श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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दर्शननिमित्तजन्मजरामरणादिसांसारिकदुःखसागरनिमग्नस्य निखिल-
दुःखमूलमिथ्याज्ञाननिबर्हणायात्मैकत्वविज्ञानं प्रतिपिपादयिषितम्।
अस्यहि भेदावलम्बिकर्मज्ञानं क्वोपयुज्यते ? प्रत्युत विरुद्धमेव ।
उद्गीथादिविचारस्तु कर्मशेषभूत एव ज्ञानरूपत्वाविशेषादिहैव
क्रियते । स तु न साक्षात् संगतः, अतो यत् प्रधानं शास्त्रं तदपेक्षित-
मेव पूर्ववृत्तं किमपि वक्तव्यम् ।
(वाद) ब्रह्म जिज्ञासा में जिस नियम की अपेक्षा होती है, उस पूर्व-
वर्त्ती कारण के विषय में कुछ कहना है । ब्रह्म जिज्ञासा, मैं धर्म विचार
अपेक्षित नहीं है । वेदांत का ज्ञाता कर्म के विधि निषेधात्मक नियमों को
न जानकर भी वेदांतवाक्यों के तत्त्वों पर विचार कर सकता है । यदि
आप कहें कि वेदांत में तो कर्माङ्गाश्रित उद्गीथ आदि विद्याओं का भी
निरूपण है, कर्मकांड के विचार बिना उन पर विचार नहीं हो सकता । तो
मेरी समझ में आप शारीरक मीमांसा शास्त्र प्रणाली से अनभिज्ञ हैं।
इस शास्त्र में अनादि अविद्याजन्य भेद दृष्टि के फलस्वरूप होने वाले जन्म
जरा मरण आदि सांसारिक दुःख सागर में निमग्न व्यक्ति की दुःखराशि
की मूलकारण मिथ्याभ्रान्ति के निवारणार्थ, आत्मैकत्व ज्ञान का प्रति-
पादन किया गया है । इस विवेक में भेद पर अवलंबित कर्म ज्ञान की
क्या उपयोगिता हो सकती है ? यह तो इसमें विरुद्ध कार्य ही करेगा ।
उद्गीथ आदि उपासना कर्माङ्ग होते हुए भी ज्ञान स्वरूप हैं इसीलिए
उनका उत्तरमीमांसा में विवेचन किया गया है, कर्म का उन उपासनाओं
से साक्षात् संबन्ध नहीं है । शास्त्र के प्रधान प्रतिपाद्य विषय से संबद्ध
विषय को ही उस शास्त्र का पूर्ववर्त्ती कारण कह सकते हैं, अन्य किसी को
नहीं (अतः कर्म ज्ञान ब्रह्मजिज्ञासा में अपेक्षित नहीं है) ।
बाढम् ; तदपेक्षितं च कर्मविज्ञानमेव, कर्मसमुच्चिताद्
ज्ञानादपवर्गश्रुतेः । वक्ष्यति च “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्”
इति । अपेक्षिते च कर्मण्यज्ञाते केन समुच्चयः केन नेति विभागो
न शक्यते ज्ञातुम्, अतस्तदेव पूर्ववृत्तम् ।
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