श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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विनाश होता है, वह चाहे ज्ञान हो या अज्ञान, निश्चित ही वह शक्ति
विशेष से उपबृंहित (बलप्राप्त) होता है, जैसे ईश्वर और योगियों का
ज्ञान या मुद्गर आदि। भाव पदार्थ घट आदि जैसे ज्ञान से विनाश्य
नहीं हैं, वैसे ही भावरूप अज्ञान भी, ज्ञान से विनाश्य नहीं है। यदि
कहो कि-बाधक ज्ञान की उपस्थिति में, बाधक ज्ञान की उत्पत्ति पूर्व के
भ्रम जन्य भय कम्पन आदि का विनाश देखा जाता है; सो ऐसी बात
नहीं है कि ज्ञान से भय आदि का विनाश होता है अपितु भय आदि तो
क्षणिक होते हैं, वे स्वतः ही विनष्ट हो जाते हैं, भय के कारण की निवृत्ति
हो जाने पर फिर भय आदि की उत्पति होती ही नहीं। ज्ञान की तरह
भय आदि भी, उत्पत्ति के कारण की स्थिति में ही रहते हैं, अनुपस्थिति
में नही, इसलिए उनकी क्षणिकता सहज ही अवगत हो जाती है। भय
आदि को यदि क्षणिक नहीं मानेंगे तो भय आदि का कारण मिथ्या ज्ञान
जब धारावाहिक रूप से चलता रहता है, तो सभी ज्ञानों को भय आदि
का हेतु मानना होगा, जिससे अनेक भय उपस्थित हो जावेंगे।
स्वप्रागभावव्यतिरिक्तवस्त्वन्तरपूर्वकमिति व्यर्थविशेषणो-
पादानेन प्रयोगकुशलताचाविष्कृता। अतोऽनुमानेनापि न भावरूपा-
ज्ञान सिद्धिः। श्रुतितदर्थापत्तिभ्यामज्ञानासिद्धिरनन्तरमेव वक्ष्येत।
मिथ्यार्थस्य हि मिथ्यैवोपादानं भवितुमर्हतीत्येतदपि “न विलक्षण-
त्वात् इत्यधिकरणन्यायेन परिह्रियते। अतोऽनिर्वचनीयाज्ञानविषया
न काचिदपि प्रतीतिरस्ति। प्रतीतिभ्रांतिबाधैरपि न तथाऽभ्यु-
पगमनीयम्। प्रतीयमानमेव हि प्रतीतिभ्रांति बाधविषयः। आभिः
प्रतीतिभिः प्रतीत्यन्तरेण चानुपलब्धामासां विषय इति न युज्यते
कल्पयितुम्।
भय को क्षणिक न मानने से अज्ञान के लिए किया गया “स्व
प्रागभाव वरत्वन्तर पूर्वक” यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा, केवल प्रयोग
कुशलता का नमूना मात्र रह जायगा इससे सिद्ध होता है कि, अनुमान
से अज्ञान के अस्तित्व की सिद्धि नहीं हो सकती। श्रुति और अर्थापत्ति
प्रमाण भी उसे सिद्ध नहीं कर सकते, इसे आगे बतलावेंगे। मिथ्या पदार्थ
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