श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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६. आप्रायणाधिकरण (सूत्र १२)
मृत्युकाल पर्यन्त उपासना की प्रयोजनीयता का
प्रतिपादन । —पृ० ११२८-
७. तदधिगमाधिकरण (सूत्र १३)
१. पूर्वपक्ष—ब्रह्म विद्या अभ्यास से पूर्वोत्तरपापों के
विनाश का अस्वीकरण ।
२. (सिद्धान्त)—ब्रह्मविद्या अभ्यास से पूर्वोत्तर पापों का
विनाश तथा उत्तरीय पापपुण्यों के असंस्पर्श का
प्रतिपादन । —पृ० ११२८–३२
८. इतराधिकरण (सूत्र १४)
ब्रह्मविद्या के उदय से पूर्वोत्तर पुण्य के विनाश और
असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११३२–३३
९. अनारब्धकार्याधिकरण (सूत्र १५)
१. पूर्वपक्ष—ब्रह्मविद्या प्राप्ति से प्रारब्धकर्म के विनाश
का प्रतिपादन ।
२. (सिद्धान्त)—प्रारब्धकर्म रहित अन्य कर्मों के क्षय
का प्रतिपादन । —पृ० २१३३–३४
१०. अग्निहोत्राद्यधिकरण (सूत्र १६-१८)
१. पूर्वपक्ष—अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मों की अनुष्ठेयता
का प्रदर्शन ।
२. सिद्धान्त—अग्निहोत्र आदि की अवश्य कर्त्तव्यता
का प्रतिपादन विद्या सहकारी कृत कर्मों की श्रेष्ठता
का प्रतिपादन । —पृ० ११३४–३६
११. इतरक्षपणाधिकरण (सूत्र १९)
भोगद्वारा ही प्रारब्ध कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । पृ० ११३६–३७
(द्वितीय पाद)
१. वागाद्यधिकरण (सूत्र १-२)
१. पूर्वपक्ष—वाक् आदि इन्द्रियों की वृत्तिलय का
प्रदर्शन ।
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