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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 696 में से

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पृष्ठ 561

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उक्त संशय के उत्तर में सूत्र में कहा गया "नासम्भवात्" अर्थात्
निष्पापता आदि गुण जीव में संभव नहीं है, इसलिए यह जीव नहीं है।
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु । १।३।१८॥
उत्तरात्-प्रजापति वाक्यात्, जीवस्यैवापहतपाप्मत्वादिगुण
योगो निश्चीयत इति चेत्-एतदुक्तं भवति-प्रजापति वाक्यं जीव-
परमेव, तथाहि-"य अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽ-
पिपासः सत्य संकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च
लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानाति
"इति प्रजापतिवचनमैतिह्यरूपेणोपश्रुत्यान्वेष्टव्यात्म स्वरूपजिज्ञासया
प्रजापतिमुपसेदुषे मघवते प्रजापतिर्जागरितस्वप्नसुषुप्यवस्थं जीवा-
त्मानं स शरीरंक्रमेण सुश्रूषुयोग्यतापरीचिक्षिषयोपदिश्य तत्रतत्र
भोग्यमपश्यते परिशुद्धात्मस्वरूपोपदेशयोग्याय तस्मै मघवते-
"मघवन् मर्त्यं वा इंद शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्या-
त्मनोऽधिष्ठानं" इति शरीरस्याधिष्ठानतामात्मनश्चाधिष्ठातृताम-
शरीरस्य च तस्यामृतत्वस्वरूपतां चोक्त्वा "न ह वै सशरीरस्य सतः
प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । अशरीरं वाव संतं न प्रियाप्रिये स्पृशतः"
इति कर्मारब्धशरीर योगिनस्तदनुगुणसुखदुःख भागित्वरूपानर्थं
तद्विमोक्षे च तदभावमभिधाय "एवमेवैष संप्रसादोऽस्माच्छरीरा-
त्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" इति जीवा-
त्मनः स्वरूपमेव शरीर वियुक्तमुपदिदेश ।
बाद के प्रजापति वाक्य से, निष्पापता आदि गुण, जीव के ही
निश्चित होते है, कथन यह है कि-प्रजापति वाक्य जीव पर कही है-
जैसा कि- "जो निष्पाप, अजर, अमर, शोक तथा भूखा-प्यासा रहित
सत्य संकल्प है, वह अन्वेष्टव्य और जिज्ञास्य है, जो उसे जान लेते है,
समस्त कामनाओं और समस्त लोकों को प्राप्त कर लेते हैं" इस प्रजापति