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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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की उत्पत्ति भी संभव नहीं है। "अग्नि से सींचूंगा" इत्यादि की तरह,
वेदांत वाक्य, एक ही कारण से समस्त की उत्पत्ति का, अनहोना प्रति-
पादन नहीं कर सकते [अर्थात् जैसे आग से सींचना असंभव है, वैसे ही
ब्रह्म का जडचेतन होना असंभव है] इसका उत्तर देते हैं—सबसे विलक्षण
सर्वशक्ति संपन्न, सर्वज्ञ उस ब्रह्म से सब कुछ होना संभव है। मिट्टी आदि
पदार्थों में ज्ञान के अभाव से स्वतः तो अधिष्ठातृत्व होता नहीं तथा
अधिष्ठाता कुम्हार आदि मे पदार्थों को बिगाड़ कर दूसरे रूप में गढ़ने के
अतिरिक्त, दूसरे तत्त्व में परिवर्त्तन करने की सत्यसंकल्पता तो होती नहीं
इसलिए दृष्ट जगत् में निमित्त और उपादानता भिन्न-भिन्न है। इत्यादि
विवेचन से निश्चित होता है कि—ब्रह्म, निमित्त और उपादान दोनों है।
अभिध्योपदेशाच्च ।१।४।२४॥
इतश्चोभयं ब्रह्मैव "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति" "तदै-
क्षत बहुस्यां प्रजायेय" इति स्रष्टुर्ब्रह्मणः स्वस्यैव बहुभवन संकल्पो-
पदेशात् । विचित्रचिदचिद्रूपेणाहमेव बहुस्यां तथा प्रजायेयेति
संकल्प पूर्विका हि सृष्टिरुपदिश्यते ।
"उसने कामना की कि मैं बहुत होकर जन्म लूं" उसने स्वयं को
अनेक रूपों में व्यक्त किया" इत्यादि में, स्रष्टा ब्रह्म की, स्वयं को ही
अनेक रूपों में, प्रकट होने की संकल्पपूर्विका सृष्टि, बतलाई गई है, इससे
भी ब्रह्म की निमित्त उपादान कारणता सिद्ध होती है। विचित्र जडचेतन
रूप से मैं ही स्वयं, अनेक हो जाऊँगा, ऐसी संकल्पपूर्विका सृष्टि का
उपदेश दिया गया है।
साक्षाच्चोभयाम्नानात् ।१।४।२५॥
न केवलं प्रतिज्ञादृष्टान्ताभिध्योपदेशादिभिरयमर्थो निश्चीयते,
ब्रह्मण एव निमित्तत्वमुपादानत्त्वं साक्षादाम्नायते "किंस्विद्वनं क
उ स वृक्ष आसीद्यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः, मनीषिणो मनसा
पृच्छतेदुतद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्। ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष
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