श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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२. स्तुतिमात्राधिकरण (सूत्र २१-२२)
१. पूर्वपक्ष—यज्ञांग उद्गीथ आदि के विषय में उपदिष्ट
रसतमत्व आदि के प्रशंसामात्र तात्पर्य का निरूपण।
२. (सिद्धान्त)—यज्ञांग उद्गीथादि के विषय में रसतमत्वादि
दृष्टि की विधेयता का प्रतिपादन। —पृ० १०८६-८८
३. पारिप्लवाधिकरण (सूत्र २३-२४)
१. पूर्वपक्ष—उपनिषदुक्त सभी आख्यायिकाओं की
पारिप्लव प्रयोगांगता का प्रदर्शन।
२. (सिद्धान्त)—आख्यायिकाओं के विद्यामाहात्म्य
प्रकाशन तात्पर्य का समर्थन, एकवाक्यता द्वारा
सिद्धान्त प्रतिपादन। —पृ० १०८८-८९
४. अग्नीन्धनाद्यधिकरण (सूत्र २५)
ऊर्ध्वरेताओं का यज्ञांग विद्या में अधिकार प्रतिपादन पृ० १०८९-९०
५. सर्वापेक्षाधिकरण (सूत्र २६)
कर्म निरत गृहस्थों की विद्योपासना में अग्निहोत्र
कर्मानुष्ठान की आवश्यकता प्रतिपादन। पृ० १०९०-९२
६. शमाद्यधिकरण (सूत्र २६)
गृहस्थों के लिए शमदमादि आवश्यकता का
प्रतिपादन। —पृ० १०९२-९४
७. सर्वान्नानुमत्यधिकरण (सूत्र २८-३१)
आपत् काल में प्राणात्मदर्शी के लिए सर्वान्नभक्षण की
शास्त्रानुमति समर्थन। विशुद्ध आचार से चित्त शुद्धि
निरूपण। यथेच्छ आहार निषेध। —पृ० १०९४-९७
८. विहितत्वाधिकरण (सूत्र ३२-३५)
मुक्ति की अभिलाषा से रहित गृही के लिए आश्रमो-
चित कर्मानुष्ठान की अनिवार्यता का निर्देश। विद्या
के सहकारी साधन के रूप में कर्मानुष्ठान की
कर्तव्यता का निरूपण। यज्ञांग और आश्रमांग कर्मों
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