श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना :
नमो नमो वाङ्मनसातिभूमये नमो वाङ्मनसैकभूमये ।
नमो नमोऽनन्तमहाविभूतये नमो नमोऽनन्तदयैकसिन्धवे ॥
चेतनाचेतन विभागविशिष्ट ब्रह्म के अभेद के प्रतिपादक सिद्धान्त को
विशिष्टाद्वैत कहते हैं। श्री यमुनाचार्य ने अपने ग्रन्थों में इसी सिद्धान्त को
युक्तियुक्त प्रतिपादन किया है। इसी मत को आचार्य श्री रामानुज ने आगे बढ़ाया
किन्तु आचार्य चरण के प्रतिपादन का आधार बोधायन टीका और श्री द्रविडाचार्य
के भाष्य थे। वेदान्त सूत्रों के प्रथम भाष्यकार आचार्य द्रविड ही के
सर्वमान्य सिद्धान्त को प्रायःस भी परवर्ती आचार्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से
अपनाया है। आचार्य शंकर माण्डूक्योपनिषद् भाष्य में द्रविडाचार्य को 'आगमविद्'
तथा वृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य मे 'सम्प्रदाय विद्' कहते हैं। जहाँ कहीं भी
आचार्य का उल्लेख किया है वहाँ सम्मानपूर्वक ही किया है। श्री यामुनाचार्य ने
भी द्रविडाचार्य के भाष्य की महत्ता स्वीकार की है-वे सिद्धित्रय में लिखते हैं कि-
"भगवता बादरायणेन इदमर्थमेव सूत्राणि प्रणीतानि विवृतानि च परिमित
गम्भीर भाष्यकृता" अर्थात् भाष्यकार आचार्य द्रविड ने जिस परिमित और गम्भीर
शैली में वेदान्त सूत्रों का विवरण प्रस्तुत किया है लगता है भगवान बादरायण
ने उसी अर्थ में सूत्रों की रचना की है। आचार्य रामानुज भी इस परिमित गम्भीर
भाष्य को अपने भाष्य का उपजीव्य बतलाते हुए कहते हैं "पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः
तन्मतानुसारेण' इत्यादि आचार्य रामानुज ने अपने भाष्य में यत्रतत्र यथाह द्रविड
भाष्यकारः कहकर उनके उपनिषद् भाष्यों के वाक्य भी उद्धृत किये हैं वल्लभ
सम्प्रदाय में भी पूर्वाचार्य के रूप में श्री द्रविडाचार्य का स्मरण किया गया है।
प्रसिद्ध सभी भाष्यों का आधार श्री द्रविडाचार्य कृत भाष्य ही है। प्रायः सभी
आचार्यों ने मीमांसा को पूर्व, उत्तर दो भागों में स्वीकार किया है, किन्तु आचार्य
रामानुज, बोधायन टीका के आधार पर "अथातो धर्म जिज्ञासा" से लेकर
"अनावृत्तिः शब्दात्" सूत्र तक बीस अध्यायों का एक ही वेदार्थ विचार करने
वाला मीमांसा दर्शन मानते है। उनके मत से धर्म मीमांसा, देवमीमांसा और
ब्रह्ममीमांसा नामक तीन काण्ड हैं। प्रथम काण्ड जैमिन का रचा हुआ है, जिसमें
बारह अध्याय हैं। दूसरा काण्ड-काशकृत्स्नाचार्य-रचित है जिसमें चार-अध्याय हैं।
तीसरा काण्ड बादरायणाचार्य रचित है, इसमें भी चार अध्याय है। इस संपूर्ण
मीमांसा शास्त्र की वृत्ति बोधनाचार्य ने बनाई थी।
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