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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 696 में से

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आचार्य रामानुज ने पूर्व प्रचलित अद्वैतवाद को ही अपने ढंग से प्रस्तुत
किया है । ' 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" आदि श्रुतिवाक्य ब्रह्म के एकत्व का प्रतिपादन
करते हैं। केवलाद्वैतवाद में एकमात्र ब्रह्म की सत्ता ही स्वीकार की गई है, तदभिन्न
कुछ भी नहीं है । किन्तु रामानुज जी "बृहबृंहिवृद्धौ' धातु के साथ "मनिन्"
प्रत्यय के संयोग से 'ब्रह्म' शब्द की निष्पत्ति करते हैं अतः वे एक में तीन का
समावेश मानते हैं । इसके प्रमाण में वे "बृहतिबृंहयति इतितत्परं ब्रह्म" ऐसा
रहस्याम्नाय ब्राह्मण का तथा "बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तद् ब्रह्मेत्यभिधीयते"
ऐसा विष्णुपुराण का वाक्य प्रस्तुत करते हैं । इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि ब्रह्म
एक है जो स्वयं बृहत होने और दूसरे को बृहत् करने में समर्थ है । ब्रह्म से अन्य
पदार्थ भी हैं जो कि उसी के द्वारा बृहत् किए जाते हैं। रामानुजाचार्य जी का
अद्वैत, परमात्मा का दो अन्य वस्तुओं से विशिष्ट एकत्व है। इस मत की पुष्टि के
लिए आचार्य चरण ने भाष्य में अनेक स्थलों पर अन्तर्यामी ब्राह्मण का यह वाक्य
प्रस्तुत किया है—
"यस्य पृथिवी शरीरं यं पृथिवी न वेद, यः पृथिवीमन्तरो यमयति यस्यात्मा-
शरीरं यमात्मा न वेद य आत्मानमन्तरो यमयति" इत्यादि ।
इससे स्पष्ट होता है कि परमात्मा, आत्मा और जड़ पदार्थ दोनों में है ।
वह चिन्मय, आत्मा तथा जड़ प्रकृति से विशिष्ट है । इस प्रकार विशिष्ट ब्रह्म को
विशिष्टाद्वैत कहा गया है। इस मान्यता का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि केवला-
द्वैत वाद को जो एकमात्र ब्रह्म को ही सत्य सिद्ध करने के लिए जगत को मिथ्या
तथा ब्रह्म में अविद्या की कल्पना करनी पड़ी जिससे कि ब्रह्म अपने में विविध नाम
रूपात्मक जगत को देखता है, वह थोथापन नहीं है। विशिष्टाद्वैत में एक ब्रह्म में
जो तीन पदार्थों की समिष्ट है उससे उसे अद्वैत के लिए उक्त कल्पना करने की
आवश्यकता नहीं पड़ी । इस मत में शास्त्र वाक्यों से निश्चित कर दिया गया है
कि विश्व ब्रह्म में लीन है और ईश्वर विश्व में अन्तर्हित, अतः बिना मिथ्या कल्पना
के ही ब्रह्म का एकत्व प्रमाणित हो जाता है ।
आचार्य रामानुज भारतीय परम्परा के अनुरूप ही ब्रह्म को प्रमाणित करने
में शब्द अर्थात् वेद को ही एकमात्र प्रमाण स्वीकार करते हैं । क्योंकि वेद सनातन
हैं, प्रत्येक कल्प में इनकी उसी पदक्रम से आवृत्ति होती है, इनका कोई रचयिता
नहीं है ये अपौरुषेय हैं, अतः मानव के मन बुद्धि में संभावित संशय विपर्यय आदि
दोषों की इनमें संभावना नहीं है । ये स्वतः प्रमाण हैं इसलिए इनके स्वरूप के
विपरीत किसी को कुछ भी निर्णय देने या किसी अंश को अप्रामाणिक कहने का