। सत्यम् तमः शब्देनाचित् समष्टिरूपायाः प्रकृतेः सूक्ष्मावस्थो-
च्यते। तस्यास्तु “मायां तु प्रकृतिं विद्यात्” इति मायाशब्देनाभिधा-
नादनिर्वचनीयत्वमिति चेत् , नैतदेवम् , मायाशब्दस्यानिर्वचनीयवा-
चित्वं न दृष्टं इति। मायाशब्दस्य मिथ्यापर्यायत्वेनानिर्वचनीयवा-
चित्वमिति चेत् , तदपि नास्ति, नहि सर्वत्र मायाशब्दो मिथ्या
विषयः। आसुरराक्षसशास्त्रादिषु सत्येष्वेव मायाशब्द प्रयोगात्।
यथोक्तम्–“तेन मायासहस्रं तच्छम्बरस्याऽशुगामिना, बालस्य
रक्षतादेहमैकैकश्येनसूदितम्” इति। अतोमायाशब्दो विचित्रा-
र्थसर्गकराभिधायी। प्रकृतेश्च मायाशब्दाभिधानं विचित्रार्थ
सर्गकरत्वादेव। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया
सन्निरुद्धः “इति मायाशब्दवाच्यायाः प्रकृतेर्विचित्रार्थसर्गकरत्वं
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दर्शयति । परं पुरुषस्य च तद्वत्तामात्रेण मायित्वमुच्यते, नाज्ञत्वेन
जीवस्यैव हि मायया निरोधः श्रूयते । “तस्मिंश्चान्यो मायया
सन्निरुद्धः ” इति, “अनादिमायया सुप्तोयदा जीवः प्रबुध्यते”
इति च । “इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते” इत्यत्रापि विचित्राः
शक्तयोऽभिधीयन्ते । अत एवहि “भूरित्वष्टेव राजति” इत्युच्यते,
नाऽसि “मिथ्याभिभूतः कश्चिद्विराजते ” । “ मम माया दुरत्यया”
इत्यत्रापि गुणमयीति वचनात् सैव त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः उच्यते
इति । न श्रुतिभिः सदसदनिर्वचनीय अज्ञान प्रतिपादनम् ।
“सृष्टि से पूर्व सद् भी नही था, असद् भी नही था” इस वाक्य में
सद् असद् शब्द, चेतन-जड व्यष्टि बोधक है। उत्पत्ति के समय “सत्”
और ‘त्यत्’ शब्द से व्यष्टि रूप, जडचेतन वस्तु का निरूपण, किया गया
है, वह प्रलय के समय “अचित् रूप समष्टि ‘तम” शब्द वाक्य प्रकृति में
लीन हो जाती हैं, यही उक्त वाक्य का तात्पर्य है। इस वाक्य में सद्सद्
अनिर्वचनीयता की कोई चर्चा नही है। सद् और असद् वस्तु किसी काल
विशेष मे रहती ही नहीं, यही बतलाया गया है । “तम” शब्द वाक्य,
अचित् समष्टि अर्थ, एक दूसरी श्रुति में इस प्रकार बतलाया गया है-
“अव्यक्त अक्षर में लीन हो जाता है, अक्षर तम में लीन हो जाता है, तम
परमात्मा से एकीभूत हो जाता है” इत्यादि ।
यदि कहो कि-“‘तम’ शब्द से अचित् समिष्ट रूप प्रकृति की
सूक्ष्मावस्था बतलाई गई है, यह बात तो यथार्थ है, परन्तु “मायां तु
प्रकृतिं विद्यात् ” इस वाक्य से “माया” शब्द वाक्य अनिर्वचनीय ही
ज्ञात होता है। “यह कथन असंगत है, क्योंकि-माया शब्द की अनिर्वच-
नीयता का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। यदि कहो कि-माया शब्द
मिथ्या का पर्यायवाची है, इसलिए अनिर्वचनीय है, सो भी नहीं हो
सकता - सभी जगह माया शब्द मिथ्या बोधक नहीं है, असुर, राक्षस,
शस्त्र आदि में भी माया शब्द का प्रयोग देखा जाता है - जैसे कि-
“शीघ्रगामी सुदर्शन द्वारा प्रह्लाद की देह रक्षा के लिए, शंबरासुर के
हजारों माया (असुर) एक एक करके नष्ट कर दिये गए ”। इससे ज्ञात

( १७६ )
होता है कि—आश्चर्य कर वस्तु सृष्टि "माया" शब्द वाच्यार्थ है, मिथ्या
वस्तु नहीं। विचित्र सृष्टि कारिणी प्रकृति के लिये प्रायः माया शब्द का
प्रयोग किया गया है।
"मायी परमेश्वर इसी के द्वारा जगत की सृष्टि करता है, तथा
जीव इससे आबद्ध है" इस वाक्य से माया शब्द वाच्य प्रकृति की विचित्र
सृष्टि कारिता प्रतीत होती है। परमपुरुष परमात्मा माया संबद्ध होने से
मायी कहे गये हैं, अज्ञ होने से उन्हें मायी नहीं कहा गया है। जीव में,
माया शक्ति का संकोच बतलाया है। "तस्मिंश्चान्यो—" "अनादि माया
सुप्तो—" 'इन्द्रोमायाभि०' इत्यादि वाक्यो में माया शब्द परमेश्वर की
शक्ति वैचित्र्य का ही वाचक है। इसीलिए परमेश्वर को भूरित्वष्टैव
राजति" कहा गया है, यदि माया शब्द मिथ्यावाची होता तो उक्त वाक्य
के स्थान पर "मिथ्याभूतः कश्चित् विराजते" कहा जाता। मम माया
दुरत्यया" इस गीता वाक्य में भी "गुणमयी" पद से उसी त्रिगुणात्मिका
प्रकृति का उल्लेख किया गया है। इस से ज्ञात होता है कि—कोई भी
श्रुति सदसद् अनिर्वचनीया माया का समर्थन नही करती।
नाप्यैक्योपदेशानुपपत्त्या; नहि "तत्त्वमसि" इति जीवपरयो-
रैक्योपदेशे सति सर्वज्ञेसत्यसंकल्पेसकलजगत्सर्गस्थितिविनाश हेतुभूते
तच्छब्दावगते प्रकृतेब्रह्मणि, विरुद्धज्ञानपरिकल्पनाहेतु
भूता कादाचिदप्यनुपपत्तिर्दृश्यते। ऐक्योपदेशस्तु "त्वं" शब्देनापि
जीव शरीरकस्य ब्रह्मणएवाभिधानादुपपन्नतरः। "अनेन जीवेना-
त्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपेव्याकरवाणि" इति सर्वस्य वस्तुनः
परमात्मपर्यन्तस्यैव हि नामरूपभाक्त्वमुक्तम् । अतो न ब्रह्माज्ञान
परिकल्पनम्। इतिहासपुराणयोरपि न ब्रह्माज्ञानवादः क्वचिदपि
दृश्यते ।
श्रुति प्रतिपाद्य ऐक्योपदेश से भी ब्रह्माज्ञान कल्पना समझ में
नहीं आती। "तत्त्वमसि" जीव परमात्मा के ऐक्योपदेश के प्रसंग में
सर्वज्ञ, सत्य संकल्प, जगत् की सृष्टि स्थिति संहार के कारण परब्रह्म ही
"तत्" शब्द वाच्य है, "त्वं" पद भी जीवशरीरीब्रह्म का ही वाचक है।
इसलिए ब्रह्माज्ञान की कल्पना समझ में नहीं आती। "इसजीव में प्रवेश
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( १८० )
कर नामरूप की अभिव्यक्ति करूँ" इस श्रुति में परमात्मा पर्यन्त समस्त
वस्तुओं को नामरूपात्मक बतलाया गया है इसलिए ब्रह्म में अज्ञान
कल्पना निष्प्रयोजन सिद्ध होती है। इतिहास पुराण में भी ब्रह्माज्ञानवाद
की कहीं चर्चा नहीं है ।
ननु—"ज्योतींषिविष्णुः" इति ब्रह्मैकमेव तत्त्वमिति प्रतिज्ञाय
"ज्ञानस्वरुपो भगवन्यतोऽसौ" इति शैलाब्धिधरादिभेद भिन्नस्य
जगतो ज्ञानैकस्वरूपब्रह्माज्ञानविजृम्भितत्वमभिधाय "यदा तु शुद्धं
निजरूपस्यैव ब्रह्मणः स्वस्वरूपावस्थितिवेलायां वस्तुभेदाभावदर्श-
नेनाज्ञान "विजृम्भितत्वमेव स्थिरीकृत्य" वस्त्वस्ति कि ? "महीघट-
त्वम्" इति श्लोकद्वयेन जगदुपलब्धि प्रकारेणापि "वस्तुभेदानाम्
"सत्यत्वमुपपाद्यतस्मात् विज्ञानभूते" इति प्रतिज्ञातं ब्रह्मव्यतिरिक्त
स्यासत्यत्वमुपसंहृत्य "विज्ञानमेकं" इति ज्ञानस्वरूपे ब्रह्मणि

( १८१ )

अपना कर्म ही बतलाया गया है, फिर बाद में “विशुद्ध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म
के विशुद्ध स्वरूप का निर्देश किया गया है। “मैंने इस प्रकार सद्भाव का
निरूपण किया” इत्यादि श्लोकों का तात्पर्य है कि--“ज्ञानस्वरूप ब्रह्म
ही एकमात्र सत्य है, बाकी सब मिथ्या है, भुवन आदि समस्त पदार्थों की
व्यावहारिक सत्यता है, मैंने तत्त्व की बात तुम्हें बतलादी” ऐसा उपदेश
प्रतीत होता है।
नैतदेवम्-- अत्र भुवनकोषस्य विस्तीर्णं स्वरूपमुक्त्वा पूर्व-
मुक्तं रूपान्तरम् संक्षेपतः “श्रूयतामित्यारभ्याभिधीयते। चिदचिद्
मिश्रे जगति चिदंशो वाङ्मनसागोचरस्वसंवेद्य स्वरूपभेदो
ज्ञानैकाकारतयाऽस्पृष्टप्राकृतभेदो विनाशीति नास्तिशब्दाभि-
धेयः। उभयंतु परब्रह्मरूप वासुदेव शरीरतया तदात्मकमित्येतद्-
रूपं संक्षेपेणरत्राभिहितम् ।
(समाधान) बात ऐसी नहीं है--उक्त प्रकरण में भुवनकोष का
विस्तृत स्वरूप बतलाकर, “श्रूयताम्” से उक्त वस्तु का सूक्ष्म रूप संक्षेप
रूप से बतलाया गया है उसमें बतलाता गया कि--यह जगत् जडचेतनमय
है; इसका चैतन्यांश-वाङ्मनसगोचर, केवल आत्मवेद्य, विविध भागों-
वाला, ज्ञानाकार, अविनाशी. “अस्ति” शब्द वाच्य है। जीव के कर्मफल
से विविध भेदों और आकारों में परिणत जड अंश, विनाशशील “नास्ति”
पदवाच्य है दोनों ही परब्रह्म वासुदेव के शरीर, तदात्मक हैं, ऐसा ही
संक्षिप्तरूप से स्वरूप का विवेचन किया गया है।
तथापि-- “यदम्बु वैष्णवः कायस्ततोविप्रवसुंधरा, पद्माकारा
समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता।” इत्यम्बुने विष्णोः शरीरत्वेन
अम्बुपरिणामभूतं ब्रह्माण्डमपि विष्णोः कायः, तस्य च विष्णुरा-
त्मेति सकल श्रुतिगततादात्म्योपदेशोपबृंहणरूपस्य सामानाधिकर-
ण्यस्य “ज्योतींषि विष्णुः” इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्य शरीरात्मभाव
एव निबंधनमित्याहुः। अस्मिन् शास्त्रे पूर्वमपि एतदसकृदुक्तम्--
“तानि सर्वाणि तद्वपुः”--“सत्सर्वं वै हरेस्तनुः”-- “स एव
[email protected]

सर्वभूतात्मा विश्वरूपोयतोऽव्ययः” इति । तदिदंशरीरात्म भावप्रयुक्तं
तादात्म्यं सामानाधिकरण्येन व्यपदिश्यते ‘ज्योतींषि विष्णुः’ इति ।
उक्त तथ्य को ही अन्य श्लोक में बतलाते हैं—“विष्णु के शरीर
रूप जल से शैल, सागर आदि युक्त पद्माकार वसुंधरा उत्पन्न हुई”
इसमे जल को, विष्णु के शरीररूप से बतलाकर जल के परिणाम रूप
इस जगत को भी उनका शरीर स्थानीय कहा गया है । अन्यान्य श्रुतियों
मे भी विष्णु को ब्रह्माण्ड की आत्मा बतलाकर ब्रह्माण्ड और विष्णु का
सामानाधिकरण्य अभेद बतलाया गया है । ऐसा शरीरात्मभाव ही
“ज्योतींषि विष्णुः” से बतलाया गया है । इस शास्त्र में “वह सब उन्ही
का शरीर है”—वह सब हरि का तनु है—वह विश्वरूप अव्यय, सभी
भूतो के आत्मा हैं ।” इत्यादि वाक्यो से यहीबात कईबार कही गई है ।
शरीरात्मभाव तादात्म्य ही “ज्योतींषि विष्णुः ” मे सामान्याधिकरण
रूप से कहा गया है ।
अस्त्यात्मकना

( १६३ )
इस जगत में अस्त्यात्म और नास्त्यात्मक वस्तुएं विष्णु की शरीर
स्थानीय होने से विष्ण्वात्मक कही गई है। सत् और असत् दोनो में,
असत् रूप का कारण इस प्रकार बतलाया गया है--"ज्ञान स्वरूप भगवान
इस जगत् में व्याप्त है।" इस वाक्य में बतलाया गया कि--समस्त जीवों
में स्थित भगवान का ज्ञानमय रूप ही स्वाभाविक है, देव मनुष्य आदि
वस्तु रूप स्वाभाविक नही है। जड देव मनुष्य शैल समुद्र आदि भेद
उन्ही के ज्ञान (इच्छा) से स्वयंभूत है, अर्थात् एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान
की जो विविध वैचित्र्य जनक, देव, मनुष्य, शैल, समुद्र आदि आकार
स्मारक कर्मराशि है, वही विचित्रता की प्रतीति कराने वाली है। अचिद्
वस्तुएं, जीवो के कर्मानुरूप परिणामवाली है, इसलिए "नास्ति" पद
वाच्य है। इससे भिन्न चिद् वस्तु "अस्ति" पद वाच्य है यह भी इसी से
ज्ञात होता है। यही बात "यदा तु शुद्ध निजरूपि" इत्यादि में विस्तृत
रूप से वर्णित है। एकमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा मे जो देव मनुष्य आदि
रूप से विविध वैचित्र्य आरोपित होता है, उसका एकमात्र कारण कर्म
ही है, उन समस्त कर्मों के क्षीण हो जाने पर, जीवात्मा अपने निर्दोष
वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। उस स्थिति मे, देव आदि रूप
में आत्मभाव की कल्पना की मूलकारण कर्मराशि विनष्ट हो जाती है
तथा कर्मफलानुयायी भोगप्रद वस्तुभेद भी नही रह जाते।
ये देवादिषुवस्तुष्वात्मतयाभिमतेषु भोग्यभूता देवमनुष्यशैला-
ब्धिधरादिवस्तुभेदाः, ते तन्मूलभूतकर्मसु विनष्टेषु न भवन्ति इति
अचिद् वस्तुनः कादाचित्कावस्थाविशेषयोगितया नास्तिशब्दाभिधे-
यत्वं, इतरस्य सर्वदा निजसिद्धज्ञानैकाकारत्वेन अस्तिशब्दाभिधेय-
मित्यर्थः । प्रतिक्षणमन्यथाभूततया कादाचित्कावस्था योगिनोऽचिद्-
वस्तुनो नास्तिशब्दाभिधेयत्वमेवेत्याह--"वस्त्वस्ति किम् ?" इति ।
अस्ति शब्दाभिधेयो हि आदिमध्यपर्यन्तहीनः सततैकरूपः पदार्थः
तस्य कदाचिदपि नास्ति बुद्ध्यनर्हत्वात् । अचिद्वस्तु किंचिद्
क्वचिदपि तथाभूतं न दृष्टचरं ।